लेखक परिचय

विजय कुमार सप्पाती

विजय कुमार सप्पाती

मेरा नाम विजय कुमार है और हैदराबाद में रहता हूँ और वर्तमान में एक कंपनी में मैं Sr.General Manager- Marketing & Sales के पद पर कार्यरत हूँ.मुझे कविताये और कहानियां लिखने का शौक है , तथा मैंने करीब २५० कवितायें, नज्में और कुछ कहानियां लिखी है

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ये कैसी अजनबी आहट है ..
कौन है  यहाँ , किसकी आहट है ये …
जो मन में नए भाव जगा रही  है .

ये तो तुम हो मेरे प्रभु….

हे मेरे मनमंदिर के देवता
कबसे तुझसे मिलने की प्यास थी मन में .
आज एक पहचानी सी आहट आई
तो देखा की तुम थे मेरे मन मंदिर के द्वार पर .
अहा …कितना तृप्त हूँ मैं आज तुम्हे  देखकर .
बरसो से मैंने तुम्हे जानना चाहा ,
पर जान न पाया
बरसो से मैंने तुम्हे देखना चाहा
पर देख न पाया
तुम्हे देखने और जानने के लिए
मैंने इस धरती को पूरा ढूंढ डाला .
पर तुम कहीं न मिले ..

और देखो तो आज तुम हो
यहाँ मेरे मन मंदिर के द्वार पर ..
और तुम्हे यहाँ आने के लिए कोई भी न रोक पाया .
न तुम्हारे बनाये हुए सूरज और चन्द्रमा
और न ही मेरे बनाये हुए झूठे संसार की बस्ती.

अचानक  ही पहले  प्रेम की और फिर  मृत्यु की आहट हुई  ,
मैं  नादान ये जान नहीं  पाया की वो दोनों  तुम्हारे ही भेजे  हुए दूत  थे
जो की मुझसे  कहने  आये थे ,
कि अब तुम आ  रहे  हो ..आने वाले हो …

आओ  प्रभु ,
तुम्हारा स्वागत है ..
जीवन के इस अंतिम क्षण में तुम्हारे दर्शन  हुए..
अहा , मैं धन्य  हो गया  .
तुम्हारे आने से मेरी वो सारी व्यथा दूर हो जायेंगी ,
जब तुम मुझे अपनी बाहों में समेटकर  मुझे अपना  लोंगे ..

और न जाने क्यों , अब मुझे कोई भय नहीं रहा ,
तुम्हे जो देख लिया है
तुम्हारी आहट ने
मेरे मन में एक नयी उर्जा को भर दिया है ;
कि
मैं फिर नया जन्म लूं
और तुम्हारे बताये हुए रास्तो पर चलूँ
मेरा प्रणाम  स्वीकार करो प्रभु ….

अहा… इस आहट से मधुर और क्या होंगा …

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