लेखक परिचय

अनिल पांडेय

अनिल पांडेय

युवा पत्रकार अनिलजी ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय से पत्रकारिता में स्‍नातकोत्तर डिग्री हासिल की है।

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भारत, इंडोनेशिया और फिलीपींस, ये तीन देश एशिया के सबसे भ्रष्ट और निकृष्ट नौकरशाही वाले देश घोषित किए गए हैं। पॉलिटिकल एंड इकोनॉमिक रिस्क कंसलटेंसी की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि इन देशों की नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) असक्षम एवं लालफीताशाही से बंधी हुई है।

वहीं सिंगापुर तथा हांगकांग की नौकरशाही को सबसे ज्यादा सक्षम माना गया है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि भारतीय राजनेता हमेशा यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि वो देश से भ्रष्टाचार को खत्म कर देंगे, तथा नौकरशाही में सुधार लाएंगे। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है सत्ता का केंद्र होने की वजह से नेता भी इसमें सुधार करने में असक्षम हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक इसका सबसे बुरा असर विदेशी निवेश पर पड़ रहा है, और यदि इसे सुधारा नहीं गया तो हालात बदतर होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

यह तो हुई रिपोर्ट की बात, और यह असलियत भी यही है कि नौकरशाही कई मौकों पर नेताशाही पर हावी साबित हो जाती है। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश को लेते हैं। कमोबेश यहां हर वर्ष आयकर और भ्रष्टाचार निरोधक दस्ते द्वारा नौकरशाहों के घरों एवं संबंधित स्थानों पर छापा मारा जाता है और करोड़ों की संपत्ति का पता चलता है।

लेकिन इन नौकरशाहों पर कभी कार्रवाई नहीं होती है। मामला चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो। उदाहरण कई हैं, बस कुछ अखबार पलटने की जरूरत है। हां अगर यह नौकरशाह चाहें तो नेताओं के घोटाले जरूर उजागर हो जाते हैं। जैसा कि होता रहा है पूरे देश में। कई बार ऐसा नहीं भी होता है। क्योंकि वहां आपसी मेलजोल से काम हो कर लिया जाता है। दरअसल यह एक गठबंधन है। नेताओं और नौकरशाही का गठबंधन। इसे खत्म करना कम से कम हमारे देश में तो मुमकिन नहीं जान पड़ता है।

इसकी कई वजह हैं। पहली तो यह कि हमारे देश के ‘माननीय’ नेता या तो कम पढ़े-लिखे होते हैं या फिर अनपढ़ होते हैं। उनके लिए देश के विकास से अभिप्राय सिर्फ भाषण देने, दौरे और बयानबाजी तक ही सीमित होती है। सरकारी कामकाज और क्रॉस चेकिंग जैसा काम सिर्फ गिने-चुने नेता ही करते हैं। या यूं कहें कि स्कॉलर टाइप के नेता ही ऐसे कामों में रुचि लेते हैं।

इसका सीधा फायदा मिलता है नौकरशाहों को। वो अपनी सुविधानुसार इन ‘माननीयों’ को समझाते रहते हैं। हम लोग आए दिन इस तरह की खबरें पढ़ते रहते हैं कि फलां नेता या मंत्री अपने विभाग के नौकरशाहों से परेशान है। कलेक्टर से परेशान है, वगैरह। लेकिन उनकी कोई सुनता नहीं है। वहीं कई बार ऐसी खबरें भी आती हैं कि नेताओं की वजह से परेशान नौकरशाह या तो प्रतिनियुक्ति में चले जाते हैं या फिर तबादला ले लेते हैं।

अब बात करते हैं दूसरी वजह पर। इस वजह को गठबंधन या ‘नेक्सस’ भी कहा जा सकता है। कुछ ‘समझदार’ टाइप के नेता इस तरह की व्यवस्था बनाकर चलते हैं, जिससे उनके भ्रष्टाचार की राह एकदम आसान बनी रहे। इसके लिए वो अपने नजदीकी नौकरशाहों की टीम बनाते हैं, जिनके साथ मिलकर कानूनी तरीके से भ्रष्टाचार किया जा सके। इस भ्रष्टाचार के कई तरीके हैं, मसलन पसंदीदा पद या विभाग में अपने ‘खास’ अधिकारी की नियुक्ति। ऐसे में बिना किसी लाग लपेट के सारे काम आसानी से हो जाते हैं।

ऐसी व्यवस्था आपको पंचायत से लेकर नगर निगम तक और राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक में देखने को मिल सकती है। बस जरूरत है तो समीकरणों को समझने की। कई ऐसे उदाहरण मौजूद भी हैं, जो वर्तमान में सत्तासीन हैं।

यहां एक बात और बताना ठीक रहेगा कि जो नौकरशाह होते हैं, ये अपना करियर पाथ बड़े ही व्यवस्थित तरीके से बनाकर चलते हैं, ताकि रिटायरमेंट के बाद भी ‘व्यवस्था’ बनी रहे। कहने का मतलब कि यह तो आप सबने देखा ही होगा कि कैसे रिटायरमेंट के बाद कई आला नौकरशाह राजनीति के गलियारे में पहुंच जाते हैं। इस गलियारे में पहुंचने का रास्ता, विधान सभा, राज्य सभा, लोकसभा या किसी आयोग के रास्ते से होकर आता है। यहां आने का मकसद हमेशा जनसेवा तो नहीं होता है। क्योंकि नौकरशाह होकर जब काम नहीं कर सके तो नेता बनने के बाद क्या करेंगे, इसमें संशय तो रहेगा ही।

खैर, काफी हो गया विश्लेषण। हम यानी जनता जानती सब है पर कर कुछ नहीं सकती है, क्योंकि जनता के पास एकमात्र हथियार है, वोट, जो पांच साल में एक बार ही देने का अवसर आता है। इसलिए अभी बात करना ज्यादा प्रभावी नहीं होगा।

-अनिल पांडेय

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1 Comment on "नौकरशाही और नेताशाही की एकता"

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sunil patel
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ठीक कह रहे है. चोर चोर……………
इसका सबसा बड़ा कारण – हमारे देश में नौकरशाह नौकरी को बपोती समझते है. नौकरी पेत्रक सम्पति है. अत डर किस बात का.

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