लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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rajnath singh.• माननीय अध्यक्ष महोदय, आज लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा को प्रारंभ करने के लिए प्रतिपक्ष की तरफ से मैं अपना प्रतिवेदन प्रारंभ कर रहा हूं।

• 17 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद यह रिपोर्ट आज सदन के पटल पर है। इस रिपोर्ट में अनेक आपत्तिजनक एवं आधारहीन बातें हैं। भगवान राम को वनवास काटकर सत्य और धर्म को स्थापित करके पुन: राज्य प्राप्त करने में तो 14 वर्ष लगे थे परन्तु उससे भी लंबा समय व्यतीत करके सरकार की यह रिपोर्ट सत्य के आस-पास भी नहीं पहुंच पा रही है। उल्टे, सत्य को कैसे इन 17 वर्षों में विकृत करने का प्रयास किया गया उसके अनेक प्रमाण इस रिपोर्ट में मौजूद हैं।

• सर्वप्रथम तो मैं बाबरी मस्जिद शब्द पर अपनी आपत्ति व्यक्त करता हूं। वैधानिक भाषा (Legal Language) में इस स्थल को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर (Ram Janambhoomi-Babri Mosque Complex) कहा जाता है। माननीय न्यायालय ने भी उसे विवादित ढांचा ही कहा है। परन्तु लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट पृष्ठ संख्या 383 के पैरा नं. 63.6 की अंतिम पंक्ति में विवादित ढांचे को बाबरी मस्जिद बताया गया है। उसके बाद कमीशन की रिपोर्ट की पृष्ठ संख्या 494 के पैरा नं. 74.1,2 की सातवीं पंक्ति में भी विवादित ढांचे को बाबरी मस्जिद कहा गया है। सरकार के द्वारा भी और मीडिया में अनेक स्थानों पर इस आयोग की रिपोर्ट को बाबरी मस्जिद विध्वंस पर आई हुई रिपोर्ट कहा जाता है। यह वैधानिक दृष्टि से गलत है, ऐतिहासिक दृष्टि से गलत है और सामाजिक दृष्टि से भी गलत है। विवादित ढांचे के गिरने को बाबरी मस्जिद विध्वंस कहने से साम्प्रदायिक भावनाओं की संवेदना पर प्रतिकूल असर पड़ता है अत: सरकार को इसका प्रयोग बंद करना चाहिए।

• यदि कोई उसे इतिहास में पीछे जाकर बाबरी मस्जिद कहना ही चाहे तो अपने ऐसे मित्रों के लिए मैं यह कहना चाहूंगा कि इतिहास में पीछे जाने की दूरी आप अपनी मर्जी से तय नहीं कर सकते। यदि इतिहास में पीछे जायेंगे तो फिर यह मूलत: बाबरी मस्जिद नहीं बल्कि मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम का जन्मस्थान है। वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई खुदाई में उस स्थल के नीचे प्राप्त हुए मंदिर के अवशेष मेरी इस बात को प्रमाणित करते हैं।

• महोदय, इस रिपोर्ट में सिर्फ इतनी ही गलती नहीं है। इसमें इतनी भारी गलतियां हैं कि इससे रिपोर्ट बनाने में तथ्यों के प्रति घोर लापरवाही और उपेक्षा का भाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए जहां इस आन्दोलन से जुड़े हुए व्यक्तियों का जिक्र है वहां पृष्ठ संख्या 270 पैरा 46.8 में एक व्यक्ति का नाम लिखा है Additional DGP Intellegence. यह बिना नाम का ADG कौन था या पूरा का पूरा ADG Intellegence का कार्यालय कार सेवा में शामिल था। पृष्ठ संख्या 279 पैरा 47.5 में लिखा है Leaders of Muslims. ये कौन से नेता थे। रिपोर्ट के पेज 120-121 के पैरा 29.24 में लिखा है कि मंडल आयोग की रिपोर्ट अनुसूचित जाति को आरक्षण देने के लिए आई थी। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी रहे स्वर्गीय मोरोपंत पिंगले को पृष्ठ संख्या 958 में शिवसेना का दिखाया गया है। कहीं-कहीं तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राजनैतिक दल के रूप में इंगित किया गया है। रिपोर्ट के पेज 273 पैरा-46.47 में कांग्रेस के सांसद श्री जगदम्बिका पाल का नाम भी कारसेवकों की सूची में है। मैं श्री जगदम्बिका पाल एवं कांग्रेस पार्टी से जानना चाहता हूं कि क्या जगदम्बिकापाल कार सेवा में गये थे।

• तथ्यों के बारे में इतनी लापरवाही से लिखी गई रिपोर्ट अपने उद्देश्य में बिल्कुल स्पष्ट और सधे हुए तरह से एक राजनैतिक एजेंडा के तहत लिखी हुई प्रतीत होती है। रिपोर्ट में पेज-362 पैरा -61.05 में लिखा है ”A mad race designed to embaress the Congress party by BJP and other members of Sangh parivar” अर्थात यह आन्दोलन कांग्रेस पार्टी को समस्या में डालने के लिए था। यह राजनैतिक वक्तव्य हैं। वहीं रिपोर्ट के पेज-597 पर भारतीय जनता पार्टी पर पूरा एक अध्याय है और लिखा है कि “The failure of BJP as responsible political party”. कोई राजनैतिक दल अपनी राजनैतिक भूमिका के निर्वहन में कितना परिपक्व और उत्तरदायित्वपूर्ण है इस पर टिप्पणी करने का अधिकार किसी घटना की जांच करने वाले आयोग का नहीं होता। विशेषकर जब वह राजनैतिक दल देश का प्रमुख प्रतिपक्षी दल हो और 6 वर्ष तक देश का नेतृत्व कर चुका हो। कांग्रेस तथा भाजपा इन दोनों दलों पर आयोग द्वारा की गई टिप्णियों का अन्तर और उसका राजनैतिक लहजा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक चुनौती है।

• महोदय, लिब्राहन कमीशन के Term of reference में पेज 4 पैरा 2.1.1 में लिखा है To find out the sequence of events and all the facts and circumstances relating to the event of 6 December, 1992……..”

• अध्यक्ष महोदय, लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट यह कहती है कि 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचे का विध्वंस एक स्वत: स्फूर्त प्रक्रिया न होकर एक सुनियोजित षड्यंत्र का परिणाम थी और यह षड्यंत्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा रचा गया और भाजपा इसमें शामिल थी। महोदय, मैं यह मानता हूं कि उस दिन अयोध्या में जो कुछ घटित हुआ वह जनाक्रोश की अनियंत्रित अभिव्यक्ति के कारण घटित हुआ न कि किसी व्यवस्थित योजना के कारण। हां 6 दिसम्बर 1992 को अनियंत्रित जनाक्रोश को उत्पन्न करने के लिए जो परिस्थितियां उत्तरदायी थीं, यदि उसका विश्लेषण करना हो तो वह विश्लेषण केवल कुछ महीनों का नहीं हो सकता बल्कि वह तो वर्षों, दशकों और शताब्दियों का Sequence of events है।

• 1528 में बाबर के सेनापति मीरबाकी द्वारा जहां मस्जिद बनायी गई वह स्थान भगवान राम से जुड़ा एक पवित्र स्थान था यह तथ्य तो ऐतिहासिक रूप से स्थापित है। अब्बुल फज़ल की आइने-अकबरी अयोध्या को राम का जन्मस्थान और अत्यंत पवित्र स्थल मानती है। 1816 में लिखी हुई नसीहत-ए-बिस्त-ओ-पंजम अज चहल निशाही बहादुशाही ने स्वयं औरंगजेब की पौत्री द्वारा जन्मभूमि के विध्वंस और वहां बाबरी मस्जिद के निर्माण की बात कही गई। 1885 में लखनऊ से फारसी में प्रकाशित गुमश्ते: हालात -ए-अजोध्या अवध में मौलवी अब्दुल करीम ने भी यही लिखा है। और 1973 में लखनऊ के प्रतिष्ठित मुस्लिम धार्मिक विश्वविद्यालय नदवा-तुल-उलेमा के प्रमुख मौलाना अब्दुल हसन नदवी उर्फ अली मियां ने अपने पिता की अरबी में लिखी प्रसिध्द पुस्तक ”हिन्दुस्तान इस्लामी अहद मे” का उर्दू अनुवाद किया जिसका अंग्रेजी अनुवाद भी 1977 में प्रकाशित हुआ, उसमें भी यह लिखा है कि जहां हिन्दुओं की मान्यता है उसी स्थान पर बाबर ने मस्जिद बनवाई।

• अपने पश्चिमी इतिहासकार और यात्री जैसे विलियम फिंच, जोजेफ टीफैंथलर से लेकर 1854 के ईस्ट इंडिया कंपनी के गजट में इस बात का उल्लेख है कि वहां पर मस्जिद खड़ी कर देने के बाद भी निरन्तर हिन्दू तीर्थ यात्री आते थे और उसके बाहर भजन-कीर्तन करने के लिए संघर्ष होता रहता था। और मजे की बात यह है कि आर्कियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया ने 1934 में जब अयोध्या में प्राचीन स्थलों का अन्वेषण करना प्रारंभ किया तो उस बाबरी मस्जिद को राम जन्मभूमि के रूप में लिखा गया और वहां पर चिह्न अंकित किया गया “Site No. 1 Janambhoomi”.

• महोदय, इसलिए इस विवाद से जुड़ी हुई घटनाओं की श्रृंखला तो इतनी पुरानी है कि जब यह सरकारें और संसद भी नहीं थीं परन्तु लिब्राहन आयोग ने तो आजादी के बाद की घटनाओं का भी उल्लेख नहीं किया।

• इस परिसर में मुस्लिमोें के लिए नमाज अदा करने पर कोई वैधानिक प्रतिबन्ध नहीं था। “There was no order to prohibit muslims to perform namaj, but no namaj was don since 1934″.

• 1934 से वहां नमाज नहीं हो रही थी और 1949 में राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद परिसर में मूर्तियों की स्थापना हुई और न्यायालय के आदेश से वहां पूजा अर्चना अनवरत आज तक चल रही है। 80 के दशक के मध्य में राम मंदिर आन्दोलन प्रारंभ होने तक के 35-40 वर्षों में सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए क्या प्रयास किया, क्या यह परिस्थिति की पृष्ठभूमि के लिए आवश्यक नहीं था? विशेषकर तब जब फरवरी 1986 में न्यायालय ने एक कदम और आगे जाकर जन्म भूमि का ताला खोलने का आदेश कर दिया। फिर नवम्बर 1989 में श्रीराम जन्मभूमि का शिलान्यास भी हुआ। फिर भी मन्दिर निर्माण के प्रयासों को सरकार द्वारा लगातार रोका गया।

• मैं सरकार से ये पूछना चाहता हूं कि 1949 से जो पूजा हो रही थी ओ मन्दिर में हो रही थी या म मस्जिद में, जिसका ताला खुला और जिसका शिलान्यास हुआ। वह मन्दिर था या मस्जिद। महोदय न्यायालय के आदेश से चल रही पूजा अर्चना और ताला खुलने के बावजूद मन्दिर का लगातार विरोध करके हिन्दू समाज के न्यायसंगत और विधिसम्मत अधिकार के प्रति 40 वर्षों तक बरता गया उपेक्षा का व्यवहार मेरी दृष्टि में इस घटना की पृष्ठभूमि के लिए बहुत बड़ा कारण है।

• आज कांग्रेस पार्टी के नेता ये कह रहे हैं कि यदि गांधी परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री होता तो ऐसा कभी नहीं होता। तो मैं याद दिलाना चाहूंगा कि 1949 में मूर्ति स्थापित होने के समय प्रधानमंत्री पंडित नेहरू थे। और उ0प्र0 के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त थे। और 1989 में शिलान्यास के समय प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी और उ0प्र0 के मुख्यमंत्री नारायण दत्ता तिवारी थे। राव को दोष देनेवाली कांग्रेस सही है। या उसे निर्दोष कहने वाली रिपोर्ट?

• यदि आयोग ने 6 दिसम्बर 1992 की घटना की पृष्ठभूमि का पूरी तरह विश्लेषण किया होता तो शाहबानो केस का उल्लेख कैसे नहीं आता। याद कीजिये 1986 में शाहबानो केस में न्यायालय का निर्णय धार्मिक आधार पर बदल दिया जाता है और ठीक उसी समय हिन्दू समाज से यह कहा जाता है कि धार्मिक आधार, और वह भी कोई सामान्य धार्मिक आधार नहीं बल्कि अपने आराध्य भगवान की जन्मभूमि की मान्यता पर कोर्ट का निर्णय मान लो।

• इतना ही नहीं आयोग ने फिर 30 अक्तूबर और 2 नवंबर 1990 को उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार द्वारा कारसेवकों का जो नरसंहार किया गया और उसके बाद उपजे साम्प्रदायिक विद्वेष के वातावरण का कोई उल्लेख ही नहीं किया है। जबकि विवादित ढांचा गिरने के बाद तत्कालीन केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल पर प्रतिबंध निर्धारित करने के लिए गठित बाहरी ट्रिब्यूनल में पृष्ठ संख्या 72 पर सरकार के इंटेलीजेंस विभाग द्वारा यह माना गया है कि सितम्बर से दिसम्बर 1990 के मध्य देश में साम्प्रदायिक तनाव चरम पर था। ऐसे समय में श्री राजीव गांधी द्वारा मुलायम सिंह की सरकार का समर्थन एवं बाद में नरसिंह राव सरकार द्वारा इस गंभीर संवेदनशील मुद्दे पर टालमटोल ने परिस्थितियों को इन दो वर्षों में किस प्रकार प्रभावित किया। आश्चर्य है कि आयोग ने घटना के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों में इसका जिक्र तक नहीं किया।

• आयोग ने घटना के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों का विश्लेषण करते समय अल्पसंख्यक वर्ग के कई नेताओं द्वारा दिये गये अनेक भड़काऊ बयान जो कि सीधे तौर पर राष्ट्रविरोधी भी कहे जाते हैं उनका कोई कोई जिक्र नहीं किया। मैं याद दिलाना चाहता हूं कि उस समय भी कुछ अल्पसंख्यक नेताओं ने गणतंत्र दिवस के बहिष्कार की धमकी दी थी तो एक अल्पसंख्यक नेता (आजम खान) ने यह कहा था कि ”भारत माता एक डायन है जो हम सबको खा जाना चाहती है।”

• इन सबका क्या प्रभाव किसी भी समाज के मनोविज्ञान पर पड़ेगा अथवा पड़ा होगा इसका कोई भी विश्लेषण लिब्राहन आयोग ने अपनी 1100 पन्नों की पोथी में नहीं किया। किसी भी सामान्य व्यक्ति को यदि आप पहले चिढ़ायेंगे फिर आहत करेंगे, फिर न्याय में टाल-मटोल करेंगे और फिर यदि कोई अप्रत्याशित प्रतिक्रिया होती है तो उसे सुनियोजित षड्यंत्र कहेंगे। मेरा मानना है कि षड्यंत्र के रचियता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा नहीं बल्कि उपरोक्त कारनामों के कारण श्री राजीव गांधी और श्री नरसिंह राव की केन्द्र सरकार और श्री मुलायम सिंह यादव की उत्तर प्रदेश सरकार माने जाने चाहिए जिनके चलते संपूर्ण भारतीय राजव्यवस्था कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकते हुए नजर आ रही थी।

• परन्तु लिब्राहन आयोग ने तो 06 दिसम्बर 1992 से केवल कुछ माह पहले की ही अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं का जिक्र तक नहीं किया है।

• मई, 1991 में जब केन्द्र सरकार के द्वारा दोनों पक्षों के मध्य वार्ता से हल निकालने का प्रयास किया गया जिसका कि उल्लेख रिपोर्ट में पृष्ठ संख्या 126 पैरा 30.1 में है उसमें इस बात का उल्लेख ही नहीं है कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की तरफ से उपस्थित विद्वान सबूत दिए बिना ही चले गये और इसके बाद पेज-195 पैरा-40.2 में लिखा है “No further time to given after 23rd October 1992 “. इसके बावजूद एक्सशन कमेटी के तरफ के विध्दान 1992 में अगली बैठक में लिखित सबूत लाना तो दूर बल्कि उपस्थित ही नहीं हुए। इस प्रकार बातचीत के माध्यम से समाधान के रास्ते स्वत: बंद हुए जिसके लिए संघ और विहिप नहीं बल्कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की तरफ के विद्वानों का नजरिया अधिक बड़ा कारण रहा। महोदय, जब वार्ताएं विफल होती हैं तब प्रतिक्रियाओं के अनियंत्रित होने का भय उत्पन्न हो जाता है। घटना की पृष्ठभूमि के इतने महत्वपूर्ण पक्ष का उल्लेख न होना आयोग के पूर्वाग्रह का स्पष्ट प्रमाण है।

• आयोग ने तत्कालीन उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह की यह कहते हुए आलोचना की कि वे कारसेवकों पर गोली चलाने के पक्ष में नहीं थे। रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 134 पैरा 30.2, 4 और पैरा 37.1, 6 में यह लिखा है कि पहले मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने दिसम्बर 1991 फिर जुलाई 1992 में प्रधानमंत्री श्री नरसिंह राव से कारसेवकों पर बलप्रयोग करने में असमर्थता व्यक्त की क्योंकि मुलायम सरकार द्वारा ऐसा करने पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी। आश्चर्य है कि आयोग ने इस पर कोई टिप्पणी ही नहीं की है कि दिसम्बर 1991 और जुलाई 1992 में उत्तर प्रदेश सरकार के स्पष्ट मंतव्य के पता लग जाने के बाद भी केन्द्र सरकार ने क्या कार्यवाही की। रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 120 पैरा 29.30 में एक कमेटी का जिक्र है जिसमें शेखावत जी और शरद पवार तथा अन्य लोग शामिल थे। यह कमेटी कार्य क्यों नहीं कर पाई इसका कोई कारण रिपोर्ट में नहीं दिया।

• आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सभी हिन्दूवादी संगठनों और विशेषकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को षड्यंत्र का दोषी ठहराया है। महोदय, यदि किसी प्रकार के योजनाबध्द षड्यंत्र का कोई प्रयास होता तो स्वयं आयोग ने पृष्ठ संख्या 154 पर लिखा है कि 1 अप्रैल, 1992 को रामनवमी के दिन अयोध्या में 7 लाख लोग एकत्रित थे और सब कुछ शांति से निपट गया। मैं याद दिलाना चाहता हूं कि जुलाई 1992 में जब कारसेवा की घोषणा हुई तो 6 दिसम्बर, 1992 को उपस्थिति कारसेवकों से कहीं बड़ी संख्या अयोध्या में उपस्थित थी। फिर भी सब कुछ शांति से निपट गया। वास्तविकता तो यह है कि इन महीनों में इस मुद्दे के प्रति उपेक्षा, तिरस्कार और मजाक का जो भाव भाजपा छोड़ अधिकांश राजनैतिक दलों ने अपनाया उसकी प्रतिक्रिया ने अनियंत्रित होकर इस घटना को अंजाम दिया। यदि योजना होती तो इससे पहले की ये तिथियां इतनी शांति से कैसे गुजर जाती।

• आयोग ने अपनी रिपोर्ट में संघ, भाजपा और कई अन्य हिन्दूवादी संगठनों और संत महात्माओं के लिए जिस प्रकार की शब्दावली का प्रयोग किया है वह स्पष्ट दर्शाता है कि आयोग एक स्वस्थ एवं निष्पक्ष विचार से नहीं बल्कि दोषारोपण की एक निश्चित मनोवृत्ति से काम कर रहा था। इसके कुछ उदाहरण मैं आपके समक्ष रखना चाहूंगा :-

• रिपोर्ट के पेज 222 में कहा गया है कि News reports can not be said fale, even if, it may be an exaggerated version. यानी समाचार पत्रों का विवरण अतिरंजित होकर भी विश्वसनीय है। पेज संख्या 248 पैरा 43.3 8 में विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं के बारे में कहा गया है। “They ostensibly told Kar Sevaks to construct the temple.” यानी जो सीधे-सीधे कहा जा रहा था वह आयोग को दिखावे के लिए लग रहा था। पेज नंबर 250 पैरा संख्या 44.2 में प्रतीकात्मक कारसेवा का निर्णय आयोग को कागजी लगता है। रिपोर्ट में लिखा है-“A Sham paper decision of symbolic Kar Seva ” रिपोर्ट के पेज 255 पैरा 56 में कारसेवकों से रूकने की अपील के विषय में लिखा है कि “Feeble reqeust for media benefit” यानी यह एक लचर अपील थी जो मीडिया में लाभ पाने के लिए की जा रही थी। रिपोर्ट के पेज 502 के पैरा 76.8 में मंदिर निर्माण आन्दोलन से जुडे हुए लोगों के लिए- Þ Little men with king sized egos” का विशेषण प्रयोग किया गया। जिन व्यक्तियों को लिटिल मैंन कहा है वे सब अयोध्या आन्दोलन से जुड़े अनेक गणमान्य और वरिष्ठ नेता थे। ऐसी टिप्पणी आयोग के अहंकार का प्रतीक है।

• वैसे आयोग को ऐसे अनुमान किन तथ्यों के आधार पर लग रहे थे इसका कोई उल्लेख नहीं। (हास्यात्मक) संभवत: आयोग को कोई इल्हाम या अंतप्रेरणा हो रही होगी।

• अत्यन्त महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य यह है कि आयोग ने कभी अयोध्या का दौरा किया ही नहीं। बगैर अयोध्या गये उन्हें सबकुछ इतना साफ-साफ समझ में आ गया। जैसे महाभारत में संजय अपनी दिव्य दृष्टि से धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर में बैठकर ही करूक्षेत्र का सारावृतान्त सुना रहे थे। वैसे ही शायद लिब्राहन आयोग को भी कोई दिव्य दृष्टि प्राप्त थी। जिसके द्वारा वे दिल्ली में बैठकर ही अयोध्या का वृतान्त अपने धृतराष्ट्र यानी सरकार को सुना रहे थे।

• वैसे यह प्रेरणा क्यों हो रही थी यह भी रिपोर्ट में ही इंगित हो जाता है। हमारी पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लालकृष्ण आडवाणी, डा0 मुरली मनोहर जोशी के लिए छद्म उदारवादी “Psudo moderate”. जैसी राजनैतिक टिप्पणी आयोग द्वारा की गई है। जो नैतिक और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से सरासर अनाधिकार चेष्टा है। रिपोर्ट में पेज 257 पैरा 44.6 में शब्द लिखा है “Charade by L.K. Advani” आगे रिपोर्ट में पेज 942 पैरा 16.6 में लिखा है कि “It cannot be assumed even for a moment that L.K. Advani, A.B. Vajpayee or M.M. Joshi did not know the designs of the Sangh Parivar”. रिपोर्ट की इन पंक्तियों से ाफ है कि श्री एल.के. आडवाणी, डा0 मुरली मनोहर जोशी एवं सर्वमान्य श्री वाजपेयी जी के खिलाफ दोषारोपण का आधार तथ्य नहीं बल्कि सिर्फ assumption है।

• किसी भी जांच आयोग का काम inductive logic के आधार पर होना चाहिए अर्थात सभी आंकड़ो और तथ्यों को एकजुट करके निष्कर्ष के द्वारा एक तस्वीर निकालने का प्रयास। परन्तु लिब्राहन रिपोर्ट ठीक इसके विपरीत deductive logic के सिध्दांत पर आधारित लगती है अर्थात साक्ष्यों और तथ्यों को अलग-थलग करके एक विशिष्ट निष्कर्ष निकालने का प्रयास करना। कमीशन की रिपोर्ट के पेज 286 पैरा 50.6 में लिखा है कि “The enquiry demands an insightful analysis of the situation by weeding out the communal, institutional or other bias from the statements of the witnesses and by precluding the possibility of hindsight bias i.e. remembering the facts consistent with the desired conclusion”. अत: स्पष्ट है कि लिब्राहन आयोग की कोशिश एक desired conclusion तक पहुंचने की थी ताकि अनेक हिन्दूवादी संगठनों को दोषी सिध्द किया जा सके। इसलिए यह रिपोर्ट एक जांच कम बल्कि चरित्र हनन का एक राजनैतिक दस्तावेज है। (Political document for character assassination).

• मैं इस रिपोर्ट को राजनैतिक दस्तावेज इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यह कानूनी मानदंडों की पूरी तरह अनदेखी करते हुए बनाई गई है। रिपोर्ट के पेज 334 पर पैरा 57.4 में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसलिए साम्प्रदायिक है क्योंकि इस संगठन का आग्रह हिन्दुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नीतियों पर रहता है। महोदय, मैं याद दिलाना चाहूंगा कि सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 में हिन्दुत्व को सम्प्रदाय नहीं बल्कि एक जीवनशैली कहा और उसके भी आगे 1996 में रमेश यशवंत प्रभु बनाम प्रभाकर काशीनाथ कुंडे के चुनाव के लिए अयोग ठहराने की याचिका पर अपना निर्णय देते हुए 1996 के वल्यूम 1 पेज 162 पैरा 44 में लिखा है उसका अर्थ है “It is an error of law to assume Hindutva as communal” अत: संघ को केवल हिन्दुत्व की विचारधारा के आधार पर साम्प्रदायिक कहना राजनैतिक विद्वेष ही नहीं बल्कि कानून की अवहेलना का भी प्रतीक है। आश्चर्य है कि सरकार ने आयोग की संस्तुतियों के पैरा 1.16 में लिखा है कि “The matter will be examine further”. यानी केन्द्र सरकार भी सर्वोच्च न्यायालय के ठीक निर्णय के विपरीत इस विषय को आगे बढ़ाना चाहती है।

• महोदय, हिन्दू समाज एक सहिष्णु और उदार समाज है जिसने विश्व के ज्ञात इतिहास में कभी भी न तो किसी देश पर आक्रमण किया और न ही अन्य मतावलंबियों के धर्म परिवर्तन का प्रयास किया। Hinduism never went for invasion and never propagated conversion. शायद लिब्राहन आयोग हिन्दुत्व की इस मूल विचारधारा को ही समझ नहीं पा रहा था और इसलिए उसने सारे हिन्दुत्ववादी संगठनों को षड्यंत्र का दोषी ठहरा दिया।

• मुझे आश्चर्य ही नहीं वेदना भी है कि जिन 68 लोगों को विध्वंस का षड्यंत्रकारी माना गया है उसमें हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी के अतिरिक्त पूज्य देवरहा बाबा जैसे संत का नाम भी शामिल है जो ढांचा विध्वंस से करीब ढाई वर्ष पूर्व ही ब्रहमलीन हो गये थे। सारा राष्ट्र इस बात को जानता है कि पूज्य देवरहा बाबा भारत के एक महान एवं श्रध्देय सन्त थे।

• किसी भी राजनीतिक दल से देवरहा बाबा का कोई संबंध नहीं था। हां, उनके भक्तों में सबसे बड़ी संख्या कांग्रेस के अनेक आदरणीय नेताओं की है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने देवरहा बाबा के सम्मान में एक पत्र लिखा था जो आज भी भारत के नेशनल आर्काइव में उपलब्ध है। डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने कुंभ मेले में स्वयं पूज्य देवरहा बाबा की पूजा की थी। और उस पूजा में पूर्व प्रधानमंत्री स्व0 लाल बहादुर शास्त्री, उत्तार प्रदेश तत्कालीन राज्यपाल के.एम.मुंशी और मुख्यमंत्री रहे डा0 सम्पूर्णानन्द एवं चन्द्रभानु गुप्त भी उपस्थित थे। 1948 में तो तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजर्षि पुरूषोत्तमदास टण्डन भी उनके दर्शन करने गये थे। पुरानी पुस्तकों में यह भी विवरण है कि 1911 में किंग जार्ज पंचम भी देवरहा बाबा के दर्शन करने गये थे। यदि उनके प्रधानमंत्रियों में निकटता के संबंध थे तो पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से। इंदिरा जी की अनन्य आस्था देवरहा बाबा में थी और उनके पुत्र पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी भी 06 नवम्बर 1989 को चुनाव से पूर्व पूज्य देवरहा बाबा का आशीर्वाद लेने गये थे। उनके साथ तत्कालीन गृहमंत्री श्री बूटा सिंह, उ0प्र0 के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्ता तिवारी एवं श्री नटवर सिंह भी साथ में गये थे। बाबा के साथ राजीव यह वार्ता 40 मिनट तक चली थी। इन दोनों के देवरहा बाबा के साथ चित्र आज भी समाचार पत्र और पत्रिकाओं के पुराने संकलनों में उपलब्ध है। मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूं कि स्व. श्री राजीव गांधी 1989 के चुनाव से पूर्व देवरहा बाबा से श्रीराम जन्मभूमि के शिलान्यास के मुद्दे पर मिलने गये थे कि नहीं? इतना ही नहीं 20 नवम्बर 1989 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री रंगनाथ मिश्र दो अन्य न्यायाधीशों के साथ उनसे मिलने गये। भारत इतने गणमान्य और आदरणीय नेताओं के श्रध्दा के केन्द्र रहे ऐसे पूज्य सन्त को षड़यन्त्रकारी सिध्द करने का प्रयास निर्लज्जता और धृष्टता का ऐसा कृत्य हैं जिससे मुझे हार्दिक पीड़ा पहुंची है।

• वैसे इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जब कांग्रेस की सरकार ने महात्मा गांधी के आदर्श राम के अस्तित्व को ही रामसेतु के मामले पर कोर्ट के हलफनामे में नकार दिया था तो इंदिरा जी समेत अपने अनेक आदरणीय नेताओं के पूज्य किसी संत को किसी आयोग की रिपोर्ट में वोट बैंक की बलिवेदी पर लांछित कर दिया जाय। तो आश्चर्य कैसा।

• गुजरात में सोमनाथ का मसला तो आजादी के तुरन्त बाद ही सुलझ गया पर उत्तर प्रदेश में राम जन्मभूमि का मसला आज तक उलझा हुआ है। शायद इसलिए कि सोमनाथ सरदार पटेल के प्रांत में था सो चलपट सुलझ गया और अयोध्या नेहरू के प्रांत में थी सो आज तक मामला उलझा हुआ है। (हास्यात्मक) वैसे नेहरू की विरासत के पेंच में हम कश्मीर से लेकर चीन तक की समस्याओं को याद करते हैं पर राम जन्मभूमि के उलझाव को नजरन्दाज कर जाते हैं।

• लिब्राहन आयोग ने इस घटना का भी विश्लेषण करने का कोई प्रयास नहीं किया कि 6 दिसंबर 1992 को कारसेवा होने की तिथि जुलाई 1992 में ही घोषित कर दी गई थी फिर भी सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित स्थल के चारों ओर की 67 एकड़ जमीन के तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अधिग्रहण पर कोर्ट के निर्णय की तारीख 11 दिसम्बर 1992 निर्धारित हुई इसे 6 दिसम्बर से पहले कराने का कोई प्रयास सरकार द्वारा क्यों नहीं किया गया। हो सकता है कि यदि कोर्ट का निर्णय समय रहते आ जाता तो जनता के आक्रोश के उस उबाल को रोका जा सकता था।

• लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर और वैसे भी हमारे तमाम सेक्युलर साथी यह आरोप लगाते रहे हैं कि ढांचा विध्वंस के बाद के साम्प्रदायिक दंगे संघ परिवार और भाजपा के कुछ नेताओं के भड़काऊ बयानों के कारण और भड़के। मैं पूछना चाहूंगा कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरसिंह राव ने 6 दिसम्बर 1992 की रात 9.00 बजे दूरदर्शन पर यह कहा था कि वे (तथाकथित) बाबरी मस्जिद को पुन: उसी स्थल पर बनवायेंगे। और ऐसा ही बयान समाजवादी पार्टी के मुखिया श्री मुलायम सिंह ने दिया था। इस बयान का देश में कैसा प्रभाव पड़ा होगा इसका विश्लेषण करने का कभी तथाकथित सेक्युलर नेताओं और बुद्धिजीवियों ने आवश्यकता समझी कि आजाद भारत कि एक सरकार बाबर के नाम की मस्जिद का पुर्नस्थापना करेगी, राम के मंदिर की नहीं। (हास्यात्मक) वैसे कुरान के मुताबिक किसी गैर मुस्लमान को मस्जिद बनवाने का हक नहीं है।

• महोदय, मैं स्वयं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं। 6 दिसम्बर 1992 के समय मैं तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री था। और 1990 में अयोध्या कारसेवा के समय मैं युवा मोर्चा के नेता के रूप में कारसेवकों के जत्थे के साथ अयोध्या भी गया था। इसलिए मैंने यह स्वयं अनुभव किया है कि यह आन्दोलन किस प्रकार की भावनाओं से स्पंदित था। 30 अक्तूबर 1990 को घोषित कारसेवा को रोकने के लिए जब तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने कड़े कदम उठाने के प्रयास किये तो उसकी प्रतिक्रिया में जनभावनाओं का ऐसा ज्वार उठा कि सरकार को मजबूर होकर 29 और 30 अक्तूबर 1990 को अयोध्या और फैजाबाद ही नहीं बल्कि लखनऊ आने और जाने वाली सारी टे्रनों को रद्द करनी पड़ी। 30 अक्तूबर 1990 को केवल सरकारी टेलीफोन लाइनों को छोड़कर लखनऊ की सभी एस.टी.डी. लाईनें बंद कर दी गई। पूरे प्रदेश में गिरफ्तारियों के जो सरकारी आंकड़े हैं वे 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में उत्तर प्रदेश में हुई गिरफ्तारियों के सरकारी आंकड़ो से चार या पांच गुना अधिक है। उल्लेखनीय है कि 1942 से 1992 के बीच भारत की जनसंख्या चार पांच गुना नहीं बल्कि दोगुना हुई थी। नवंबर 1990 में बी.बी.सी. रेडियो ने अपने विश्लेषण में यह बात कही थी कि तुलनात्मक दृष्टि से राम जन्मभूमि आन्दोलन में जनता की सहभागिता 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन से कई गुना अधिक थी। परन्तु दुख है कि लिब्राहन आयोग को जनभावनाओं की यह स्वाभाविक अभिव्यक्ति दिखाई नहीं पड़ी और उसे इसमें षड्यंत्र दिखाई पड़ा।

• मैं मांग करता हूं कि सरकार श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के विभिन्न चरणों के समय उत्तर प्रदेश में दी गई गिरफ्तारियों की संख्या और अब तक के उत्तर प्रदेश में हुई सभी आन्दोलन की गिरफ्तारियों का एक तुलनात्मक चार्ट सदन के पटल पर रखे तो यह साफ हो जायेगा कि यह आन्दोलन एक जनान्दोलन था या एक षड्यंत्र।

• लिब्राहन आयोग कहता है कि भाजपा के नेताओं ने और विशेषकर तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह ने न्यायालय को वचन दिया था कि वे ढांचे को यथावत रखेंगे। फिर भी ढांचा टूट गया। इसलिए भाजपा और उसके नेता दोषी हैं। तो मैं याद दिलाना चाहता हूं कि कांग्रेस ने 1945 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में देश की जनता को यह वचन दिया था कि वे देश को टूटने नहीं देेंगे। स्वयं महात्मा गांधी ने कहा था कि देश का विभाजन नहीं होगा। फिर भी देश टूट गया। जो लोग राष्ट्र की जनता को राष्ट्रपिता का दिया हुआ वचन की लाज नहीं रख पाये और जिसके चलते कम से कम 10 लाख लोग मारे गये और दो से ढाई करोड़ बेघरबार हुए वे इतना सब होने के बावजूद अपने को कभी दोषी नहीं माना, उनके चेहरे कभी शर्म से लाल नहीं हुए बल्कि उल्टे अपने को नियति के साथ राष्ट्र के मिलन की रचना “Tryst with destiny “. का नायक मानते हैं वे आज हमें हमारे पुरजोर प्रयासों के बावजूद जनाक्रोश के चलते गुलामी के काल का एक ढांचा टूट जाने पर हमें दोषी और षड्यंत्रकारी कह रहे हैं।

• अध्यक्ष महोदय, इस रिपोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री और भारत की जनता के सम्मान और स्नेह के केन्द्र आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी का नाम जिस गैर कानूनी तरीके से डाला गया है वह इस रिपोर्ट की प्रामाणिकता और सरकार की मंशा दोनों को कटघरे में खड़ा करता है। कमीशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट 1952 के प्रावधान 8-बी के तहत जिस व्यक्ति का आयोग से पूछताछ की प्रक्रिया में कोई संबंध न रहा हो उस व्यक्ति का नाम रिपोर्ट में मनमाने तरीके से डालना गलत हैं। और इतना ही नहीं उन पर छद्म उदारवादी जैसी राजनैतिक टिप्पणी करना आयोग की स्वतंत्रता नहीं स्वछंदता है और अनाधिकार चेष्टा है। महोदय, स्वतंत्रता के पूर्व लगभग 30-40 वर्षों तक यदि भारत की राजनीति में महात्मा गांधी ने एक स्थायी और सम्माजनक स्थान भारत की जनता और भारत के राजनैतिक पटल पर बना कर रखा तो आजादी के बाद इतने लंबे समय तक देश की जनता और देश के राजनैतिक पटल पर स्थायी सम्माजनक स्थान प्राप्त करने वाले वे नेता अटल बिहारी वाजपेयी हैं।

• जिस अटल बिहारी वाजपेयी में नेहरू को भविष्य की ज्योति और नरसिंह राव को अपना राजनैतिक गुरू दिख रहा हो ऐसे अटल जी में लिब्राहन आयोग को एक छद्म उदारवादी और षड्यंत्रकारी दिखा तो ऐसे बुद्धिजीवियों की बुद्धि की मैं बलिहारी देता हूं और इस सदन के माध्यम से देश की जनता का विचार भी जानना चाहता हूं कि क्या ऐसी बात करने वालों की सोच बीमार नहीं है।

• लिब्राहन आयोग ने बड़े दावे के साथ ढांचा गिराने में जिस षड्यंत्र की बात की है मैं उसके संदर्भ में याद दिलाना चाहूंगा कि ढांचे टूटने के बाद 10 दिसम्बर, 1992 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाया गया था और बाहरी ट्रिब्युनल द्वारा जून 1993 में संघ एवं बजरंग दल पर प्रतिबंध अवैध ठहराया गया। बाहरी ट्रिब्युनल का निर्णय 4 जून 1993 को आया और 18 जून को प्रकाशित ट्रिब्युनल की गजेटेड (राजपत्रित) रिपोर्ट की पृष्ठ संख्या 71 में कहा गया है “It is pertinent to mention that PW 7 (who was Joint Director I.B. representing government’s view) has categorically admitted that there was not material evidence to show that these organisations (RSS, VHP and Bajrang Dal) had preplaned the destruction of disputed structure.” बाहरी ट्रिब्युनल का निर्णय कोई प्रेक्षण या आबजरवेशन नहीं है बल्कि यह एक वैधानिक आदेश या जुडिशियल वरडिक्ट है। आश्चर्य है कि स्वयं न्यायाधीश होकर भी जस्टिस लिब्राहन इसी संदर्भ में गठित हुए ट्रिब्युनल के निर्णय के ठीक विपरीत मंतव्य देते हैं और उसका उल्लेख तक करना उचित नहीं समझते हैं।

• सरकार द्वारा बाबरी ढांचा गिरने के 6 महीने बाद ही न्यायाधिकरण द्वारा हो चुके एक निर्णय को 17 साल बाद एक आयोग के द्वारा गलत ठहराने का प्रयास गंभीर संवैधानिक विषय है जिस पर इस सदन को विचार करना चाहिए।

• ढांचा गिरने के समय भारत के गृह मंत्री श्री शंकरराव चव्हाण ने भी स्पष्ट रूप से किसी षड्यंत्र की संभावना से इंकार किया था। मैं 3 जनवरी, 1993 के अंग्रेजी दैनिक पॉयनियर को उध्दृत करना चाहूंगा। “Pioneer 3rd January, 1993 ” Union Home Minister S.B. Chavan sprang surprise on Friday when he stated that demolition was not pre-planed. He said intellegence agencies have not given any linking of what was to happen on 6th December, 1992. When asked by journalists that P.V. Narsingrao said it was planned, he reacted sharply and said that the Prime Minister has actually expressed only apprehension.”

• मजे की बात यह है कि लिब्राहन आयोग भी रिपोर्ट के पेज 248 के पैरा 43.39 में लिखता है कि कारसेवक आक्रोशित और आक्रामक मनोदशा में थे। इसके आगे पेज 253 पैरा 44.12 में लिखता है “Some defiant Kar Sevaks pushed Shri L.K. Advani, Murli Manohar Joshi and Vinay Katiyar and captured the platform of Kar Seva and they were finally taken out by Swyamsevak of RSS” यानी स्पष्ट है कि संघ और भाजपा का नेतृतव कारसेवकों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा था। फिर भी आयोग को अंत:प्रेरणा हुई कि कारसेवकों को प्रेरित करने का प्रयास किया जा रहा था।

• मैं केन्द्र सरकार से पूछना चाहूंगा कि श्रीराम जन्मभूमि के विषय को मुद्दा बनाकर भाजपा व संघ परिवार को आरोपित करने के लिए तो आपने बरसों बरस करोड़ों रूपए खर्च किए पर समस्या के समाधान के लिए क्या किया? पिछले पांच वर्ष के अपने कार्यकाल में 5 मिनट भी इस समस्या के समाधान के लिए नहीं निकाले।

• उल्टे ऐसे अनेक काम किए जो सीधे तौर पर साम्प्रदायिक विभेद के कारक बनते हैं। देश के संसाधनों पर प्रधानमंत्री ने मुस्लिमों का पहला हक बताया, शिक्षण संस्थाओं में अल्पसंख्यकों के आरक्षण का प्रयास हुआ, नौकरी में आरक्षण का प्रयास हुआ, बैंकों में एक प्रकार का आरक्षण किया गया। भले ही यह सिर्फ प्रयास किसी दल को चुनावी लाभ दे सके। यह सब एक बार पुन: राज्य व्यवस्था को साम्प्रदायिक कट्टरवादी शक्तियों के आगे केवल तात्कालिक राजनैतिक हित के लिए झुकाने का उसी तरह का एक खतरनाक प्रयास है जिसने धीरे-धीरे उस हालात और आक्रोश को जन्म दिया था। जिससे सन् 1947 में देश टूट गया। 1992 में ढांचा टूट गया और आगे न जाने और क्या अनहोनी हो जाय। मैं सरकार को आगाह करना चाहता हूं कि वे इतिहास से सबक ले और चुनावी लाभ हानि से परे जाकर एक स्वस्थ पंथ निरपेक्ष व्यवस्था को सुदृढ़ करें।

• महोदय, मैंने आयोग की रिपोर्ट के बारे में जो कुछ कहा है यदि उसे एक पंक्ति में सारांश रूप से कहना चाहूं तो यह रिपोर्ट पूर्णत: निराधार, पक्षपाती, पूर्वाग्रहग्रस्त और कुछ विशिष्ट लोगों को उचित ठहराने और कुछ को दोषी ठहराने के की योजना का एक अंग है। (The report is totally baseless, biased, pre-judice and meticulously designed to target some persons and ogranisations)

• महोदय वैसे तो विवादित ढांचा गिराये जाने जैसी घटनाओं की तथ्यपरक जांच एक चीज है और इस घटना का सामाजिक या राजनैतिक उपयोग करने का विचार सर्वथा गलत है क्योंकि इन घटनाओं का संबंध देश काल और परिस्थितियों में बहुत व्यापक रूप से फैला हुआ होता है। अत: किसी एक घटना विशेष की जांच की तकनीकी औपचारिकताएं कभी वास्तविक समाधान को इंगित नहीं कर सकती।

• यह एक औपनिवेशक मनोवृति “Colonial mindset”. की विरासत है जिसे हम आज भी जी रहे हैं। यह रिपोर्ट उसी मनोवृति को परिलक्षित करती है जिस मनोवृति के चलते –

ढांचे के विध्वंस का कारण दशकों की गतिविधि में नहीं घंटों की गतिविधि में खोजने का प्रयास किया जाता है।

भगवान राम की जन्मभूमि के विवाद को एक राजस्व भूमि विवाद की तरह मानकर समाधान निकालने का प्रयास होता है

राम उसी जगह पैदा हुए इसे भौतिक आधार पर सिध्द करने का आग्रह किया जाता है।

रामसेतु के संदर्भ में यह व्यंग्य किया जाता है कि नल और नील ने कौन से इंजीनियरिंग कालेज से डिग्री ली थी एवं राम का अस्तित्व ही नकारा जाता है।

• यह सब इसलिए होता है क्योंकि हम संविधान के ‘सेक्युलर’ शब्द से इतने भ्रमित हैं कि हम धर्म को भी सेक्युलरिज्म के खिलाफ मान लेते हैं। राष्ट्र की संस्कृति और हमारे मूल नैतिक आधार तथा क्षुद्र साम्प्रदायिकता में विभेद नहीं कर पाते। इसीलिए मैंने यह मांग की थी कि सेक्युलरिज्म के संदर्भ में धर्म निरपेक्ष शब्द का प्रयोग प्रतिबंधित किया जाय और पंथनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग किया जाय ताकि राष्ट्र-धर्म और किसी मत या सम्प्रदाय का अंतर स्पष्ट रहे। और कभी कोई भ्रम न उत्पन्न कर सके।

• जिस प्रकार न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि हिन्दुत्व शब्द साम्प्रदायिक नहीं है उसी प्रकार मैं यह मांग करता हूं कि इस विषय पर भी इस सदन को एक बहस करनी चाहिए कि राम क्या किसी सम्प्रदाय के प्रतीक हैं या भारत के सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक हैं।

• भारत के संविधान में जिन 10-12 चित्रों का उल्लेख है उसमें एक भगवान राम, लक्ष्मण और सीता के चित्र भी अंकित है।

• राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संपूर्ण व्यक्तित्व व कृतित्व में राम का प्रभाव दिखता था। उनकी राजनैतिक दृष्टि थी राम राज्य, उनकी आध्यात्मिक दृष्टि थी ”रघुपति राघव राजा राम” और उनकी अंतिम अभिव्यक्ति थी ”हे राम”।

• गांधी ने कुछ भी नया नहीं किया था। भारत के तमाम मनीषी विद्वान और भक्त इस राष्ट्र को राम से ही जोड़ते रहे हैं। कबीर ने कहा -”राम नाम के पट तरे, देबै को कछु नाहिं”। मीरा ने कहा -”पायो जी मैने, रामरतन धन पायो” रैदास ने कहा-”राम नाम हृदय न धरा, जैसे पसुआ तैसे नरा” और इतना ही नहीं अल्लामा इकबाल ने लिखा-

”है राम के वजूद पे, हिन्दोस्तां को नाज़। अहले-नजर समझती है उनको इमाम- ए- हिन्द”।

• विश्व में बाइबिल के बाद संभवत: रामकथा ही ऐसा ग्रंथ है जिसका सर्वाधिक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। इंडोनेशिया में आज भी रामलीला होती है, कम्बोडिया, लाओस में आज भी रामकथा के साहित्यक अवशेष हैं। यहां तक कि थाईलैंड के राजा आज भी अपने नाम के साथ किंग राम टाइटिल लगाते हैं। कोरिया का राजपरिवार अपनी जड़े अयोध्या में खोजता है। श्रीलंका की सरकार ने भी पिछले वर्ष ही रामकथा को पूरी तरह ऐतिहासिक माना था और अपने यहां रामकथा से जुड़े सभी स्थलों की एक सीडी जारी की थी।

• अत: राम भारत के संविधान में चिह्नित हैं, राष्ट्रपिता की विचारधारा में इंगित हैं, शताब्दियों से संतों की भावनाओं में स्पंदित हैं और देश-देशांतर तक भारत के प्रतीक के रूप में विस्तारित हैं तो फिर भारत की संसद उन्हें भारत का राष्ट्रीय प्रतीक राष्ट्र पुरूष क्यों नहीं मान सकती ताकि भविष्य में ये समस्याएं भी समाप्त हो जायं।

• मगर हमारे देश में हवाएं कुछ और चली। मैं याद दिलाना चाहता हूं कि बाबर की कब्र अफगानिस्तान में है पर वहां पर उसे कोई श्रध्दा का स्थान प्राप्त नहीं है क्योंकि अफगान कहते हैं कि वह तो समरकंद का था। फिर भारत में बाबर को लेकर और वह भी राम के विरूध्द संघर्ष क्यों खड़ा किया जा रहा है। इसका जवाब भारत की राजनीति के पुरोधाओं को ही देना होगा।

• जबाव अगर हम नहीं देंगे तो आने वाला वक्त दे देगा। सदन के कई विद्वान सदस्य शायद यह जानते हो कि इतिहास के संदर्भ में जैनिटिक इंजीनियरिंग के उपयोग के नये शोधों के अनुसार भारत में आर्यों के बाहर से आने का सिध्दान्त संकट में पड़ता जा रहा है। क्योंकि डी.एन.ए. आधारित शोधों के अनुसार सभी भारतीयों के डी.एन.ए. चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान या किसी भी जाति के, मोटे तौर पर एक जैनिटिक पूल के पाये जा रहे है। और मजे की बात यह है इसका सेंट्रल एशियन जैनिटिक पूल से कोई संबंध स्थापित नही हो पा रहा है। बाबर का जन्म स्थान समरकन्द सेंट्रल एशिया में है। यानि आने वाले समय में विज्ञान यह साफ कर देगा, कि हमसब हिन्दू हो या मुसलमान एक ही पूर्वजों की सन्तान है। और वो पूर्वज भगवान राम, कृष्ण, बुध्द और नानक हैं। और बाबर से हमारे पूर्वजों का कोई सम्बन्ध नहीं था।

• अपने पूर्वजों के खिलाफ भारत मा की सन्तानों के एक वर्ग को खड़ा करने की सियासत विज्ञान कसौटी पर भविष्य में दम तोड़ देगी। और भारत के सभी समुदाय मिलकर अपने राष्ट्र पुरूष मर्यादा पुरूषोत्ताम भगवान राम का भव्य मन्दिर निर्माण पूरा करेंगे।

• ऐसा क्यों हो गया कि हम भारत में भारतीयता के विरूध्द खड़े हो जाते हैं शायद इसलिए कि भारत के संविधान में यह लिखा है We the people of India having solemnly resolved to constitute India into a sovereign, socialist, secular, democratic republic. इसे पढ़कर किसी को यह भ्रम हो सकता है कि भारत का गठन 1947 में हुआ। महोदय, यह राष्ट्र सनातन हैं, चिर पुरातन है फिर भी नित्य नूतन है। भारत इस संविधान और इस व्यवस्था से बहुत पहले का है और वही सनातन तत्व इस राष्ट्र को स्पंदित और संचालित करते हैं।

• महोदय, आपके अध्यक्षीय आसन के पीछे लिखा है -”धर्मचक्र प्रवर्तनाय”, सर्वोच्च न्यायालय के चिह्न में लिखा है -”यतो धर्मस्ततो जय:” भारत के राष्ट्रीय चिह्न के नीचे लिखा है- ”सत्यमेव जयते”। भारत के राष्ट्रीय ध्वज पर अंकित अशोक चक्र अशोक के अभिलेखों में धम्मचक्र के रूप में उल्लिखित है। भारतीय राज्य व्यवस्था के ये सभी संकेत 1947 के बाद के नहीं, उस सनातन राष्ट्र की अभिव्यक्ति के हैं जिसने सारे विश्व को सदैव ज्ञान और आध्यात्मक की नई दृष्टि दी। जहां सम्राट केवल युध्द के लिए संघर्ष ही नहीं करते थे बल्कि राम की तरह मर्यादा पालन के लिए वनवास जाने के लिए तैयार रहते थे। ये ऐसे मूल्य हैं महोदय जिन्हें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की तकनीकी जटिलताओं से परे जाकर राष्ट्र के प्रेरक मान बिन्दुओं के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

• विश्व के अन्य देश जिनका गौरवशाली इतिहास रहा है, उन्होंने अपने संविधान में इसे गर्व के साथ स्वीकार किया है। मैं, मिश्र के संविधान का प्रथम वाक्य मैं उध्दृत करना चाहूंगा -“Egyptian Constitution begins with the sentence -” We the people of Egypt, who have been toiling on this great land since the dawn of history and the beginning of civilization”

• अत: विश्व की एक श्रेष्ठत्तम सभ्यता के उत्तराधिकारी के रूप में हम सब एक न्यूनतम आम सहमति बनायें ताकि राष्ट्र के सांस्कृतिक गौरव और साम्प्रदायिक संघर्ष को अलग रखते हुए एक आत्मसम्मान से युक्त गौरवशाली राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त हो सके। इस हेतु श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मन्दिर का निर्माण धार्मिक या सांस्कृतिक न्याय नहीं बल्कि एक राष्ट्र के रूप में भारत के प्रति राष्ट्रीय न्याय या National Justice का प्रतीक है।

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3 Comments on "भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह द्वारा 07 दिसम्बर, 2009 को लोकसभा में लिब्राहन रिपोर्ट पर दिए गए भाषण के मुख्य बिंदु"

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rajeevkumar905
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बहुत आछा भासन दिया राजनाथ ने मगर बीजेपी भी तो राम नाम पैर बहुत दिन से पोलिटिक्स कर रही है अगर उसके कथनी और करनी में अंतर न होता तो उत्तेर प्रदेश से बीजेपी का सफया नहीं होता. बीजेपी पहले अपने सिद्धांतों पैर कायम रहना सीख जाती तो आज सत्ता उसके हाँथ में होती. बीजेपी को आत्म मंथन की जरुरत है क्योंकि देश को बीजेपी और बीजेपी को देश की जरुरत है.

kamal khatri
Guest

बधाई हो राजनाथजी. अपने जोर का थ्पध मारा
पर लगा धेरे या तेज ये wo jane

apna kaam to हो गया. अब janta ko chahiye ki desh ko एक रखने में बीजेपी की भूमिका की कितनी जरूरत hai

rakesh
Guest

वैरी गुड एंड हिस्टोरिकल स्पीच ऑफ़ राजनाथ सिंह , डोकुमेंट है यह….अपलोड करने के लिए बधाई.

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