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बर्मा में 7 नवम्बर के दिन चुनाव पर विशेष

-के. विक्रम राव

चुनाव के इतिहास में अजूबा होगा अगले सप्ताह (7 नवम्बर) जब पड़ोसी म्यामांर में संसदीय निर्वाचन होंगे। तानाशाही राष्ट्रों के कीर्तिमान टूटेंगे, मानव त्रासदी का नया अभिलेख खुदेगा। लोकशाही का ढ़ोंग रचा दिखेगा। अव्वल तो बीस वर्ष बाद चुनाव आयोजित हो रहे हैं। इसकी खासियत क्या हैं? सर्वाधिक विलक्षण बात है कि मतदाता सूची गोपनीय रखी गई है। आबादी के छ: करोड़ में से कुल चार करोड़ मतदाता हैं। दाम चुकाने पर भी केवल चुनिन्दा प्रत्याशियों को वोटर लिस्ट मिल रही है, वह भी टुकड़ों में। नया संविधान (2008), जिसका बड़ी संख्या में आमजन ने बहिष्कार किया था, के प्रावधान के अन्तर्गत संसद की एक चौथाई सीटें फौजी शासन मनोनयन द्वारा भरेगा। करीब नब्बे सीटों पर केवल एक ही नामांकन स्वीकारा गया है। चौदह प्रदेशीय तथा राष्ट्रीय संसद के दोनों सदनों के 1158 सदस्यों के लिए कुल सवा तीन हजार उम्मीदवार हैं जिनमें 82 निर्दलीय हैं और शेष सैंतीस दलों द्वारा नामित हैं। ये निर्दलीय प्रत्याशी सेना द्वारा समर्थित है, अत: वे सब अपनी जीत से आश्वस्त हैं। कानूनन चुनाव प्रचार निषिद्ध है। सियासी सभायें प्रतिबन्धित हैं। प्रसारण और पोस्टर की अनुमति नहीं है। मीडिया पर राज्य का पूरा नियंत्रण है। केवल एक अंग्रेजी भाषा का दैनिक है जिसमें अस्सी प्रतिशत सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां ही छपती हैं। स्वतंत्र प्रेंस केवल 1960 तक था जबतक फौज सत्ता में नहीं आई थी।

चुनाव में दो बड़ी पार्टियां शरीक हो रहीं है। एक है यूएसडीपी जिसके नेता है सेना द्वारा मनोनीत प्रधान मंत्री थीन सीइन। दूसरी है नेशनल यूनिटी पार्टी जिसके नेता है उपसेनापति तुनयी जो खाकी वर्दीधारी हैं। आंग सान सू ची की नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी जिसने 1990 के आम चुनाव के अस्सी प्रतिशत सीटें जीती थी, ने इस चुनाव का बहिष्कार किया है। इसके दो कारण हैं। पहला यही कि पिछलें चुनाव (27 मई 1990) में मिले अपार जनादेश को नकारना होगा। तब फौज ने बजाय सत्ता हास्तान्तरण के तानाशाही बरकरार रखी थी। दूसरा है पार्टी मुखिया सूची, जो पन्द्रह वर्षों से कैद में है, को मताधिकार से वंचित कर दिया जाना। नतीजन चुनाव में वे दोनों पार्टियां ही बहुमत हासिल कर लेंगी जिन्हें सेनाधिकारी चला रहे हैं। अर्थात् चित और पट दोनों फौजी तानाशाहों की होगी। इन पार्टियों ने जो पैंतालीस पृष्ट का चुनाव घोषणा पत्र जारी किया है, उसमें केवल पांच लाइनों में ही लोकतांत्रिक परिवर्तन का उल्लेख है। मतदान की पड़ताल अथवा निगरानी के लिए म्यामांर सरकार ने विदेशी मीडिया को वीजा देने से इन्कार कर दिया है। विदेशी, खासकर सयुंक्त राष्ट्र संघ, के पर्यवेक्षकों को सरकार ने ”कन्डक्टेड टूर” पर वोटर बूथ घुमाने की अनुमति दी है।

म्यामांर के कई लोकतंत्र समर्थकों ने प्रश्न उठाया कि इन परिस्थितियों में चुनाव हो ही क्यों? कारण स्पष्ट है। एक राय यह है कि बीस सालों से चुनाव नहीं हुए अत: जैसा भी हो मतदान द्वारा थोड़ा बहुत ही सही विरोध तो व्यक्त किया जा सकता है। सैनिक शासन इन चुनावों से अपना लक्ष्य हासिल करना चाहता है कि ”जनतंत्र की वापसी” से विदेशी विनिवेश फिर शुरू हो जाय। खाकी की जगह यदि सूट में शासक दिखें तो नागरिक सत्ता की भ्रान्ति उपजाई जा सकती है। अर्थात् चुनावी उबटन से तानाशाही का फेशियल हो रहा है। म्यामांर की आर्थिक दशा इस वक्त गहन चिकित्सा केन्द्र (आईसीयू) में भर्ती किए गये मरीज से बेहतर नहीं है। वित्तीय ढांचा खोखला हो गया है। विश्व के दरिद्र देशों में नौंवे सोपान पर खड़ा है म्यामांर, जहां मासिक आय प्रति व्यक्ति केवल 1540 रुपये है। भारत के दिहाड़ी श्रमिक की आय का यह आधा है। उर्वरा धरती के लिए मशहूर म्यामांर आज चावल आयात करता है। कभी निर्यात करता था। मशहूर बर्मी सागौन की लकड़ी दुनिया भर में घर सजाने के काम आती थी। आज जंगल की बेतरतीब कटाई के कारण घट गई है। कच्ची अफीम की तस्करी से जरूर राष्ट्रीय आय बढ़ी है। मेकांग नदी की मछलियां दक्षिण एशिया में स्वादिष्टतम मानी जाती हैं। अत: उनका निर्यात भी राष्ट्रीय उत्पाद में खास योगदान करता है। तेल की खपत और कीमत में बढ़ोतरी से उत्पादन के बाकी माध्यमों पर बुरा प्रभाव पड़ा है। मुद्रा क्यात का अवमूल्यन हुआ है जिससे महंगाई कुलाचे भर रही है।

म्यामांर के इस विभ्रान्त मतदान से दुनियाभर के पर्यवेक्षक विस्फारित हैं, विस्मित हैं। फूहड प्रहसन देख रहे हैं। उन देशों की मीडिया से आई प्रतिक्रियायें दहलाने वाली हैं। इनमें मिस्र और जिम्बावे भी शामिल है जहां होस्नी मुबारक ने राष्ट्रपति चुनाव में निन्याबे प्रतिशत वोट पाये थे (क्याेंकि वे एकमात्र प्रत्याशी थे) और राबर्ट मुगाबे ने अपने प्रतिद्वन्दी को मतदान के समय कैद कर दिया था। बस एक ही राष्ट्र है जो म्यामांर निर्वाचन का पुरजोर समर्थन कर रहा है। वह है जनवादी चीन जहां वोट की परिभाषा ही भिन्न है। कम्युनिस्ट चीन फौजी म्यामांर तानाशाहों के दावे का पैरोकार है कि मतदान ”कुन्मिंग करोति वाचालम्।” वह अपने दूसरे पड़ोसी उत्तर कोरिया का उदाहरण देता है जहां मार्कसवादी किम जाेंग इल ने वोटरों के लिए मताभिव्यक्ति को गूंगे के लिए गुड बना डाला है। कम्युनिस्ट चीन ने दुनिया के लोकतांत्रिक राष्ट्रों से आग्रह किया है कि म्यामांर के चुनाव का सम्मान करें क्योंकि यह उसका आन्तरिक मामला है। कोई भी हस्तक्षेप उसे बर्दाश्त नहीं होगा जैसे तिब्बत या ताईवान पर कोई चीन को बुरा कहे।

आखिर चीन म्यामांर के अधिनायकवादी चुनाव का जनवादी अनुमोदन क्यों कर रहा है? चीन के उत्पादों के लिए म्यामांर के फौजियों ने अपना बाजार खोल दिया है। उसके दक्षिण-पश्चिमी प्रान्त येनान से म्यामांर के क्याकफिन द्वीपस्थल तक तेल की पाइपलाइन बन रही है जिससे चीन को तेल सस्ते में उपलब्ध होगा। अफ्रीकी बन्दरगाहों से हिन्द महासागर के रास्ते संपर्कसूत्र मिल जाएगा। पूर्वोत्तर भारत पर जासूसी और सामारिक केन्द्र बनाने का अड्डा मिल जाएगा। ”भारत को घेरो” वाली रणनीति के तहत बलूचिस्तान से लेकर श्रीलंका तक चीन की तैयारियों को म्यांमार एक और कड़ी मुहय्या कराएगा।

भले ही कम्युनिस्ट चीन और इस्लामी पाकिस्तान बौद्ध बर्मा का साथ दें, मुद्दा उठता है कि लोकतंत्र के प्रहरी अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि क्या कर रहें हैं? बस कागजी कार्रवाही? मौखिक हमदर्दी? ईराक और अफगानिस्तान में लोकतंत्र लाने की हामी भरने वाला अमरीका म्यांमार में दूर से ही रूचि ले रहा है? क्योंकि वहां से न तेल और न खनिज पदार्थ ही मिलेंगे।

लेकिन जनाक्रोश की सुई घूमती है इरावदी नदी के पश्चिम में, भारत की ओर। गनीमत है कि लाखों भारतीयों की म्यामांर के प्रति संवेदना को अमर्त्य सेन ने वाणी दी जब उन्होंने कहा: ”चीन की भूमिका से चिंतित होकर महात्मा गांधी का देश भारत उसी का अनुसरण कर रहा है और अपने आदर्शों को खो रहा है। मेरे लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री और विश्व के सबसे दयालु और मानवीय राजनेताओं में से एक मनमोहन सिंह को म्यामांर के कसाइयों का स्वागत करते और एक साथ फोटो खिंचवाते हुए देख, मेरा दिल टूट गया है।”

सूची केवल मीराण्डा कालेज में पढ़ी, दिल्ली में पली, शेख हसीना जैसी राजनेता नहीं है। वह आंग सांन की दुहिता है जिसने राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ अंग्रेजों को खदेड़ा था। जयप्रकाश, लोहिया, अशोक मेहता, मधु लिमये के साथ एशियन सोशलिस्ट संघर्ष को रोशनी दी थी। स्वर्णभूमि रत्नगर्भा म्यामांर हमारा ब्रह्मदेश है, मुस्लिम भारत के लिए प्रथम स्वाधीनता पुरोधा बहादुरशाह जफर का समाधि स्थल है, बौद्ध भारत के लिए पगोड़ा-स्तूपों की शोभा से आप्लावित तीर्थस्थल है। मगर तिजारती भारतीय शासनतंत्र की दृष्टि में मात्र सौदा है, सिद्धांत नहीं।

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