लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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1सूखे के दर्द के बाद मिलेगी भरपूर मानसून की खुशी

संजय सक्सेना

सूरज से तपती धरती को मानसून जल्द तराबोर कर देगा।मौसम विभाग ने जब से दो साल के बाद अबकी बार पूरे देश में भरपूर वर्षा होने की बात कहीं है तब से देशवासी यही कह रहे है कि भगवान के घर देर हैं अंधेर नहीं,लेकिन मानसून जब आयेगा तब आयेगा फिलहाल तो सूखा प्रदेश की करोंड़ो की आबादी के लिये जानलेवा बना हुआ है। बुुंदेलखंड का नाम दिमाग में आते ही चेहरे के सामने एक ऐसी तस्वीर घूमने लगती हैं, जहां भूखमरी हर तरफ दस्तक देती है।कुपोषण यहां अभिशाप की तरफ कुंडली मारे बैठा रहता है। पशु-पक्षी तो दूर यहं इंसानों तक को एक-एक घूंट पानी के लिये जद्दोजहद करते देखा जा सकता है।हर तरफ सूखा ही सूखा नजर आता है। कोई भी मौसम हो और कोई भी महीना यहां चंद दौलतमंदों और साहुकारों के घरों के अलाावा किसी भी चैखट पर खुशहाली डेरा नहीं डालती है।यह सिलसिला कोई दो-चार वर्ष पुराना नहीं है।बुंदेलखंड कभी हराभरा हुआ करता था,खुशियां लोंगो के द्वार खड़ी रहती थी,लेकिन सरकारी बेरूखी के साथ-साथ प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन करने वाले तत्वों ने बुंदेलखंड की हरियाली और खूबसूरती दोंनों पर ग्रहण लगा दिया।कुए, हैंडपम्प, पोखर, तालाब, नदियां सब सूख गये हैं।जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है, बुंदेलखंड के ग्रामीण और शहरी दोंनो ही क्षेत्रों में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। पेयजल संकट इतना भयावह है कि ग्रामीण कई किलोमीटर दूर से पानी लाने को मजबूर हैं।लोग सुबह से ही पानी की तलाश में निकल जाते हैं और शाम होने तक उन्हे अगर पानी मिल पाता है तो यह उनका नसीब है। बुंदेलखंड की सूखे की समस्या से निपटने के लिये बांध बनाये गये थे,लेकिन अब बांध का पानी भी सूखने लगा है। कई सालों से बारिश न होने से जलस्तर बहुत नीचे खिसक गया है। जानवरों के लिए भी पीने को पानी नहीं है। आलम यह है जानवर पानी की तलाश मे तलहट के कीचड़ में फँसकर दम तोड़ने को मजबूर हो रहे है।सूखे के चलते खेती की दुर्दशा ने किसानों को खुदकुशी करने को मजबूर कर दिया है।
गौरतलब है कि बुंदेलखंड के किसान पिछले डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से आत्महत्या और सर्वाधिक जल संकट से जूझ रहे हैं। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो अप्रैल वर्ष 2003 से मार्च 2015 तक 3280 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। सूखे की भीषण मार झेल रही बुन्देलखण्ड की बंजर धरती के किसान इस बार भी पहले सूखे और तैयार फसल पर ओलों की बारिश से आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। पिछले 2 महीनों में शायद ही कोई ऐसा दिन गया हो, जब किसी किसान के आत्महत्या का मामला सामने न आया हो।अगर यह कहा जाये कि बुंदेलखंड पिछले कई वर्षो से प्राकृतिक आपदाओँ का दंश झेल रहा है तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी। भुखमरी और सूखे की वजह से अब तक 62 लाख से अधिक किसान यहां से पलायन कर चुके हैं। तकरीबन सभी राजनीतिक दल किसानों के लिए झूठी हमदर्दी जताते रहते हैं।समूचे बुन्देलखण्ड में स्थानीय मुद्दे गायब हैं और उसकी जगह जातिवादी की राजनीति चरम पर है। बुन्देलखण्ड के जिलों में बांदा से 7 लाख 37 हजार 920 ,चित्रकूट से 3 लाख 44 हजार 801,महोबा से 2 लाख 97 हजार 547, हमीरपुर से 4 लाख 17 हजार 489 ,उरई (जालौन) से 5 लाख 38 हजार 147, झांसी से 5 लाख 58 हजार 377 व् ललितपुर से 3 लाख 81 हजार 316 और मध्य प्रदेश के हिस्से वाले जनपदों में टीकमगढ़ से 5 लाख 89 हजार 371 ,छतरपुर से 7 लाख 66 हजार 809,सागर से 8 लाख 49 हजार 148 ,दतिया से 2 लाख 901,पन्ना से 2 लाख 56 हजार 270 और दतिया से 2 लाख 70 हजार 277 किसान और कामगार आर्थिक तंगी की वजह से महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं।
बुंदेलखंड के लिये राहत पैकेज बेइमानी हो गये हैं। ऊपर सें जितना पैसा चलता है,वह जरूरतमंद किसानों और ग्रामीणों तक पहंुचते-पहुंचते तितर-बितर हो चुका होता है। सूखे से जूझ रहे यूपी के बुंदेलखंड क्षेत्र के किसानों को एनडीआरएफ के तहत सूखा राहत के रूप में 1,303 करोड़ रुपए की राशि मिलेगी, जबकि मनरेगा के तहत दिहाडी मजदूरी को बढ़ाकर 150 रुपए प्रति दिन कर दिया गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा प्रदेश की स्थिति का जायजा लेने के बाद यह फैसला लिया गया। यह भी तय किया गया कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन को तेज किया जाएगा और इसका विस्तार सभी ब्लॉकों में किया जाएगा ताकि आय का वैकल्पिक स्रोत सृजित हो सके। इसके अलावा बुंदेलखंड में विभिन्न परियोजनाओं और योजनाओं के तहत प्राथमिकता से पानी टंकियों के निर्माण, कुंआ खुदाई, खेतों में तालाबों का निर्माण आदि कराया जाएगा।इसी के साथ सहायता राशि किसाानों के बैंक खाते में सीधे भेजी जा रही है। गृह मंत्रालय जांच करेगा कि क्या राज्य आपदा राहत कोष के तहत 25 प्रतिशत की सीमा पर छूट दी जा सकती है।
उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड के किसानों के लिए सूखा भले ही अभिशाप बना हो, लेकिन यह सूखा खनन कारोबार से जुड़े माफियाओं के लिए वरदान साबित हो रहा है। नदियों का जलस्तर घट जाने का बेजा लाभ उठाते हुए कारोबारी पुलिस और प्रशासन के गठजोड़ से ‘लाल सोना’ यानी बालू (रेत) लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा, यह बात चरितार्थ होती दिख रही है। आज पानी के लिए लोग जिस तरह से तरस रहे हैं, उससे वह दिन दूर नहीं है जब पानी के लिए मार-काट मच जाएगा। हमारे देश में अभी कई ऐसी जगहें हैं जहां आज पानी के लिए झकड़े तक हो रहे हैं। यूपी के कई जिले सूखे की मार झेल रहे हैं वहां जलस्तर गिरता जा रहा है। लोगों को अपनी प्यास बूझाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।बुंदेलखंड में कुदरत के कोप के चलते ऐसे हालात हो गए हैं कि बेटियों की शादियां तक रुक गईं हैं। बेटियों की शादी तो तय हो गई है, लेकिन उसके बाद भी उनके हाथ पीले नहीं हो पा रहे हैं। दरअसल यहां के ग्रामीण इलाकों में शादियां रबी की फसल की कटाई के बाद ही होती हैं, लेकिन इस बार यहां फसल तो हुई नहीं, इस कारण से किसानों के हाथ खाली हैं। ऐसी स्थिति में किसानों के पास पैसा नहीं है और इसी कारण से ग्रामीण बेटियों की शादियां भी नहीं कर पा रहे हैं।बात यूपी सरकारों की कि जाये तो उन्हें बुंदेलखंड की याद तभी आती है जब चुनाव नजदीक आते हैं।यूपी में अगले साल चुनाव होने वाले हैं। सभी राजनीतिक पार्टियों को चुनाव के समय ही बुंदेलखंड की याद आती है। सपा, भाजपा, बसपा, कांग्रेस या काई अन्य पार्टी सभी चुनाव के समय ही बुंदेलखंड की समस्याओं को लेकर चिंतित हो जाती हैं। जैसे मानो जिसकी सरकार बन जाएगी तो वह बुंदेलखंड के लोगों के सारे कष्टों को दूर कर देगा। लेकिन ऐसा हकीकत में होता नहीं है।चुनाव के समय तो पार्टियां बड़े-बड़े वादे करती हैं, लेकिन चुनाव के बाद वे अपने वादे जैसे भूल जाती हैं और बुंदेलखंड की याद उन्हें नहीं आती है। फिर जैसे ही चुनाव आता है बुंदेलखंड की याद सताने लगती है।
गत दिनों देशभर से आए हजारों किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर जोरदार प्रदर्शन किया। भारतीय किसान यूनियन ने सरकार से मांग की कि बुंदेलखंड पर श्वेत पत्र जारी किया जाए। किसानों ने राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन भी भेजा है।उधर,लगातार दो साल से सूखे से पीडि़त बुंदेलखंड में सरकारी राहत का हाल जानने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव गत दिनों दो दिन के दौरे पर महोबा पहुंचे।उन्होंने कई स्थानों पर किसान परिवारों से बात की और खुद उन्हें अपने हाथों से राहत सामग्री सौंपी। इस दौरान उन्होंने कहा कि किसानों के संकट को हम समझते हैं इसीलिए समाजवादी सरकार बुंदेलखंड मे पेयजल के लिए कई योजनाएं चला रही है। प्रदेश सरकार लोगों तक पानी पहुंचाने का काम तेजी से कर रही है। प्रदेश सरकार बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा डैम बना रही है।इस सबके बीच अच्छी खबर यह है कि दो वर्षो के जबर्दस्त सूखा झेल रहे लोंगों को अबकी से मानसून खूब भिगोयेगा,जिसकी वजह से अच्छी पैदावार होने की भविष्यवाणी की जा रही है,इसके साथ-साथ देश की आर्थिक स्थिति भी मजबूती हासिल कर सकती है।

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