लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश विधान सभा का बजट सत्र अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया। ऐसा नहीं था कि इस बार परम्परा से हट कर या फिर बिना शोरगुल के बिना सब काम निपट गया था, न ही बसपा सरकार के चार साल के शासनकाल में उसकी ऐसी कोई साफ-सुथरी छवि उभर कर आ गई थी जिस कारण विपक्ष को हो-हल्ले का मौका न मिला हो, लेकिन बजट सत्र इस बात का अहसास जरूर करा गया कि कांग्रेस और बसपा के बीच अंदर ही अंदर कुछ पक जरूर रहा है। यह बात हवा में नहीं कही जा रही है। विधान सभा सत्र की कार्रवाई को जिसने भी ध्यान से देखा उसे यह समझने में देर नहीं लगी कि कांग्रेस चौपालों और सड़क पर भले माया सरकार के खिलाफ हमलावर हो लेकिन विधानसभा के भीतर वह ऐसा कुछ नहीं करना चाहती थी,जिससे कि बसपा सरकार को किसी मुश्किल समय का सामना करना पड़े। देखा यह गया कि जब विपक्ष में बैठे बाकी दल सरकार पर आक्रामक होते थे तो कांग्रेस सरकार के लिए ढाल का काम करती दिखी। इस बार सदन में कांग्रेस जो किरदार निभाया,उससे तो यही लगता है कि वह पंचायत चुनाव में कुछेक खास स्थानों पर कांग्रेसी उम्मीदवारों को जिताने में बसपा सरकार से मिले सहयोग का शुक्रिया अदा करना चाहती हो।यह और बात है कि कांग्रेस इस बात को मानने को तैयार नहीं है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव से जब इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने बसपा सरकार को कांग्रेस की तरफ से किसी तरह की ‘छूट’ दिए जाने की बात को सिरे से नाकार दिया और कहा कि हम जहां जरूरी होता है बसपा सरकार के भ्रष्टाचार ,प्रदेश में फैले जंगल राज और माया के लूटतंत्र का विरोध करते है,लेकिन हमें अपनी मर्यादाए भी पता हैं जिसका हम कभी उल्लंघन नहीं करते।

कांग्रेस भले ही बसपा को किसी तरह की ‘छूट’ दिए जाने की बात से इंकार करती हो लेकिन कांग्रेस का सदन में बसपा सरकार के प्रति हमलावर न होने पर राजनैतिक पंडितों की अपनी अलग ही राय है। वह इसे कांग्रेस की मजबूरी बताते हैं।पदाधिकारियों की बैठकों और केन्द्रीय नेतृत्व के सामने भले कांग्रेस सड़क से सदन तक सरकार को छकाने की बात करती हो लेकिन जब सचमुच ऐसा अवसर आता है तो वह हमेशा बैकफुट पर नजर आती है। यही नहीं जो लोकायुक्त भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मंत्रियों की जांच कर रहे हैं कांग्रेस उन्हीं के खिलाफ प्रस्ताव ले आई।जब पहली बार कोई लोकायुक्त बसपा मंत्रियों आदि पर तेजी से शिकंजा कसने की कोशिश कर रहा हो तो उस समय उसके खिलाफ कोई प्रस्ताव लाना लोकायुक्त की पीठ में छूरा भोंकने जैसा ही है। इससे सिर्फ और सिर्फ बसपा को ही फायदा होगा।जल्दबाजी और बेसमय लाए गए कांग्रेस के इस प्रस्ताव से कांग्रेस को क्या हासिल हुआ यह तो नहीं पता लेकिन सम्पूर्ण विपक्ष को जरूर कटघरे में खड़ा होना पड़ गया।कांग्रेस द्वारा लाए गए प्रस्ताव में उन्हीं लोकायुक्त की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए गये जिनकी संस्तुति पर माया सरकार के एक राज्यमंत्री की उनके मंत्रिमंडल से छुट्टी हो गई और तीन मंत्रियों के खिलाफ जांच चल रही हैं। कांग्रेस के उक्त प्रस्ताव पर विपक्ष में बैठे गैर-कांग्रेसी दलों को सरकार की साजिश नजर आ रही है।ं जो दल विधानसभा में इस प्रस्ताव के विरोध में थे, वहीं अब कह रहे हैं कि सरकार ने स्वयं लोकायुक्त पर दबाव बनाने के लिए बाकी दलों की अपेक्षा कांग्रेस पर भरोसा किया।इसी लिए कांग्रेस के माध्यम से इस आश्य का प्रस्ताव लाया गया। कांग्रेस द्वारा लोकायुक्त पर विधायक निधि समाप्त किए जाने का सुझाव देने की बात कहकर उनके खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया गया। इस प्रस्ताव में लोकायुक्त पर विधायिक के कार्यों में हस्तक्षेप करने की बात कही गई थी जबकि लोकायुक्त ने इस बाबत विधानसभाध्यक्ष को पत्र लिखा तो असलियत समाने आई। विधान सभा अध्यक्ष को लिखे लोकायुक्त के पत्र से पता चला कि लोकायुक्त ने इस तरह का कोई सुझाव दिया ही नहीं था। जब सारे दलों को असलियत पता लगी तो सबसे ज्यादा किरकिरी कांगेस की ही हुई।

कांग्रेस की ओर यह कोई पहला आचरण नहीं था जिससे ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा हो। कानून व्यवस्था के मुद्दे सपा-भाजपा के लोग सरकार को गठघरे में खड़ा करते हैं तो उसके बचाव में कांग्रेस ही उतरती है।वह पूर्ववर्ती सरकार की खामियां गिनाकर परोक्ष रूप से मायावती सरकार की मदद करती है। बसपा सरकार के प्रति कांग्रेस की इस दरियादिली के बारे में भाजपा के इस आरोप में काफी दम नजर आता है कि कांग्रेस-बसपा दोनों का विरोध केवल जनता को गुमराह करने के लिए है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही कहते हैं कि जब प्रदेश में सत्तारूढ़ बसपा केन्द्र की कांग्रेस सरकार को बिना शर्त समर्थन दे रही है तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस उसका विरोध कर भी कैसे सकती है। हाल में ही सम्पन्न हुए पंचायत चुनाव में जब बसपा उम्मीदवारों को जितवाने के लिए कांग्रेस के हाथ बसपा की मदद के लिए बढ़े थे,तभी साफ गया था कि बसपा बसपा सरकार का विरोध केवल दिखाने भर का हैं पंचायत अध्यक्षी के चुनाव में प्रतापगढ़ जिसे कांग्रेस का गढ़ कहा जाता है, वहां की कांग्रेस सांसद और पदाधिकारी बाकायदा बसपा उम्मीदवार के जुलूस में शामिल हुए थे। यही नहीं प्रदेश में कई और जगह भी इसी प्रकार की सहयोग की सुगबुगाहट सुनने और देखने को मिली थी। अब कांग्रेस सफाई दे रही है, लेकिन उसकी बातों पर विश्वास करने वाला कोई नहीं है।

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