लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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सिद्धार्थ शंकर गौतम

केंद्र सरकार के खुदरा व्यापार में ५१ फ़ीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, डीजल के दामों में बढ़ोतरी, घरेलू गैस सिलेंडरों पर सब्सिडी घटाने जैसे जनहितैषी मुद्दों पर सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से ममता बैनर्जी ने कांग्रेस और सरकार पर जमकर निशाना साधा| सोमवार को जंतर मंतर पर तृणमूल कांग्रेस की रैली और विरोध प्रदर्शन के बीच ममता ने सरकार को चुनौती देने के लहजे में कहा कि यदि हिम्मत हो तो वह उन्हें जेल में डाल दे| ममता ने रैली को संबोधित करते हुए सरकार पर देश को बेचने का आरोप तक लगा दिया| उन्होंने आम आदमी के साथ होने के सरकार के दावे की भी जमकर खिल्ली उड़ाई| ममता के तेवरों से अब सरकार सकते में हैं| ममता के मंच पर मौजूद एनडीए संयोजक शरद यादव ने ममता को बंगाल की शेरनी के साथ ही लोकनायक जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया के संघर्ष की प्रतिमूर्ति बताते हुए उनकी तारीफ़ की| ममता ने भी इशारों-इशारों में एनडीए को समर्थन देने के संकेत दिए हैं| वहीं द्रमुक के करूणानिधि की ममता के साथ मौजूदगी ने सरकार विरोधी लहर को धार दी है| खबर है कि द्रमुक भी सरकार से समर्थन वापस ले सकती है| इसी बीच खबर है कि झारखंड विकास मोर्चा ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया है| उसके लोकसभा में २ सांसद सरकार को समर्थन दे रहे थे| सरकार के अन्य सहयोगी दल भी अब उसकी खिलाफत करते नज़र आ रहे हैं| ममता के हालिया रुख को देखते हुए कहा जा सकता है कि ममता अब सरकार के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने पर आमादा है| वे चुन-चुन कर सरकार और कांग्रेसियों पर निशाना साध रही हैं| पश्चिम बंगाल में संगीतकार बिमान भट्टाचार्य के लापता होने से जुड़े २० साल पुराने मामले की सीआईडी से जांच के आदेश देकर उन्होंने कांग्रेस सांसद दीपा दासमुंशी को घेरने की कोशिश की है| दरअसल भट्टाचार्य के परिवार ने इस केस में दासमुंशी को दोषी ठहराया था| ऐसी खबरें थी कि सरकार में व्यापक रूप से होने जा रहे भावी फेरबदल में दीपा दासमुंशी को मंत्रिपद प्राप्त हो सकता है| अब जबकि ममता पूरे जोश से सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोल चुकी हैं तो सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकार बैकफुट पर है|

 

माँ, माटी और मानुष की राजनीति को अपने जीवन का ध्येय बताने वाली ममता बैनर्जी ने सरकार के आर्थिक सुधारों के फैसले का विरोध कर राजनीतिक कयासबाजी बढ़ा दी है| यदि ममता पुनः अपने पुराने सहयोगी एनडीए का समर्थन करती हैं तो यह आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए करारा झटका होगा| हालांकि ममता के पैंतरों को विशुद्ध रूप से राजनीतिक महत्वकांक्षा का नाम दिया जा रहा है किन्तु वे जिन मुद्दों पर राजनीति कर रही हैं अव्वल तो वे जनसरोकारों से जुड़े मुद्दे हैं; दूसरे ममता की राजनीतिक पारी देखते हुए कहा जा सकता है कि उन्होंने हमेशा ही राजनीतिक हितों की अपेक्षा जनहितों को महत्व दिया है| इस बार ममता के सरकार विरोधी कदम ने उन्हें सही मायनों में जनता का नायक बना दिया है| ममता के तेवरों और सरकार के अहम सहयोगियों की वक्र दृष्टि से केंद्र की सेहत पर कोई ख़ास असर भले ही न पड़े और अंकगणित के मामले में भी उसे चिंतारत होना की जरुरत नहीं है किन्तु क्या अपने सहयोगियों को बिसरा कर सरकार सही कर रही है? ऐसे में तो माया-मुलायम सरकार पर अनावश्यक दबाव ही बनायेंगे और जब भी उन्हें लगेगा कि सरकार उनके हितों की अनदेखी कर रही है वे उससे समर्थन वापस लेने में तनिक भी नहीं हिचकिचाएंगे| चूँकि महंगाई और विदेशी निवेश से जुड़ा मामला जनता के करीब था लिहाजा सरकार को अपने अन्य सभी सहयोगी दलों को विश्वास में लेना चाहिए था| अब यदि ममता सरकार को आँखें दिखा रही हैं और सरकार उन्हें उनके गृहराज्य में घेर रही है तो यह तो सरासर एक-दूसरे के प्रति दुश्मनी प्रदर्शित करना हुआ| इन सब में आम आदमी के मुद्दों का क्या? खासकर सरकार से तो यह उम्मीद की जाती है कि वह जनहितैषी फैसले लेगी ताकि समाज के सभी तबकों को उसका समुचित लाभांश प्राप्त हो सके| पर यहाँ सरकार अपनी प्रदत जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रही है और सहयोगियों को ही उसके विरुद्ध मोर्चा खोलने हेतु विवश होना पड़ रहा है| अब जबकि ममता और सरकार की अदावत अपने चरम पर ही है तो ऐसे में सरकार को समर्थन दे रहे अन्य दलों को भी विचार करना चाहिए कि जो सरकार अपने बड़े व अहम सहयोगी की राय को दरकिनार कर सकती है, अपने हित साधन के बाद तो छोटे-मंझोले दलों को वह भाव ही नहीं देगी| आम आदमी से लेकर राजनीतिक दलों को भी सरकार ने तुच्छ समझ लिया है| ममता का सरकार के प्रति कठोर रवैया उचित ही है| वैसे भी जो जिस प्रवृति का होता है उसके साथ वैसा ही सलूक करना चाहिए| यही राजनीति है

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