लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका आजकल बसपा के दो दिग्गजों के बीच वर्चस्व का अखाड़ा बना हुआ है। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की मुहिम में लगे इन नेताओं के कारण बसपा को यहां हर तरह से नुकसान उठाना पड़ रहा है। कभी यहां कांग्रेस का परचम लहराता था,इसके बाद सपा ने यहां खूब छूम मचाई,लेकिन 2007 के विधान सभा चुनाव में यहां बसपा का डंका बजा। बसपा ने यहां परचम लहराया तो सबसे पहले उसने इस इलाके को दस्यु से मुक्त करने का बीड़ा उठा लिया। बुंदेलखंडवासियों ने बसपा को वोट देकर जिताया तो माया सरकार ने बुंदेलखंड के एक-दो नहीं सात विधायकों को मंत्रिपरिषद में जगह देने में देर नहीं की।इसमें कैबिनेट का दर्जा प्राप्त और बसपा के दिग्गज नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी,बाबू सिंह कुशवाहा ,बादशाह सिंह, द्ददू प्रसाद और राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार रतन लाल अहिरवार, भगवती प्रसाद सागर के अलावा राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त हरिओम शामिल है। उम्मीद यह थी माया मंत्रिपरिषद में बुंदेलखंड से इतने मंत्रियों का नाम आने से यहां विकास की गंगा बहने लगेगी, लेकिन इसके उल्ट यह मंत्री मुसीबत का पिटारा बन गए। माया के मंत्रियों में टकराव होने लगा, जिसके कारण कई ऐसे मुद्दों को हवा मिल गई जिस पर समय रहते अंकुश लग जाता तो न माया सरकार की बदनामी होती, न हीं विपक्ष को मौका मिलता। कहा तो यहां तक जाता है कि हाल में ही बांदा के एक बसपा विधायक पर रेप केस का मामला और कुछ माह पूर्व एक किसान की जमीन पर माया के सबसे वफादार मंत्री के कब्जे की कोशिश का मामला भी बसपा के नंबर दो समझे जाने वाले दो दिग्गज नेताओं की एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृति के चलते खूब हवा में उछला। इसे भी इतिफाक ही कहा जाएगा कि माया सरकार में अपने आप को बहनजी का सबसे वफादार और नंबर दो समझने वाले यह दोनों नेता बुदेलखंड के एक ही जिले बांदा से ताल्लुक रखते हैं और फिलहाल दोनों ही विधान परिषद के रास्ते से राजनीति के मैदान में जमे हुए हैं।

बुंदेलखंड और उसमें भी खासकर बांदा की बसपा राजनीति इन्ही दोनों नेताओं के इर्दगिर्द घूमती रहती है। यहां के बसपाई दो गुटों में बंटे हैं। कोई सिद्दीकी गुट तो कोई बाबू सिंह कुशवाहा खेमें में रहकर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंक रहा है। ऊपर से तो दोनों नेताओं को देखने से ऐसा कुछ नहीं लगता है कि इनमें कहीं कोई मतभेद वाली बात होगी, लेकिन भीतरखाने यह नेता एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। बुंदेलखंड की राजनीति को करीब से जानने वाले जानते हैं कि इन दोनों नोताओं के बीच क्या पकता रहता है। दोनों ने ही खूब सत्ता सुख उठा रहे है।जमीन से जुड़े होने का दावा करने वाले इन दोनों नेताओं का जमीन के प्रति लगाव देखते ही बनता है। बांदा से लेकर लखनऊ और न जाने कहॉ तक यह ‘जमीन’ से जुड़े हुए हैं।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी बसपा में मुस्लिम चेहरा होने के साथ मायावती के लॉयल हैं। वफादारी के मामले में नसीमुद्दीन को माया का ‘हनुमान’ समझा जा सकता है। सिद्दीकी के कंधों पर आबकारी, लोक निर्माण, सिंचाई, आवास, शहरी नियोजन, गन्ना विकास, चीनी उद्योग तथा कृषि विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभाग के अलावा बसपा के लिए फंड जुटाने की भी जिम्मेदारी रहती है। इस काम को वह बखूबी अंजाम देते हैं। सिद्दीकी पार्टी के लिए इधर-उधर से जो भी ‘पुष्प पत्र’ एकत्रित करते हैं,वह बहनजी के चरणों में समर्थित कर देते है। एक भी फूल या पत्ती पर वह निगाह खराब नहीं डालते। चीनी के धंधे में अपना नाम रोशन करने की कोशिश में लगे उत्तर भारत के एक बड़े वाइन किंग फोंटी चङ्ढा से नसीमुद्दीन की काफी निकटता है,जिसके कारण कई बार आबकारी नीति में ऐसे-ऐसे बदलाव किए गए जिससे एक व्यक्ति विशेष को फायदा पहुंचा॥

बाबू सिंह कुशवाहा भी स्दिदीकी की तरह बसपा के पुराने वफादारों में शामिल है और बहनजी के संघर्ष के दिनों के साथी हैं। कुशवाहा के पास भूतत्व और खन्न, सहकारिता, परिवार कल्याण आदि कुछ और विभागों के अतिरिक्त संस्थागत वित्त एवं स्टाम्प और न्यायालय शुल्क विभाग की कमान है। परिवार कल्याण विभाग कुशवाहा को देने के लिए माया ने स्वास्थ्य विभाग के दो टुकड़े करने में भी संकोच नहीं किया।परिवार कल्याण विभाग को काफी कमाऊ विभाग माना जाता है। सरकारी दवा की खरीददारी से लेकर डाक्टरों की तैनाती तक का काम बाबू सिंह कुशवाहा ही करते हैं।इस विभाग की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ माह पूर्व लखनऊ में एक सीएमओ की हत्या हुई तो उसे भी इसी से जोड़कर देखा गया था। सीएमओ की हत्या का मामला पूरी तरह से टं्रासर्फर पोस्टिंग और दवाओ की खरीद का नजर आ रहा था लेकिन पुलिस ने अपने हिसाब से आधी-अधूरी जांच करके फैजाबाद के माफिया सिंह को आरोपी बनाकर जेल भेज दिया, लेकिन दबी जुबान लोग यह कहने से कतराते नहीं कि अभय को मोहरा बनाया गया है, दरअसल असली गुनहागार तो सफेदपोश थे, जिनपर आंच भी नहीं आई। वह आज भी खुले आम घूम रहे है। बात खन्न कार्यो की कि जाए तो इसमें रंजमात्र भी संदेह नहीं हैं कि भूतल का दोहन बाबू जी ही करते हैं। बाबू सिंह कुशवाहा को यह बात कभी बर्दाश्त नहीं होती है कि उनके कामों में कोई दखलंदाजी करे। उनके काम करने की अपनी स्टाइल है। बाबू के करीबी लोगो की बुंदेलखंड में खन्न कार्यो में अच्छी खासी दखलंदाजी है।देवरिया के एक विधायक जी बाबू सिंह कुशवाहा के ‘भक्त’ बनकर उनकी मंशा को अंजाम देने में लगे रहते हैं,बाबू सिंह कुशवाहा के रूतबे का आलम यह है कि जो इनका सहारा ले लेता है उसके बिगड़े काम भी बन जाते हैं।

हाल में ही खबर आई कि नसीमुद्दीन के करीबी फोंटी चङ्ढा भी खन्न के क्षेत्र में कूद पड़े। इसका पता चलते ही बाबू सिंह कुशवाहा खेमें की त्योरियां चढ़ गई। कुशवाहा सूत्रों ने पता किया तो इसमें लखनऊ के ‘पंचम तल’ पर बैठने वाले एक वरिष्ठ नौकरशाह के हाथ होने की भी बात सामने आई,जिसके पास कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी थी। इस नौकरशाह को नसीमुद्दीन खेमें का माना जाता था। बाबू सिंह कुशवाहा अपनी फरियाद लेकर बसपा की ‘सुपर पॉवर’ लेडी के पास पहुंच गए। कहा जाता है कि इसके बाद ही उक्त नौकरशाह को लगभग पैदल कर दिया गया।कुशवाहा खेमें की इस तेजी से सिद्दीकी खेमा न केवल हाथ मलते रह गया,बल्कि सत्ता के गलियारे में उसकी फजीहत भी हुई। इससे पहले बांदा एक किसान की भूमि जबरन हथियाने के आरोप में भी नसीमुद्दीन गुट की किरकिरी हो चुकी थी।लगातार दो बार मात खा चुका सिद्दीकी गुट इसके बाद बाबू सिंह कुशवाहा गुट को नीचा दिखाने के लिए झटपटाने लगा।उसे यह मौका जल्द मिल गया।तभी बांदा का शीलू रेप प्रकरण सामने आ गया। इसमें आरोपी नरैनी के विधायक को बाबू सिंह कुशवाहा का करीबी माना जाता था,बस फिर क्या था बाबू सिंह कुशवाहा का विरोधी गुट सक्रिय हो गया। अपनी पत्नी को विधायक बना चुके सिद्दीकी यहां से अपने बेटे को चुनाव लड़ाना चाहते थे। इस लिए उनके गुट को समझते देर नहीं लगी कि अगर यह मामला कायदे से उछल गया तो एक तीर से दो निशाने हो जाएंगे। बांदा में तैनात पुलिस अधीक्षक की यहां तैनाती कराने में नसीमुद्दीन का विशेष योगदान रहा था,यही वजह थी एसपी साहब ने भी सिद्दकी के पक्ष में वफादारी की कीमत चुकाने में देरी नहीं की।विधायक के खिलाफ की घटना को ऐसा उलझाया गया कि विपक्ष और मीडिया से लेकर कोर्ट तक आरोपी विधायक के खिलाफ थू-थू करने लगी।इस तरह से सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। इस मामले को इतनी हवा मिली की बहनजी को आरोपी विधायक के खिलाफ कड़े कदम उठाते हुए उनका टिकट काटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। वहीं जेल में जाकर भुक्तभोगी युवती को बयान बदलने के लिए दबाव डालने वाले एसपी साहब का बाल भी बांका नहीं हुआ। पिछले दिनों आरोपी विधायक की पत्नी ने लखनऊ में धरना देकर यहां तक आरोप लगा दिए कि पार्टी के भीतर ही उनके पति को फंसाने की साजिश रची जा रही है। उनका इशारा बसपा के मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दीकी और उनकी लॉबी की तरफ था।

बहरहाल, माया ने समय रहते पार्टी के अंदर चल रही वर्चस्व की लड़ाई को तुरंत विराम नहीं लगाया तो आने वाले समय में माया को बदनामी के कई और दाग सहने के अलावा इसकी आग कई और जिलों में फैलती दिख सकती है। हरदोई, फरूखाबाद,कानपुर आदि कई जिलों में वर्चस्व को लेकर बसपा नेता सिरफुटव्वल कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि चुनाव करीब आते-आते बंद कमरों से शुरू हुई यह लड़ाई सड़क पर भी आ सकती है। ऐसे में माया के लिए जरूरी है कि जिस तरह से वह अपने नौकरशाहों पर नकेल डालने की कोशिश कर रही हैं, उसी तरह से वह अपनी पार्टी के नेताओं की भी लगाम कसे रहें।

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