लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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डॉ0 आशीष वशिष्ठ 

अक्सर ये कहा जाता है कि युवा शक्ति के पास जोश तो होता है, लेकिन होश नहीं। लेकिन दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के साथ देश के कोने-कोने से आये युवाओं ने जोश के साथ जिस होश का परिचय दिया है, वो वाकया ही काबिले तारीफ है। अन्ना के आंदोलन ने कई मिथकों को तोड़ा और झुठलाया है। कश्‍मीर से कन्याकुमारी तक देशभर के युवाओं ने अनुशासित और अहिंसक तरीके से जन लोकपाल विधेयक के लिए आंदोलन किया है, उसने देश के युवाओं की उस छुपे पक्ष को सारी दुनिया के सामने ला दिया है जिसके बारे में कई मिथक, पूर्वधारणाएं और पूर्वाग्रह थे। तोड़-फोड़, हिंसा, गुस्से, उतेजना, उपद्रव और न्यूसेंस फेक्टर माने जाने वाली युवा शक्ति ने संयमित और अनुशासित रहकर जिस तरह देश और जनहित से जुड़े मसले पर बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है वो सुनहरे भविष्य की तस्वीर पेश करता है और इस उम्मीद का भी बल देता है कि देश की युवा शक्ति के पास जोश और होश दोनों की कमी नहीं है, बस जरूरत युवा शक्ति को पॉजिटिव तरीके से प्रयोग करने की है। इण्डिया जहां की 42 फीसदी आबादी 40 साल से कम उम्र की है उस देश में अन्ना के आंदोलन को मिले यूथ समर्थन से जहां यह बात साबित होती है कि मुद्दा और माद्देवाला आदमी सामने हो तो इस देश का यूथ सड़कों पर उतर ही पड़ता है। अन्ना के अनशन के सक्सेस मिलने के पीछे यूथ पावर का सबसे बड़ा हाथ था। सड़क से संसद तक जन लोकपाल बिल की कमान युवा बिग्रेड के हाथ में ही दिखी।

 

आजादी के समय से ही छात्र राजनीति और छात्रों की सामाजिक कार्यों में सहभागिता को लेकर चर्चा और बहस जारी है। कटु सत्य यह है कि राजनीतिक दलों और तथाकथित नेताओं ने छात्र शक्ति का सदुपयोग कम और दुरूपयोग अधिक हुआ है। गौरतलब है कि छात्र राजनीति से प्रदेश और देश की राजनीति में आए नेताओं की लंबी-चौड़ी फौज है। सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठन देश और जनहित से जुड़े मुद्दों में युवा शक्ति की सहभागिता और सक्रियता की बात तो खूब करते हैं लेकिन उनका मकसद युवा ष्षक्ति के कंधों पर सवार होकर अपने स्वार्थ सिद्व करने से अधिक दिखाई नहीं देता है। देश में इक्का-दुक्का राजनीतिक दलों की बात छोड़ दें तो लगभग सभी छोटे-बड़ों दलों ने यूथ इकाईयों की स्थापना कर रखी है। कॉलेज, युनिवर्सिटी में पढ़ाई के साथ ही साथ युवा राजनीति की पैंतरेबाजी और अपनी पार्टी के साथ युवा वर्ग का वोट बैंक जोड़ने का काम बखूबी करते रहे हैं। बावजूद इसके युवा शक्ति को शरारती, हिंसक, उपद्रवी, अनुशासनहीन और वो तमाम निगेटिव तगमे हासिल हैं जो देश की युवाओं की छवि को दाग और धब्बा ही लगाते हैं। लेकिन अन्ना के अनशन से ये बात सामाने खुलकर आई है कि अगर युवाओं को किसी पाजिटिव सोच वाले नेता की रहनुमाई मिले तो वो शांतिपूर्ण तरीके से अहिंसक आंदोलन कर देश की दशा और दिशा बदलने की कुव्वत रखते हैं। अन्ना के आंदोलन से ये बात भी साफ हुई है कि खुद राजनीतिक दल युवाओं को अपने स्वार्थ सिद्धि के गलत कार्यों में फंसाते और उलझाते रहे हैं। रामलीला मैदान से अन्ना की ये अपील की प्रदर्शन अहिंसक होना चाहिए, राष्ट्र की संपत्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए का युवाओं ने पूरे मनोयोग से माना और अन्ना के 12 दिन के अनशन के दौरान देश के किसी भी हिस्से से उत्पात, उपद्रव, मार-पीट, अशांति, लूटपाट और हिंसा की खबरें नहीं आयी जैसा कि अक्सर राजनीतिक धरना, प्रदर्शन और आंदोलनों में होता है। सन 84 के सिख दंगे, राम जन्म भूमि आंदोलन, आरक्षण आंदोलन, गोधरा कांड जैसे तमाम उदाहरण हमारे पास है जब देश की युवा शक्ति का जमकर दुरूपयोग राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने किया।

 

अन्ना के अनशन के दौरान देश के छोटे-बड़े शहरों, कस्बों में युवाओं ने होश के साथ जोश का भरपूर परिचय दिया। धरना, प्रदर्शन, रैलियां, नुक्कड़ नाटक, अनशन और जनजागरण अभियान में युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और दिल्ली से मीलों दूर होकर भी अन्ना को सकारात्मक ऊर्जा और जोश का संचार कराया। सिविल सोसायटी को ये आशंका थी कि सरकारी मशीनरी उन्हें बदनाम करने के लिए अप्रिय घटना या कोई ऐसा काम कर सकती है जिससे टीम अन्ना के दामन पर हिंसा फैलाने और अषांत वातावरण बनाने का आरोप मढ़ा जा सके। एकाध कोषिश ऐसी हुयी भी लेकिन सुरक्षाकर्मियों की समझदारी और संयमित व्यवहार के कारण मामला टल गया। लेकिन पूरे अनशन के दौरान रामलीला मैदान में ऐसी एक भी अप्रिय घटना दर्ज नहीं हुयी जिससे ये कहा जा सके की देश के युवा उद्दण्ड, अनुशासनहीन और बिगड़ैल हैं। रामलीला मैदान के मंच से लेकर सड़क तक युवाओं का हजूम दिख रहा था। युवाओं के साथ सीनियर सिटिजन से लेकर, महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे लेकिन जो जोश और उत्साह युवाओं ने जन और देशहित से जुड़े मुद्दे पर दिखाया उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। अन्ना के अनशन से बरसों से सो रही देश की युवा को झकझोर कर जगाने का काम बखूबी किया है।

 

सड़कों पर तिरंगा लहराते युवाओं की धमक ने राजनीतिक दलों की बैचेनी बढ़ा दी थी। वक्त की नजाकत और युवा लहर के प्रकोप को भांपकर ही संसद के भीतर लगभग सभी राजनीतिक दलों ने लोकपाल बिल की बहस के दौरान युवा सांसदों को ही बहस की कमान सौंप रखी थी। राहुल गांधी, संदीप दीक्षित, वरूण गांधी, जयंत चौधरी, नीरज शेखर, धर्मेंद्र यादव, धनंजय सिंह, प्रवीण सिंह ऐरन, प्रिया दत्त, मिलिंद देवड़ा, सचिन पायलट, आदि युवा सांसदों ने लोकपाल बिल की बहस में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। सही मायनों में सरकार ने ये समझ लिया था कि अन्ना की अगुवाई में जो अनशन चल रहा है उसकी असली ताकत देश की युवाशक्ति ही है ऐसे में एक युवा ही दूसरे युवा की बात को आसानी से समझ पाएगा। सोची समझी रणनीति के तहत ही लगभग हर पार्टी ने अपने युवा सांसदों को संसद और सड़क पर अन्ना फैक्टर से निपटने की अहम जिम्मेदारी सौंपी थी।

 

इतिहास इसका गवाह है कि युवाशक्ति के दम पर किसी देश की दशा और दिशा बदली जा सकती है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में युवा शक्ति को रचनात्मक और जनहित के कार्यों में प्रयोग करने की बजाय स्वार्थपूर्ण, घटिया और ओछी राजनीति का मोहरा बनाने का गुनाह राजनीतिक दल पिछले 64 सालों से करते आ रहे हैं। अन्ना के अनशन ने देश के युवाओं में राजनीतिक चेतना, समझ और एक नयी सकारात्मक सोच का संचार किया है। देश की युवा शक्ति देश निर्माण और जनहित के मुद्दों पर कितनी संजीदा और सीरियस है, उसकी झलक पूरा देश अन्ना के आंदोलन के दौरान देख चुका है। कमी सिस्टम की है, ये सच है कि युवाओं मे जोश कूट-कूट कर भरा होता है। जरूरत इस बात की है कि उनके जोश को सही दिशा और सोच के साथ जोड़ा जाय। जाने-अनजाने में अन्ना के अनशन ने देश के युवाओं को भ्रष्टाचार जैसी बीमारी और दूसरी सामाजिक समस्याओं को समझने और जानने का जो अवसर दिया है, उसके लिए अन्ना धन्यवाद और बधाई के पात्र हैं। सेल्फ मोटिवेटिड युवा शक्ति ने सारे देश को यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि उन्हें निगेटिव प्रचारित करने वाली जमात और क्लास स्वयं कितनी निगेटिव है। जरूरत बस इस बात की है कि युवा शक्ति देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के लिए सचेत और स्वभाव से आंदोलनकारी प्रवृत्ति को धारण किये रहे।

 

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