लेखक परिचय

अश्वनी कुमार

अश्वनी कुमार

स्वतंत्र लेखक, कहानीकार व् टिप्पणीकार

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अश्वनी कुमार

बंगलौर… सुबह के लगभग 8 बज रहे होंगे…

शर्मा जी रोज़ की ही तरह आज भी अपने बैंक की ओर अपनी गाडी लेकर चल पड़े… शर्मा जी एक सरकारी बैंक में मैनेजर के तौर पर कार्यरत हैं. बैंक 9 बजे के आसपास खुलना था आम लोगों के लिए, तो वह बैठकर अपने साथ मित्र से कुछ बातें कर रहे थे…

यादव जी, जो उनके साथ ही इस बैंक में कार्य करते थे, और उनसे काफी सीनियर भी थे, ये बात दूसरी है कि वह केशियर थे और शर्मा जी मैनेजर…

यादव जी ने आज ऐसे ही पूछ लिया… “सर आपका तबादला हाल ही में हुआ है”

इससे पहले आपकी पोस्टिंग कहाँ थी?

शर्मा जी ने कहा अरे क्या बताएं यादव साहब, सारा देश ही घूम लिया है मान लीजिये!

“क्या कह रहे हैं सर यादव जी ने तुरंत चौंक कर कहा” हाँ यादव जी सारा देश ही घूम लिया है, शर्मा जी ने पुष्टि करते हुए कहा

यादव जी ने फिर एक सवाल किया अच्छा ये बताइये मैनेजर साहब कितने बच्चे हैं आपके? शर्मा जी ने जवाब देते हुए कहा “अरे बस एक लड़का और एक लड़की है” लड़की डाक्टरी कर रही है और लड़का अभी स्नातक की पढ़ाई कर रहा है.

तभी बात बदल जाती है. और शर्मा जी यादव जी से कहते हैं. आप अपने बारे में कुछ बताइये?

कहाँ रहते हैं आप और परिवार में कितने सदस्य हैं?

“बस सर दो लड़के हैं, दोनों की शादी कर चुका हूँ. दोनों सेटल्ड हैं. अपने अपने काम में लगे हैं” यादव जी ने जवाब दिया.

शर्मा जी ने फिर कहा अच्छा ये बताइए कैसा चल रहा है सब?

“बस सर क्या बताएं कुछ दिन से बड़ी परेशानी में हूँ! समझ नहीं आता कि यकीं करूँ या न करू”…!! यादव जी ने नीचे नज़र करते हुए दबी आवाज़ में जवाब दिया.

शर्मा जी बात आगे बढ़ाते हुए फिर पूछा, “ऐसा क्या हो गया है जो इतने परेशान हैं.”

मैं भी पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ.

आपके हिसाब में भी गड़बड़ी आ रही है. क्या कुछ बड़ी परेशानी है क्या?

यादव जी ने आँखें उठाते हुए कहा, “हाँ सर मेरे घर में पिछले कुछ दिनों से बहुत कुछ अप्रत्याशित घट रहा है”

समझ नहीं आता कि यकीन करूँ या न करूँ.

शर्मा जी ने कहा क्या घट रहा है?

अरे सर अजीब-अजीब घटनाएं घट रही हैं!

“कभी पंखा अपने आप हिलने लगता है, कभी पानी की बूंदे खुद-बखुद गिरने लग जाती हैं. कभी लगता है मेरे पीछे कोई है तो कभी मेरी पत्नी चिल्लाने लगती है.” पूछता हूँ क्या हुआ तो कहती है, “कुछ नहीं मैं ठीक हूँ” यादव जी ने बड़े डरते डराते यह बात उनके सामने रख दी. और यह भी कहा जा सकता है सर मेरे घर में भूत है!

“शर्मा जी ने कहा अरे भाई यादव जी पढ़े लिखे होकर इस तरह की बातों में विश्वास करते हैं”

“न सर…कभी नहीं” यादव जी ने बड़ी जल्दी जवाब दिया

यहीं आधे अधूरे में उनकी बात खत्म हो जाती है क्योंकि…बैंक खुलने का समय हो जाता है.

बैंक में अपना सारा काम खत्म करने के बाद.

दोनों एक दूसरे को अलविदा देते हुए अपने अपने घर की ओर चल देते हैं. अगले दिन यादव जी छुट्टी पर होते हैं. ये बात जब मैनेजर साहब को पता चलती है तो वह बैंक की एम्पलॉय डिटेल्स में से यादव जी का नंबर मंगवाते हैं और उन्हें फ़ोन करते हैं.

रिंग जा रही है…ट्रिंग…ट्रिंग ट्रिंग…ट्रिंग…ट्रिंग.

एक बार कोशिश करने पर पूरी बेल बज जाती है पर यादव जी फ़ोन नहीं उठाते.

दूसरी बार नंबर मिलाते ही हैं कि कुछ काम आ जाता है. बैंक का चपड़ासी सुंदर अन्दर आता है और कहता है कि आपके साइन चाहिए इन पेपर्स पर.

शर्मा जी उन पेपर्स को पढ़ने में व्यस्त हो जाते हैं. और भूल जाते हैं कि उन्हें यादव जी को फ़ोन करना था.

शाम को लगभग 5 बजे के आस-पास शर्मा जी फिर से यादव जी को फ़ोन मिलाते हैं.

घंटी बजती है और दूसरी घंटी पर यादव जी फ़ोन उठा लेते हैं.

कौन है? यादव जी फ़ोन उठाते ही दबे सी डरी आवाज़ में पूछते हैं.

शर्मा जी तभी जवाब देते हैं “अरे यादव जी मैं बोल रहा हूँ”

राजेंद्र शर्मा.!

“हाँ… हाँ कहिये सर” यादव जी की आवाज़ में कुछ बदलाव आता है.

शर्मा जी पूछते हैं क्या हुआ यादव जी?

आज आप बैंक नहीं आये?

“सर आज के हालात बैंक आने के नहीं थे” यादव जी जवाब देते हैं.

ऐसा क्या हुआ, कुछ परेशानी.? शर्मा जी फिर पूछते हैं.

“हाँ सर मैंने आपको कल बताया था न. वही बात है.” यादव जी जवाब देते हैं.

तो कहाँ हैं आप शर्मा जी फिर एक सवाल करते हैं?

“सर मैं एक मौलबी के यहाँ बैठा हूँ.”

“बहुत परेशान हूँ सर.! कुछ समझ नहीं आ रहा है.” यादव जी बड़े उदास भाव से जवाब देते हैं.

“चलो में बाद में बात करता हूँ.” शर्मा जी इतना कहते हुए फ़ोन रख देते हैं.!

शर्मा जी बैंक से निकलते हैं, और इसी बारे में सोचते हुए कब घर पहुँच जाते हैं.

उन्हें खुद भी पता नहीं चलता.

क्या हुआ कुछ परेशान लग रहे हैं? पत्नी की और से पहला सवाल आता है.

अरे मैं आप ही से पूछ रही हूँ? क्या हुआ कुछ परेशान लग रहे हैं.

जब कुछ देर और वह नहीं सुनते तो पत्नी पास जाती हैं और शर्मा जी को हिलाकर पूछती हैं.

क्या हुआ?

इतने उदास क्यों हैं?

शर्मा जी चौंकते हैं….(हाँ…हां…क्या हुआ), घबराहट जैसे उनके चेहरे पर साफ़ दिखाई दे रही है.

“कुछ नहीं बस थोड़ा परेशान हूँ” कहते हुए अपने कमरे में जाकर फिर से कुछ सोचने लगते हैं.

आज उनके मन में बड़े अलग-अलग ख्याल आ रहे हैं. और कुछ सवाल हैं जो वह अपने आप से ही पूछ रहे हैं. क्या ऐसा भी हो सकता है?

यादव जी तो पढ़े लिखे हैं फिर वह इन बातों पर क्यों विश्वास कर रहे हैं?

जब किसी के साथ कुछ घटता है वह तभी बताता है किसी को, शायद उनके साथ यह सच में घट रहा है?

शर्मा जी और न जाने कितने ही सवालों को अपने ऊपर हावी कर चुकें हैं! हर बात में चौंक जाने लगे हैं. यादव जी की परेशानी को शायद अपनी परेशानी बना लिया है उन्होंने….ऐसी इस तरह की बातें भी बैंक में होने लगी थी. एक महीना लगभग बीत जाता है जब यादव जी बैंक नहीं आते… और

शर्मा जी यहाँ परेशान हैं अपने सवालों को लेकर.

तभी पता चलता है कि फिर से एक बार शर्मा जी का तबादला हो गया है.

चपड़ासी आकर कहता है, “साब आपका ट्रान्सफर आर्डर आया है.”

हाँ यहाँ रख दो मैं ले लूंगा…! शर्मा जी इतना कहकर चपड़ासी को भेज देते हैं.

तभी वह एक जगह फ़ोन करते हैं और कहते हैं कि उन्हें दिल्ली में मकान चाहिए,

उनका तबादला वहीँ हो गया था.

घर जाकर यह बात बताते हैं तो पत्नी और बच्चे कहते हैं पापा हमारी पढाई न जाने से कब से प्रभावित हो रही है.

और फिर से ये ट्रान्सफर…!

हम तो यहीं रहेंगे, आप चले जाइए…

उनकी बातें सुनकर शर्मा जी कहते हैं हमारे पास एक हफ्ते का समय है.

मैं दिल्ली में बात भी कर चुका हूँ.

हमें अब वहीँ रहना है.

“और आपकी पढ़ाई दिल्ली में ज्यादा अच्छे से हो सकती है”

यादव जी वाली बात भी उनके जहन से जाने का नाम नही ले रही थी. और उसी बीच यह सब घट रहा था. एक सप्ताह बाद सभी तैयार हो जाते हैं दिल्ली जाने के लिए.

और ट्रेन से आ पहुँचते हैं…

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन…!

रास्ते में एक पल के लिए भी शर्मा जी किसी और चीज़ के बारे में नहीं सोचते… बस यादव जी की बात ही उनके अंतस में गोते लगा रही थी. उन्हें नहीं पता पूरे रास्ते में क्या क्या हुआ…

“पापा क्या आ जानते हैं मम्मी एक अंकल से लड़ पड़ी थी.”

और हमारी हंसी नहीं रुक रही थी. उनकी लड़की ने हँसते हुए कहा.

शर्मा जी कहते हैं. ये सब कब हुआ… मैं कहाँ था उस वक़्त?

“जाने दीजिये पापा” कुछ नहीं, लड़की ने मुंह बनाते हुए बात को ख़त्म किया.

स्टेशन से बाहर आकार शर्मा जी ने ऑटो वाले को आवाज़ लगाई. “अरे चितरंजन पार्क चलोगे”

एक ऑटो वाला रुका और कहने लगा वहां कहाँ जायेंगे?

“अरे डी ब्लाक में जाना है.” कहाँ ऑटो वाले ने फिर पूछा?

अरे डी ब्लाक सूना नहीं.

हाँ हाँ बैठिए…!

चारो ऑटो में बैठ जाते हैं. तभी फ़ोन बजता है और पत्नी कहती है शर्मा जी फ़ोन रख दीजिये, घर जाकर बात कर लीजिएगा… फ़ोन यादव जी का आ रहा होता है.

शर्मा जी उसे नहीं उठाते पर फिर से वही सवाल उन्हें घेर लेते हैं. ऑटो वाला सोचता है चितरंजन पार्क में यह शर्मा जी और उनका परिवार क्या करेगा?

वहां तो सारे बं………….!!! रहते हैं.

मुझे क्या… ऑटो वाला इतना सोचकर चलने में व्यस्त हो जाता है. वहां घर का ब्रोकर शर्मा जी का इंतज़ार कर रहा होता है. ऑटो से उतरने और ऑटो वाले को पैसे देते ही ब्रोकर कहता है स्वागत है शर्मा जी… आपका दिल्ली में,

कैसे हैं आप.?

मैं ठीक हूँ कहाँ है घर? शर्मा जी ब्रोकर से पूछते हैं.

“यहीं हैं शर्मा जी सेकंड फ्लोर पर.”

“आइये भाभी जी यहाँ से जाना है.” ब्रोकर बड़े अपनेपन से कहता है.

घर में पहुंचकर सब लोग चैन की सांस लेते हैं.

शर्मा जी ब्रोकर से कहते हैं… “भाई कल बात करते हैं आज सब थके हुए हैं.”

“अब तुम जाओ कल बात करते हैं.”

ब्रोकर कहता है, “कोई बात नहीं सर कल मिलते हैं.”

अगले दिन सुबह. ब्रोकर फिर लगभग 9 बजे के आस पास आ पहुंचता है. दरवाजे कर खट खट होती है. ठक ठक… ठक ठक. “अरे कौन है भाई इतनी सुबह” अंदर से शर्मा जी की पत्नी चिल्लाकर कहती हैं.

“मैं हम भाभी जी”…मैं ब्रोकर बाहर से कहता है.

“मैं कौन भाई नाम बताओ अपना” शर्मा जी की पत्नी फिर कहती है.

“अरे… मैं भाभी जी राम सिंह ब्रोकर” ब्रोकर बाहर से कहता है.

“अच्छा आती हूँ रुको”

इतनी सुबह क्या काम है भैया…? शर्मा जी की पत्नी थकी आवाज़ और आंखें मलते हुए परेशान मुद्रा में दरवाज़ा खोलते हुए कहती हैं.

दरवाज़ा खुलता है और ब्रोकर कहता है. “गुड मोर्निंग भाभी जी”

“गुड मोर्निंग भैया…शर्मा जी तो सो रहे हैं.” शर्मा जी की पत्नी कहती है.

“मैं इंतज़ार कर लूंगा भाभी जी” ब्रोकर जवाब देता है. और कहता है “एक कप चाय मिलेगी भाभी जी.”

“हाँ… आप बैठिए मैं लाती हूँ” शर्मा जी की पत्नी इतना कहकर चाय बनाने रसोई घर में चली जाती हैं.

तभी शर्मा जी की आवाज़ आती है. “अरे इतनी सुबह कैसे आ गए भाई…?”

ब्रोकर कहता है सर पैसों के लिए आया हूँ.

“हाँ यार मिल जायेंगे ड्यूटी तो ज्वाइन करने दो भाई” शर्मा जी इतना कहकर बाथरूम की ओर चले जाते हैं.

“लीजिये भैया… चाय लीजिये”

हाँ भाभी जी लाइए… ब्रोकर कहते हुए चाय पकड़ लेता है.

बाथरूम से बाहर आकर शर्मा जी कहते हैं… “यार राम सिंह तू मुझसे अगले महीने बात करना”

“अभी ये दस हजार रुपये रख लो”

ब्रोकर राम सिंह पैसे लेता है और “अच्छा सर ठीक है” कहते हुए वहां से चला जाता है.

शर्मा जी जब अपना फ़ोन उठाकर देखते हैं तो उन्हें, मिस कॉल दिखती है. यादव जी की जो ट्रेन में उनकी पत्नी ने उन्हें सुननी नहीं दी थी.

फिर से शर्मा जी परेशानी में आ जाते है. “ऑफिस का पहला दिन कल है. नए शहर में तब तक घूम लेते हैं.” शर्मा जी की पत्नी उन्हें चाय देते हुए कहती हैं.

पर शर्मा जी तो यादव जी के द्वारा उत्पन्न सवालों के जवाब ही अब तक ढूंढ रहे हैं. अपने ऊपर हावी कर चुकें हैं शर्मा जी की परेशानी को…

चौंक कर कहते हैं… “हाँ हाँ चलते हैं मैं नहा कर आता हूँ.” शर्मा जी इतना कहते हुए फिर से बाथरूम के ओर चल देते हैं.

“ये क्या हुआ है आपको कुछ दिनों से किस विचार में परेशान रहते हैं” शर्मा जी की पत्नी उनसे रसोई घर की ओर जाते हुए सवाल करती है.

शर्मा जी दबी आवाज़ में बाथरूम के अंदर से ही कहते हैं, “कुछ नहीं बस कुछ परेशान हूँ” आज वह बाथरूम में भी अचानक डर जाते हैं.

क्या… क्या हुआ पापा…???

डरने की आवाज़ सुनकर उनकी बेटी बाहर से आवाज़ देकर पूछती है.

शर्मा जी बात को हल्का करते हुए कहते हैं. “कुछ नहीं… कुछ नहीं… बस मैं गिर गया था”

बच्चों और पत्नी के लिए शायद बात यहाँ पर ही ख़त्म हो गई थी. पर शर्मा जी के लिए ये शुरुआत थी बुरे दिनों की ओर एक इशारा था.

अब शर्मा जी एक नई सोच में पड़ गए की आखिर मेरे पीछे था मौन जो मुझे देखकर रहा था. मैंने शीशे में उसे साफ़ देखा था. हमारे बाथरूम में ये था कौन…?

और मेरे देखते ही पीछे मुड़ते ही वो कहाँ गायब हो गया…

आखिर ये हुआ क्या…?

क्या हुआ ये मेरे साथ, पहले तो कभी हुआ नहीं ऐसा…?

क्या मैं पागल हो गया हूँ…?

क्या मैंने सपना देखा…? हाँ कल मेरे सपने में भी कुछ अजीब घटित हो रहा था. मैंने पहले कभी ऐसा सपना नहीं देखा.

शर्मा जी ये सब अकेले बैठे सोच रहे हैं… तभी आवाज़ आती है

“चलिए पापा हमें बाज़ार जाना है, दिल्ली देखनी है”

हाँ… हाँ चलो आता हूँ. कहते हुए शर्मा जी अपने कमरे से बाहर निकलते हैं. और मैं गेट की ओर बढ़ते हैं. तभी देखते हैं कि चनक उनके पेट में तेज़ दर्द हो जाता है. और ये कोई मामूली दर्द नहीं है. उनका पेट घुमने लगता है… उन्हें ऐसा लगता है कि जैसे कोई उनके पेट में हाथ घुसा कर उसे घुमा रहा है.

शर्मा जी किसी को बताये बिना, उनके साथ चल देते हैं.

बाज़ार घुमने के दौरान सब तो अपने अपने लिए कुछ खरीदने में मशगूल होते हैं परन्तु शर्मा जी इस दर्द से जूझ रहे थे.

और इसे साथ उनके साथ अब एक नई घटना और घटने लगी थी.

उन्हें लग रहा था, जैसे उनके पीछे के बाल खुद-बखुद उठ रहे हों, जैसे हवा आने पर कोई-कोई बाल उड़ने लगते हैं.

“क्या हो क्या रहा है मेरे साथ ये सब” शर्मा जी अपने आप से ही ये सवाल करते हैं.

उनके अन्दर से आवाज़ आती है कि अब तुम मेरी चपेट में हो, अब तुम्हें मुझसे कोई नही बता सकता है.

शर्मा जी अपने आप से सवाल करते हैं तो उसका जवाब भी उन्हें आजकल मिलने लगता है.

बाज़ार से घर लौटते समय भी ये घटनाएं शर्मा जी के साथ घटती ही रहती हैं.

घर जाकर शर्मा जो कहते हैं कि उन्हें पेट दर्द की गोली चाहिए…

पत्नी का पहला सवाल ये होता है कि “आपने तो कुछ खाया भी नहीं फिर पेट में क्या हुआ”…?

“ज्यादा सवाल मत करो जैसा कहा वैसा करो” शर्मा जी पहली बार अपनी पत्नी पर चिल्ला उठते हैं.

बच्चे और पत्नी चौंक कर रह जाते हैं.

और अपने अपने कमरे में चले जाते हैं…

लीजिये गोली पत्नी शर्मा जी को पानी के साथ गोली देकर ये बडबडाते हुए चली जाती है… कि “क्या पता क्या हो गया है, बदलते ही जा रहे हैं.”

रात होती है सब लोग खाना खाकर अपने अपने कमरों में चले जाते हैं, शर्मा जी से इस दौरान किसी की कोई बात नहीं होती.

अगले दी सुबह सब सही उठते हैं. परन्तु एक सवाल सबको परेशान कर रहा होता है, कि आखिर पापा को क्या हुआ था.

जो मम्मी पर पहली बार चिल्ला दिए.

“चलो कोई बात नहीं परेशान होंगे”… शर्मा जी की लड़की ये कहकर अपने काम में लग जाती है.

शर्मा जी अपने बैंक में चले जाते हैं. काम काम समझने और करने के बाद लगभग 5 बजे के आस पास घर पहुँचते हैं. उनकी परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है.

पिछले महीने के मुकाबले उनका वजन लगभग 10 किलों कम हो गया है.

घर पहुँचते हैं तो आवाज़ सुनते हैं… उनके ऊपर वाले फ्लैट में से किसी के लड़ने की आवाज़ आ रही है.

क्या हो क्या रहा है ये ऊपर… “अपनी पत्नी से पूछते हैं”

“पता नहीं सुबह से ही लड़ने की आवाज़े आ रही है” पत्नी जवाब देती हैं.

“कहाँ मकान दिला दिया इस ब्रोकर ने” यहाँ हम कैसे रहेंगे…? शर्मा जी इतना कहकर अपनी परेशानी अपने साथ लेते हुए चले जाते हैं. और अपना बैंक का काम करने लगते हैं.

ये सिलसिला लगभग ब्रोकर के आने तक ही चलता रहता है. सभी लोग परेशान हैं. अपने ऊपर वाले फ्लैट से लड़ने की आवाजों को लेकर…

एक महीना पूरा हो जाता है… और आज ब्रोकर आने वाला होता है. दरवाजें पर दस्तक होती है…

जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे…

बेल बजती है…

“आ गया शायद जाकर देखो”… शर्मा जी अपनी पत्नी से कहते हैं.

दरवाजे पर जाकर पत्नी कहती है, यहाँ तो कोई नहीं है!

शर्मा जी का शक बढ़ जाता है और वह आकर देखते हैं वहां वाकई कोई नहीं है.

“आखिर किसने बजाई है ये बेल”… शर्मा जी कहते हैं

“शायद ऊपर वालों ने बजाई होगी” पत्नी ने जवाब दिया.

“हाँ हो सकता है शायद कुछ चाहिए होगा उन्हें” शर्मा जी इतना कहते ही हैं कि फिर से बेल बजती है.

“तुम बैठों, मैं जाता हूँ” शर्मा जी इस बार खुद जाते हैं.

ब्रोकर वहां खड़ा मिलता है… “शर्मा जी नमस्कार” ब्रोकर शर्मा जी ने कहता है.

“नमस्कार, क्या तुमने बजाई थी कुछ समय पहले बेल” शर्मा जी ब्रोकर से पूछते हैं.

“न न शर्मा जी मैं तो अभी आया हूँ” ब्रोकर जवाब देता है.

“भैया तुम पैसे लेने तो आ गए, पहले ये बताओ ये कहा मकान दिला दिया है?” शर्मा जी की पत्नी ने पूछा वो भी गुस्से भरे अंदाज़ में.

“क्या हुआ भाभी जी” ब्रोकर विनम्रता से पूछता है.

“अरे… ये ऊपर वाले फ्लैट में क्या हमेशा लड़ाई झगड़ा ही होता रहता है.”

“हम ठहरे शांत स्वभाव के लोग है, कहाँ लड़ाई झगडे में फंसा दिया हमें” पत्नी जोर से चिल्लाकर कहती हैं.

क्या बात कर रही हैं भाभी जी… आपके ऊपर वाला फ्लैट तो पिछले एक साल से खाली है. ब्रोकर हँसते हुए कहता है.

क्या…!

क्या… कह रहे हो तुम… सभी उससे बड़े चौंककर कहते हैं.

हाँ… बिलकुल

शर्मा जी के पैरों के नीचे से ज़मीन निकल जाती है.

To be continued…

 

 

 

 

 

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