लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

Posted On by &filed under साहित्‍य.


डा. राधेश्याम द्विवेदी

गौतम बुद्ध के अवतरण के पहले का यह प्रसंग है। कोशल के सूर्यवंशी राजा प्रसेनजित या ओक्कका की बड़ी रानी की बड़ी पुत्री एवं शाक्यों की राजमाता पिया बहुत रुपवती थी। उसको बाद में कुष्ट रोग हो गया। उसके  भाइयों ने कहा कि यदि राजमाता उन लोगों के साथ रहेगी तो उन लोगों को भी कुष्ट रोग हो जाएगा। वह कपिलवस्तु नगर छोड़कर नदी के किनारे एकान्त जंगल में रहना शुरू कर दिया। वहां भूमि में एक गुफा बनाकर रानी को रहने के लिए दे दिया गया। यहीं उसे भोजन पहुंचा दिया जाता था। इसी समय बनारस के राजा राम को भी कुष्ट रोग हो गया था । अपनी पत्नी और सभासदों से घृणित होकर उन्होंने अपना राज्य त्यागकर अपने बड़े लड़के को सौंपकर हिमालय के उसी बन में प्राण त्यागने के लिए आ गये। वे एक फलप्रधान जंगल में रहने लगे। जंगली वृक्षों के पत्ती व फल फूल खाकर तथा वहां की आबोहवा उस राजा को अनुकूल लगा और धीरे धीरे वह कुष्ट रोग से मुक्त हो गया।

एक दिन रात में राजा उस स्त्री की आवाज सुना और सुबह उधर ही चल दिया। गुफा में राजकुमारी को देख वह उसे भी वही पत्ता व फल खिलाया जिससे स्वयं ठीक हुआ था। दोनों ने जंगल में शादी करके रहने लगे। बाद में राजा राम का पुत्र भी जंगल में अपने पिता का कुशल क्षेम जानने को आया। पुत्र की सहायता से राजा राम ने कोल नामक वृक्षों को काटकर अपना आवास बना लिया । इस कारण इनके आवास को कोलनगर तथा उन्हें कोलिय कहा जाने लगा। बनारस के राजा नागवंशी थे। कोलियों को नागवंशी भी कहा जाता था किन्तु शाक्यों से निकटता तथा अभिन्न रुप से जुड़ने के कारण से कोलिय शाक्य के रुप में ही जाने जाते रहे। बाद में बनारस कें राजकुमार ने अपने पिता को वहां से घर ले जाना चाहा परन्तु राजा राम कोल नगर को छोड़कर वापस नहीं गये। बाद में 16 जनपद एवं गणराजयों में कोल एक गणराज्य बना । इसकी दो शाखाये बनी। एक रामगाम के कोलिय और दूसरे देवदाह के कोलिय। कोलियों की मुख्य शाखा देवदह में रह गयी होगी तथा उनके वंशजों ने अपने पिता के नाम को स्थाई रखने के लिए रामगाम नामक नगर बसाया जाना माना जा सकता है।

कोलवंश का प्रथम राजा राम था, जिसने कोल वृक्ष के नीचे एक नगर, एक तालाब तथा सुरक्षा की अन्य व्यवस्थायें किया गया था। सर्वप्रथम कोलवृक्ष के पास अपना आश्रय लेने के कारण इन्हें कोल कहा जाने लगा। बौद्ध ग्रंथ महाबग्ग; भाग 1 पृ.352-55  के अनुसार ’’कोलिय मुनि कोल के वंशज थे।’’ कुणाल जातक के अनुसार ’’जब शाक्य कोलियों को गाली देने या उपहास करने की इच्छा करते तो कहते थे कोलिय एक समय कोल वृक्ष के पास जानवरों जैसे रहते थे ।’’

राम और पिया की घटना महाबस्तु में थोड़ा भिन्न मिलता है। जब राजमहल में चिकित्सकों से यह असाध्य रोग ठीक नहीं हुआ, तो राजकुमारी के सारे शरीर में मलहम लगवाकर तथा खाने की दवा व पर्याप्त भोजन पानी रखकर उस राजकुमारी के भाइयों ने गुफा में राजकुमारी को अन्दरकर , गुफा का द्वार ढककर बन्द कर दिया और कपिलवस्तु लौट आयें। राजकुमारी उसी गुफा की गर्मी में रहने लगी और कोढ से मुक्त हो गई। उनका शरीर और सुन्दर हो गया। एक शेर मानव का गंध सूंघते- सूंघते वहां आया और मिट्टी खोद-खोदकर गुफा के द्वार को बन्द कर दिया। उस गुफा के स्थान को ‘व्याघ्रपज्ज‘ कहा जाने लगा क्योंकि उस स्थान को एक व्याघ्र ने पता लगाया था। वहीं पास ही एक राजर्षि कोल रहते थे जिन्हें वहां के प्राकृतिक दवाओं का ज्ञान था। वह वनस्पति फूल और फल खाते थे  जो आसानी से उपलब्ध था। वे उस गुफा के द्वार पर आये, जहां वह कन्या रहती थी। राजा ने धूल फेककर उस शेर को भगा दिया। उसने वह पत्थर हटा दिया तो द्वार खुल गया । शाक्य कन्या और सुन्दर लगने लगी। राजा ने कहा- ’’देवी तुम कौन हो ?’’ वह उत्तर दी- ’’मैं नारी हूं , मैं कपिलवस्तु के किसी शाक्य की कन्या हूं, मुझे कोढ़ हो गया था। मैं उन्हें छोड़कर अब शेष जीवन यहीं बिताऊंगी।’’

पिया की सुन्दरता देख राजा बहुत प्रभावित हुए। उस कन्या के सम्पर्क में उस राजर्षि मुनि का निर्वाण एवं अध्यात्मिक ज्ञान खत्म हो गया। वे दोनों साथ-साथ रहने लगे। उनसे 16 जोड़े पुत्र पैदा हुए। जो सुन्दर तथा गूंथे बाल वाले थे। माता द्वारा पुत्रों को कपिलवस्तु यह कहकर भेज दिया गया  कि वहां उनके मामा व नाना लोग रहते हैं। वे उनके भरण-पोषण का प्रबन्ध करेगें। उनके अच्छे आचार-विचार एवं सुन्दरता से शाक्य प्रभावित हुए। 500 शाक्यों की एक सभा बुलायी गयी। इन बच्चों ने अपना परिचय दिया – ’’वे राजर्षि कोल के पुत्र हैं जो हिमालय की तलहटी में रहते हैं। मेरी मां एक शाक्य कन्या है।’’ यह सुनकर उनके जीवित नाना लोग बहुत प्रसन्न हुए। राजा कोल ने उन्हें बनारस राज्य के लिए भी वारिस दिया था।

शाक्य वहुत खुश हुए और कहा कि वे भी शाक्य हैं और उनकी शदियां भी एक दूसरे में होगी। वे उन्हें शाक्य कन्या देकर जीविकोपार्जन के लिए खेत भी दिये। चूंकि वे ऋर्षि कोल की सन्ताने थी इसलिए वे कोलिय कहलाये। यहां दण्डपाणि ( सुप्पबुद्ध ) शासक बने। इनकी पुत्री गोपा गौतम बुद्ध की पत्नी बनी थी। सुप्पबुद्ध का लड़का देवदत्त था जो बुद्ध का ममेरा भाई एवं साला दोनों था। महाबस्तु यह भी कहता है कि एक कोलिय राजकुमार गौतम बुद्ध से कला एवं धनुष-वाण में प्रतिस्पर्धा करता था परन्तु वह पराजित हो गया था। वह उनका प्रमुख प्रतिद्वन्दी भी बन बैठा था। दोनों राजकुमारों का पालन पोषण भी एक साथ हुआ था। उसने बुद्ध से दीक्षा लेकर अलौकिक शक्तियां अर्जित कर रखी थी। देवदत्त मगध के राजा अजातशत्रु की मदद से बुद्ध को मरवाना भी चाहता था , परन्तु सफल न हो सका। अन्त समय इसे अनेक कष्ट झेलने पड़े थे।  अदना कहता है कि कोलिय राजासुप्पवस की कन्या सात साल से गर्भिणी थी। बुद्ध को बुलवाया गया। उन्होंने निर्वाण की दीक्षा दिया और विना कष्ट के कन्या ने सात वच्चों को जन्म दिया था।

स्थलीय विवाद

अपने शोध के अध्ययन में मैंने पाया कि कपिलवस्तु व देवदाह की भातिं ही दो-दो रामग्राम का अस्तित्व भी मिलता है। कनिंघम ने रामग्राम को बस्ती जनपद में नगर खास से पूरब देवकाली नामक स्थान को पहले माना था। परन्तु इनके सहयोगी कार्लाइल ने बाराछत्तर से 20 मील पूर्व वर्तमान रामपुर देवरिया को रामग्राम की संभावना व्यक्त की है। यह स्थान बस्ती सदर तहसील के महुली पश्चिम परगना में बस्ती मुख्यालय से 29 किमी द. पू. मुण्डेरवा स्टेशन के पास बताया गया है। यहां तीन सड़के मिलती है। पास ही में कठनइया नदी भी बहती है। वहुत कुछ संभव हैं यहां पुरानी राजधानी रही हो। यह गांव एक पुराने टीले पर बसा है। इस गांव के पास ही महान मड़वा ताल भी स्थित है। यहां छोटे छोटे 6 तालाब होने का उललेख मिलता हैं । कार्लाइल ने ह्वेनसांग तथा फाहयान का अनुसरण करते हुए इस स्थान की पुष्टि की है।

रामग्राम के कोलियों का शाक्यों से कोई सम्बन्ध था इसका विवरण नहीं मिलता है। शाक्यों का सम्बन्ध देवदाह के कोलियों से तो मिलता हैं। यह भी हो सकता है कि देवदाह के बाद ही रामग्र्राम का अस्तित्व आया हो। या जिस प्रकार विडुदभ ने कपिलवस्तु के शाक्यों का समूल नाश कर दिया था उसी प्रकार देवदाह को भी नष्ट कर दिया होना संभावित है। क्योंकि इनका ही रक्त की समीपता शाक्यों से ज्यादा थी। जब ये दोनो स्थान निर्जन हो गये होगें तो बचे हुए कोलियों ने कुछ दूर जाकर रामग्राम स्थल को चुनकर अपना आशियाना बनाया होगा।

दीर्घ निकाय के महापरिनिर्वाण सूत्रान्त में बताया कि रामग्राम के निवासी अलग वंश के थे। भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को आठ भागों में विभक्त करके एक भाग पर रामगाम के कोलियों ने स्तूप बनवाया था । बाद में अशोक जब सम्राट बना तो उसने अन्य सात स्तूपों को खोदवाकर उससे 84000 स्तूपों का निर्माण कराया था। रामग्राम के स्तूप की रक्षा नाग करता था । बहुत कुछ सम्भव है कि राम मूलतः नाग वंशी क्षत्रिय था इसलिए उनके किसी उत्तरापेक्षी को नाग कहकर सम्बोधित किया गया हो। नागों ने उसे टूटने से रोका था । वाद में राजा का नेक मंशा समझकर नागों ने उसे तोड़ने की अनुमति भी दे दी थी। राजा को यह पता चला कि बुद्ध का आठवां स्तूप नष्ट हो चुका है तो उस स्तूप केा विना नुकसान पहुचाये उसे छोड़कर चला गया था। वहां वनस्पतियां उगकर जंगल का शक्ल ले ली थी। एक दिव्य हार्थी पानी ला लाकर वहां को पोखर भरा था। वहां फूुल पौधे लगाये गये थे। बाद में वहां मदिर भी बना तथा भिक्षु भी रहने लगे थे। चीनी यात्रियों के विवरण के अलावा अन्य कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है।

इन्हीं विवरणों को आधार बनाकर कुछ यूरोपीय विद्वानों ने उल्टे सीधे खोज शुरू किया तो उनके पहचान में स्थल भिन्नता उजागिर होने लगी। उ. प्र. राज्य पुरातत्व संगठन के श्री आर सी सिह ने 1970 -72 में यहां का सर्वेक्षण किया तो यहां ईंटों का टीला पाया था। आश्चर्य है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस स्थान को प्रकाश में लाने का कोई प्रयत्न नहीं किया हैं और ना ही भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के नक्शे पर यह स्थल आ सका है। मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध सांची के दक्षिणी तोरण द्वार की दूसरी बड़ेरी पर रामगाम के स्तूप का चित्रण उकेरा हुआ मिलता है।

रामग्राम के बारे में एक और इतिहासकार स्मिथ ने लिखा है कि यह लुम्बनी ये 40 मीलदूर था। जो नेपाल तराई में निचलौल थाने से थोड़ा पूर्व उत्तर धरमुली ( धर्मपुरी ) को माना है। जिसका मत बाद मे खण्डित हो गया । एक और रामग्राम दक्षिणी नेपाल के लुम्बनी मण्डल के नवलपरासी जिले में नगरपालिका एवं शहर के रुप में माना जाता है। परासी का पूर्वनाम अभी भी बरकरार है। यह स्थान महेन्द्र राजमार्ग से 9 किमी.की दूरी पर होना बताया जाता है। यहां सड़क मार्ग से बस व जीप से जाया जा सकता है। वर्तमान बुमाही से 5 किमी. की दूरी पर यह स्थित है। जो महेन्द्र मार्ग से एक छोटे शहर से जुड़ा है। यहां महेशपुर नामक एक चौराहा भी है। इस चौराहे से रामग्राम की दूरी मात्र 3 किमी है। वर्तमान समय में वायुमार्ग से सुनवाल नामक नगर से यहां पहंुचा जा सकता है। भगवान बुद्ध के माता पिता दो अलग अलग जनपद के मूलनिवासी थे। पिता कपिलवस्तु के शाक्य थे तो मां व मौसी रामग्राम के कोलियों की कन्या थी। उनके परिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों या राख को तत्कालीन सोलहों जनपदों में से प्रमुख केवल आठ भागों में विभक्त करके बांट दिया गया था। इस राज्य में राजधानी के निकट एक भाग पर विशाल स्तूप का निर्माण कराया गया था। इसमे उनकी अस्थियां अभी भी बरकरार है। इस स्तूप पर शिवाला बना हुआ है। लोग बड़ी श्रद्धा के साथ यहां जाते हैं। यह 7 मीटर ( 23 फिट ) ऊंचा है। इसका दक्षिणी और पूर्वी हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका है। इसके संरक्षण की आवश्यकता है। इसके पश्चिम की ओर समोच्च गिरि है। यहां पेड़ो के नीचे मूर्तियां स्थापित हैं ।

स्तूप के 3 किमी. दक्षिण पश्चिम पाली भगवती का मंदिर भी है। इसी क्षेत्र में स्थित उजयिनी को भी बुद्ध के मां का घर कहा जाता है। यहां जराही नामक एक छोटी नदी भी बहती है। बाद में अशोक ने अन्य सात स्तूपों को खोदवाकर उस अवशेष से 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया था। रामग्राम के स्तूप की रक्षा नाग या अजगर से किये जाने की कहानी बताई जाती है। बहुत कुछ सम्भव है कि कोल वश के संस्थापक राम मूलतः नाग वंशी क्षत्रिय रहे हों। इसलिए उनके उत्तरापेिक्षयों को नाग कहकर भी सम्बोधित किया जाता था। इस नाग वंशी राजाओं द्वारा रक्षा होने की पुष्टि बौद्ध साहित्य में होती है। नेपाल तथा भारत सरकार द्वारा रामग्राम पुरास्थल की खुदाई करवा कर इसके असली इतिहास का पटाक्षेप कर देना चाहिएं।

आज कोलिय गणराज्य की ऐतिहासिक पहचान या तो खो गया है या महत्वहीन हो गया है। ना तो यहां कोई विषद उत्खनन हुआ है और ना तो कोई अनुसंधान ही । इतना ही नहीं परस्पर विरोधाभास पहचान वाले ये स्थल इसके विकास में अवरोध डालने का काम करते हैं। किसी जमाने में इतना सम्पन्न व वैभव रखने वाला स्थान आज अपनी सही पहचान प्रमाणित करने में समर्थ नहीं हो पा रहा है। मुझे तो नेपाल के तराई में स्थित नवल परासी का रामगाम ज्यादा प्रमाणिक लगता हैं । उसके प्रमाण भौतिक रूप में देखे जा सकते हैं। वह स्थल विकसित तथा पारम्परिक रूप में पूजा भी जाता है। हमारे इतिहासकारों को इस परिप्रेक्ष्य में उत्खनन, चिन्तन, मनन तथा अनुशीलन करके सर्वमान्य हल ढ़ूढ़ना ही चाहिए।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz