लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

दलित हितों की रक्षा और सार्वजन के नारों के बूते दिल्ली की सत्ता हथियाने की होड़ में लगी मायावती का स्वप्न तो चकनाचूर हुआ ही, बहुजन समाज पार्टी को अखिल भारतीय आधार देने के मंसूबे भी ध्वस्त हो गए। सामाजिक अभियांत्रिकी के बहाने जातीय उन्माद के असंगत गठजोड़ का प्रतीक बने हाथी को आखिरकार बहुजन ने ही लगाम लगा दी। मायावती भले ही कहती रहें कि उनका दलित वोट बैंक सिथर रहा है, किंतु चुनाव विश्लेषकों की मानें तो यह 20 फीसदी खिसका है। राज्यसभा में जाने के बहाने मायावती ने उत्तर प्रदेश से पलायन करने का जो निर्णय लिया है, वह बसपा के दलित-ब्राह्राण-मुसिलम बेमेल गठजोड़ के लिए बाल्टी में मेंढ़क साबित होगा। दरअसल यहां गौरतलब है कि आम और दलित मतदाता ने इस राजसी-नेत्री के स्वप्न को नहीं नकारा है, बलिक माया की उस महत्वकांक्षा को नकारा है, जिसने दलितों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर अपराधी, माफियाओं, बाहुवलियों और भ्रष्टाचारियों जैसे असामाजिक तत्वों को हाथी की पीठ पर चढ़ा तो दिया था, लेकिन पूरे पांच साल पर काबिज बने रहने के बावजूद ये सर्वजन, बहुजन और मुस्लिम समाज के हिमायती साबित नहीं हो पाए। यह लोकतंत्र की ही महिमा है कि हाथी की पीठ पर चढ़ गुण्डों को मतदाता ने जमीन पर ला पटका।

यह भी लोकतंत्र की ही महिमा है कि देश का कोर्इ भी दलित नागरिक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न देख सकता है। संविधान में प्रदत्त ऐस प्रावधानों के चलते आम आदमी सक्रिय राजनीति में बढ़-चढ़कर भागीदारी कर रहा है। वह समाज और राजनीति मे नए परिवर्तन लाने का माददा भी रखता है। अलबत्ता यहां संकट वह नेतृत्व है, जो जन-आकांक्षाओं पर खरा उतरने की बजाए स्वयं की आकांक्षा पूर्ति की जल्दबाजी में अपना धीरज खो देता है। परिणामस्वरूप वास्तविक दायित्व और नैतिक कत्र्तव्यपरायणता को नजरअंदाज कर असमाजिक तत्वों के अनैतिक गठजोड़ की गोद में जा बैठता है। अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह मायावती ने भी यही किया, वे बहुजन के उभार से मिली उस शक्ति को आत्मसात नहीं कर पार्इं, जो राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बाद तीसरे अखिल भारतीय दल के रूप में राष्ट्रीय विकल्प बनता। इसी विकल्प की केंद्रीय धुरी से दलित प्रधानमंत्री अवतरित होता। इस जनभावना को आत्मसात करने के लिए मायावती को कांशीराम से विरासत में मिली बहुजन हितकारी विचारधारा और जनहित के स्वस्थ कार्यक्रमों को र्इमानदारी से धरातल पर क्रियानिवत करने की जरूरत थी। लेकिन माया ने डा. भीमराव आंबेडकर, कांशीराम, हाथी और स्वयं की आदमकदम मूर्तियां सार्वजनिक स्थलों पर लगाकर केवल सतही स्तर पर जनभावनाओं को भुनाने की कोशिश की।

मायावती ने मूर्तियों के माध्यम से दैवीय प्रतीक गढ़ने की जो कवायद की है, हकीकत में ऐसी कोशिशें ही आज तक हरिजन, आदिवासी और दलितों को कमजोर बनाए रखती चली आर्इ हैं। उधानों पर खर्च की गर्इ 685 करोड़ की धन राशि को यदि बुंदेलखण्ड की गरीबी दूर करने अथवा दलितों के लिए ही उत्कृष्ठ विधालय व अस्पताल खोलने में खर्च किया जाता तो एक तरफ खेती-किसानी की माली हालत निखरती और किसान आत्महत्या के अभिशाप से बचते। शिक्षा और स्वास्थ्य की निशुल्क व उत्तम व्यवस्था वंचितों को मिलती तो पीढ़ी दर पीढ़ी वंचित तबकों के लोग शैक्षिक गुणवत्ता हासिल करके समर्थ वर्ग के लोगों के साथ प्रतिस्पर्धा की होड़ में बराबरी पर खड़े होते। किंतु मायावती के पूरे कार्यकाल में मानक उपायों और नर्इ दृषिट का सर्वथा अभाव रहा। इसके उलट सवर्ण और पिछड़ों को लुभाने के लिहाज से कानून शिथिल किए गए। उत्तर-प्रदेश अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत आने वाले 22 प्रकार के अपराधों को संज्ञान में लेने का जो प्रावधान था, उन्हें हत्या और बलात्कार की घटनाओं तक सीमित कर दिया गया। अब नतीजों के फौरन बाद उत्तर-प्रदेश में दबंग और दलितों के बीच जातीय आधार पर जो जानलेवा वर्ग संघर्ष छिड़ा है, उस परिप्रेक्ष्य में उत्पीड़न की गंभीर प्रकृति के अपराध अब गैर जमानती अपराधों की श्रेणी में नहीं आएंगे। बाजारवादी व्यवस्था के लिए भूमि अधिग्रहण और विस्थापन का सिलसिला भी सिंगूर और नंदीग्राम की तर्ज पर चल पड़ा था। भटटा पारसौल इसका उदाहरण है। राहुल गांधी ने हस्तक्षेप कर इस उत्पीड़न पर अंकुश लगाने का काम किया।

आरक्षण की सुविधा के चलते चिकित्सा और उच्च तकीनीकी संस्थानों में प्रवेश पा लेने वाले दलित छात्रों का जातीय और अंग्रेजी में पारंगत न होने के आधार पर लगातार उत्पीड़न जारी रहा। नतीजतन करीब एक दर्जन छात्रों ने आत्महत्याएं कीं। लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्व विधालय में वंचित तबकों के करीब पचास ऐसे छात्र हैं, जिन्हें शास्त्रीय अंग्रेजी की कमजोरी के चलते लगातार अनुत्तीर्ण किया जा रहा है। दिल्ली के एम्स में तो हाल ही में अनिल कुमार मीणा ने ऐसे ही उत्पीडन के चलते आत्महत्या की है। अंग्रेजी अज्ञानता के चलते 18 दलित छात्रों ने आत्महत्याएं की हैं। किंतु मायावती ने इस भाषायी समस्या के निदान की कभी कोर्इ पहल की हो, सुनने अथवा देखने में नहीं आया ? देश में 13 लाख से भी ज्यादा दलित महिलाएं सिर पर मैला ढोने के काम में लगी हैं, लेकिन मायावती ने कभी इस समस्या से निजात के लिए कोर्इ हुंकार भरी हो, कानों में गूंजी नहीं ? ऐसे में बसपा का दिलित वोट बैंक खिसके न तो क्या करे ? चूंकि मायावती को उत्तर-प्रदेश जैसे बड़े और घनी आबादी वाले राज्य में काम करने का सुनहरा अवसर मिला था, इसलिए उन्हें अपनी महत्वकांक्षा से ज्यादा दलितों के सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक कल्याण कैसे हों, ये उपाय करने की जरूरत थी ?

मायावती जिस जाति और वर्ग से आती हैं, गोया उन्हें अनुभूति होनी चाहिए की मूर्तिपूजा, व्यक्तिपूजा और प्रतिपूजा के लिए ढ़ली प्रस्तर-शिलाओं ने मानवता को अपाहिज ही बनाने का काम किया है। जब किसी व्यकित की व्यक्तिवादी महात्वाकांक्षा, सामाजिक चिंताओं और सरोकारों से बड़ी हो जाती है तो उसकी दिशा बदल जाती है। मायावती भी अपने कार्यकाल में इसी मानसिक दुर्दशा की शिकार हुर्इ हैं। महत्वकांक्षा और वाद अंतत: हानि पहुंचने की ही पृष्ठभूमि रचते हैं। आंबेडकर के समाजवादी आंदोलन को यदि सबसे ज्यादा किसी ने हानि पहुंचार्इ है तो वह ‘बुद्धवाद है। जिस तरह से बुद्ध ने सामंतवाद से संघर्ष कर रहे अंगुलिमाल से हथियार डलवाकर राजसत्ता के विरूद्ध जारी जंग को खत्म करवा दिया था, उसी तर्ज पर दलितों के बुद्धवाद और माया की अखिल भारतीय स्तर पर उभरकर प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा ने व्यवस्था के खिलाफ जारी लड़ार्इ को कमजोर बना दिया।

बहुजन समाजवादी पार्टी को वजूद में लाने से पहले कांशीराम ने लंबे समय तक दलितों के हितों की मुहिम डीएस-4 के माध्यम से लड़ी थी। इस डीएस-4 का सांगठनिक ढांचा खड़ा करने के वक्त बसपा की बुनियाद पड़ी और पूरे हिन्दी क्षेत्र में बसपा की बुनियाद तैयार करने की कोशिशें र्इमानदारी से हुर्इं। कांशीराम के वैचारिक दर्शन में आंबेडकर से आगे जाने की सोच तो थी ही, दलित और वंचितों को करिश्मार्इ अंदाज में लुभाने की प्रभावी शक्ति भी थी। यही कारण रहा कि बसपा दलित संगठन के रूप में सामने आर्इ, लेकिन मायावती की धन व पद लोलुपता ने बसपा में विभिन्न प्रयोगों व प्रतीकों का तड़का लगाकर उसके बुनियादी सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ किया। नतीजतन आज बसपा सवर्ण और दलित तथा शोषक और शोषितों का बेमेल समीकरण बनकर रह गर्इ है। बसपा के इस संस्करण में कार्यकर्ताओं की दलीय स्तर पर सांगठनिक संरचना गायब है। वे गैर दलित उम्मीदवारों को बसपा का टिकट बेचती हैं। ऐसी ही कुछ अन्य वजहें हैं कि मायावती ने उन नीतियों और व्यवहार को महत्व नहीं दिया जो सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक विषमताएं दूर करते हुए सामाजिक समरसता का माहौल बनाते।

सवर्ण नेतृत्व को दरकिनार कर पिछड़ा और दलित नेतृत्व दो दशक पहले मण्डल आयोग की अनुशंसाएं लागू होने के बाद इस आधार पर परवान चढ़ा था कि पिछले कर्इ दशकों से केंद्र व राज्यों में सत्ता में रही है। कांग्रेस ने न तो सबके लिए शिक्षा, रोजगार और न्याय के अवसर उपलब्ध कराए और न ही सामंतवादी व जातिवादी संरचना को तोड़ने में अंहम भूमिका निभार्इ। बलिक नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों ने इन जड़-मूल्यों को और सींचने का काम किया। लिहाजा सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक विषमता की खार्इ उत्तरोत्तर प्रशस्त ही हुर्इ। इसलिए अपेक्षा थी कि पिछड़े, हरिजन, दलित व आदिवासी समूह राजनीति व प्रशासन की मुख्यधारा में आएं। स्त्रीजन्य वर्जनाओं को तोडं। अस्पृथ्यता व अंधविश्वास के खिलाफ लड़ार्इ लडे़ं। ऐसा होता तो रूढ़ मान्यताएं खंडित होकर समाज से विसर्जित होतीं और विचार संपन्न नव-समाज आकार लेता। लेकिन पिछड़े और दलित नेताओं ने किसी भी प्रकार के पाखण्ड से लड़ने को जोखिम इन दो दशकों में नहीं उठाया। इसके उलट कांग्रेस सरकार ने जरूर स्वतंत्रता के पश्चात तीन दशकों में छुआछुत को दंडनीय अपराध, दलितों को सामाजिक सम्मान व नौकरियों में आरक्षण के प्रावधान संविधान में दर्ज कराए। क्योंकि इस दौर में कांग्रेस के लिए दलितों व वंचितों के संदर्भ में राजनीतिक स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा, सामाजिक समरसता और शैक्षिक व आर्थिक विषमता दूर करने के मुददे ज्यादा महत्वपूर्ण थे।

बहरहाल मायावती ने उत्तर-प्रदेश में निकाय चुनाव न लड़ने और वहां से पलायन कर राज्यसभा में जाने के फैसलों के जरिए निशिचत कर दिया है कि वे प्रत्यक्ष राजनीतिक-संघर्ष से अघोषित दूरी बना रही हैं। इस सिथति ने यह भी तय किय है कि मायावती केवल अनुकूल परिसिथतियों में सिंहसनारूढ़ रहकर शासन करने की इच्छा रखती हैं। तय है आंबेडकर और कांशीराम के वैचारिक दर्शन से किसी दलित के प्रधानमंत्री बनने की जो आधार-भूमि तैयार की थी, उस पर फिलहाल मायावती ने विराम ही नहीं, पूर्णविराम लगा दिया है।

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