लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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buy sellप्रमोद भार्गव

भारत में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश का ज्वार उतार पर है। इस स्थिति को इस अर्थ में ले सकते है कि प्राकृतिक संपदा के अंधाधुंध दोहन बनाम लूट पर आधारित उदारवादी अर्थव्यस्था का मांडल लड़खड़ाने लगा है और अब इसमें पूंजी निवेश जैसे झटका उपचारों से सिथरता आने वाली नहीं है। क्योंकि निजीकरण के दौर में जिस भारतीय अर्थव्यस्था को दुनिया में तेज गति से बढ़ती अर्थव्यस्था कहा जा रहा था,वास्तव में उसकी बुनियाद प्रौधोगिकी अथवा औधोगिक आर्थिक विकास पर टिकी न होकर खनिज संपदाओं जैसी राष्ट्रीय संपति के बेतहाशा वैध-अवैध निर्यात पर टिकी थी। जिसके भूगर्भीय दोहन का रहस्य था कि वे जिस कच्चे माल के रूप में संपदा का सौदा कर रहे हैं,उसे न तो वे खरीद रहे है और न ही उसके मूल तत्व का कांयातरण कर उसे उपयोगी वस्तु अथवा उपकरण में ढालने का व्यापार कर रहे है। जाहिर है,ज्यादातर कंपनीयों का औधोगिक अथवा सांस्थानिक ढांचा था ही नहीं ? लिहाजा समझौता-पत्रों के जरीए केंद्र्र और राज्य सरकारों ने विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनीयों के लिए संपदा-दोहन के जो रास्ते आसान बनाए थे, वे तब कठिन हो गए जब जन -अंदोलानों और न्यायलयों के हस्तक्षेप ने कंपनियों और स्थानीय शासन-प्रशासन की गैर कानूनी दखलदंजी पर डंडा चला दिया। इस सार्थक हस्तक्षेप से साबित हुआ कि प्रजातांत्रिक शासन व्यव्स्था में हस्तक्षेप कर रही सबसे छोटी मानी जाने वाली संवैधानिक इकार्इ ग्राम-पंचायत और ग्राम-सभा कि क्या भूमिकाएं है ? कानून की इस महिमा ने चींटीं से हाथी को परास्त करने का सिलसिला शुरू किया तो कंपनियों के खाने और दिखाने के दांत सामने आ गए।

कंपनियों को झटका लगने की शुरूआत वेदांता समूह को सर्वोच्च न्यायलय ने दिए झटके से हुर्इ। इस झटके में न्यायालय ने अपनी तरफ से कोर्इ नर्इ कानूनी संहिता नहीं रची। बलिक पूर्व से ही प्रचलन में चल रहे, पंचायती राज अनुसूचित क्षेत्र विस्तार अधिनियम और आदिवासी एवं अन्य वनवासी भूमि अधिकार अधिनियम में निर्धरित मानदण्डों की व्याख्या कर उनका सरलीकरण किया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, कि इन कानूनों के तहत आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय खनिज संपदाओं के उपयोग के संबंध में ग्रामसभाएं पूरी तरह अधिकार संपन्न हैं। उनकी अनुमति के बिना कोर्इ कंपनी या राज्य सरकार बेजा दखल नहीं दे सकती है। इसके साथ ही उल्लेखनीय तथ्य यह भी जोड़ा कि कार्यपालिका ग्राम सभा के निर्णय को मौके पर पालन कराने के लिए बाघ्यकारी है। जाहिर है,अदालत ने महज पंचायत अधिनियम में दर्ज स्थानीय लोगों के जमीन से जुड़े अधिकार परिभाषित किए हैं।       यह फैसला एक सबक था, जिससे साफ हुआ कि भविष्य मे ऐसा अब आर्थिक विकास ही संभव या सफल हो सकता है, कि जहां परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं और जिन समूदायों के भूगर्भीय संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है,उन समुदाय के शत-प्रतिशत हितों का सरंक्षण हो। जाहिर है,राज्य सरकारें अब तक भूमि पर आश्रित जन-समूहों को पर्याप्त मुआवजा देने और उनका उचित पुनर्वास करने में नाकाम ही रही है। राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन ने अदालत के अप्रेल 2013 में आए इस फैसले से कोर्इ ऐसा सबक नही लिया,जिससे वे भूमि-स्वामियों में यह विश्वास पैदा कर पाती कि उनके आजीविका संबंधी हित सुरक्षित रहेंगे। इसी अदूरदर्शिता व अनिर्णय की यथास्थिति का परिणाम निकला की कर्नाटक से पांस्को 30 हजार करोड़ लागत की और आर्सेलर मित्तल ने उड़ीसा में प्रस्तावित 50 हजार करोड़ लागत की इस्पात परियोजनाएं समेट लीं। अब खबर है कि जुआरी उधोग ने कर्नाटक के बेलगाम में 5 हजार करोड़ की लागत से लगाए जा रहे यूरिया कारखाने की परियोजना खारिज कर दी। इनसे ही कदमताल मिलाते हुए झारखंड से मानेट इस्पात एंड एनर्जी कंपनी ने अपने बोरिया-बिस्तर समेटने का मन बना लिया है। इन कंपनियों के प्रवक्ताओं का आराोप है कि वे अपना करोबार इसलिए बंद कर रहे है,कि समझौता-पत्रों पर दस्तखत हो जाने के पांच-सात साल बीत जाने के बावजूद न तो उन्हें संयंत्र लगाने के लिए जमीन मिली और न ही खनिज भूखंड आवंटित हुए ? दरअसल जिनकी जमीनें हैं वे वैकलिपक आजीविका के भरोसे लायक साधन सुलभ नहीं कराए जाने के कारण जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हुए। खनिज भूखंड इसलिए नहीं मिल पाए,क्योंकि वे स्थानीय लोगों की दैवीय आस्था से जुड़े हैं। उच्चतम न्यायालय की दृशिट में आदिवासियों की परंपरागत मान्यता के अनुसार जिन पर्वत श्रृखलाओं को वे दैवीय शक्ति का प्रतिरूप मानते हैं, उन्हें खनिज उत्खनन के लिए देने अथवा न देने के लिए वे स्वंतंत्र हैं। तय है,खनिज आधारित निवेश का संकट निकट भविष्य में भी दूर होने वाला नहीं है।

खनिज अर्थात प्राकृतिक संपदा के दोहन से आधारित निवेश हमारे लिए कितना घातक है, अब जरा इसका जायजा लें। न्यायालय के आदेश पर सीबीआर्इ ने कर्नाटक के लौह अयस्क निर्यातक जनार्दन रेडडी बंधुओं के यहां छापामार कार्रवार्इ की थी। इस जांच से खुलासा हुआ था कि इन बंधुओं ने 50 लाख मीटि्रक टन कच्चे लोहे का निर्यात बेलकेरी बंदरगाह से चीन और पकिस्तान को किया था। यह निर्यात अवैध रूप से हुआ। 17 माह पांच लाख ट्रकों के फेरे से यह माल बंदरगाह तक पहुंचाया गया। यहां यह तथ्य गौरतलब है कि इतने लंबे अर्से तक वनों का विनाश करके बेशकीमती खनिज का दोहन व निर्यात होता रहा,लेकिन केंद्र्रीय व राज्य स्तरीय खुफिया एजेसियों को इस गोरखधंधे की भनक तक नहीं लगी और रेड्रडी बंधुओं ने 2500 करोड़ कमा लिए। चूंकी यह अवैध करोबार था,इसलिए उत्पाद रायल्टी व अन्य करों से भी राज्य सरकार को कोर्इ लाभ नहीं हुआ। कमोवेश यही सिलसिला गोवा में लौह अयस्कों के दोहन के बाबत चलता रहा। इस पर भी आखिर में अंकुश शीर्ष न्यायलय ने एमडी शाह जांच आयोग बिठाकर लगाया।

शाह आयोग की रिपोर्ट जब संसद में पेश हुर्इ तो पता चला कि हम अपनी खनिज संपदा को न केवल दरियादिली से लुटाने में लगे हैं, बलिक मूल्यवान व दुर्लभ खानिजों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता खोने का जोखिम भी उठा रहे हैं। इस रपट के मुताबिक, चीन में इस समय करीब 200 अरब टन लौह अयस्क के भंडार भरे पड़े हैं। बावजूद चीन भारत से इसलिए कच्चा लोहा आयात करता चला जा रही है,जिससे इस क्षेत्र में उसका भविष्य सुरक्षित रहे। साथ ही वह भारत से ही आयात किए कच्चे लोहे को इस्पात में ढालकर भारत समेत अन्य देशो को निर्यात करके मोटा मुनाफा भी कमाता रहे। शाह ने गोवा से तो सीबीआर्इ ने कर्नाटक से चीन द्वारा कच्चे लोहे का अवैध ढंग से आयात किए जाने का खुलासा किया। बावजूद इस स्थिति को नियंत्रित करने के कठोर कानूनी उपाय नहीं किए गए। लोहे के निर्यात से जुड़ी यह लापरवाही इसलिए चिंताजनक है,क्योंकि भारत से हर ऐक साल 74 मिलियन टन लौह अयस्क का निर्यात किया जा रहा है। उत्खनन की यही गतिशीलता बनी रही तो भारतीय खनिज ब्यूरो का दवा है कि हमारे लोहे के भंडार 2020 तक रीत जाएंगे?अब विडंबना देखिए कि चीन हमसे वैध-अवैध तरीकों से कच्चा लोहा तो बेहद सस्ती दरों पर खरीदता है और बाद में इसे ही  इस्पात में ढालकर मंहगी दरों पर हमें ही बेच देता है। ऐसी ही गलत व दोगली नीतियों के परिणाम के चलते हमें बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी की जरूरत पड़ती है। आखिर हम खुद क्यों नहीं कच्चे लोहे को इस्पात में ढालने का करोबार करते? इसमें ऐसी अनूठी तकनीक की भी जरूरत नहीं है,जिसे आयात की मजबूरी हो ? हमारे सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्इ कारखाने उम्दा किस्म के इस्पात को ढालने के काम में बहुत पहले से लगे हैं। दुर्भाग्य है कि सही नीतियों को हम अपनी नीयति नहीं बना रहे हैं।

फिलहाल तो विदेशी निवेश के लुभावने उपाय आखिरकार हमारी खनिज संपदाओं को नष्ट करके हमारी मूल पूंजी को चौपट करने वाले उपाय ही साबित हो रहे हैं। खुदरा और उडडयन क्षेत्र में हम विदेशी निवेश को पहले ही आमंत्रित का चुके हैं, लेकिन आमद शून्य रही। हाल ही में 12 क्षेत्रों में निवेश को और बढा़वा दिया है। इनमें संचार,रक्षा और बीमा क्षेत्र प्रमुख है। यहां सवाल यह भी खड़ा होता है कि विदेशी कंपनीया हमारे यहां पूंजी निवेश करके कोर्इ हमें खैरात नहीं देती,बलिक इसका लाभांश अपने मुख्यालय को भेजने लग जाती हैं। यह भी धनराशि विदेशी मुद्रा मसलन डालर में भेजी जाती है, जिसका व्यापार घाटा भारत को उठाना पड़ता है। इस क्रम में विदेशी कंपनियाें ने अपना लाभांश 2010 में 4 अरब डालर,2011 में 8 अरब डालर और 2012 में 12 अरब डालर भेजा है। तय है,विदेशी पूंजी लाभ नहीं बड़े घाटे का सौदा है।

इसीलिए नवउदारवादी आर्थिक सुधार जिन-जिन देशो ने अपनाए वे आज न केवल जबरदस्त आर्थिक मंदी से गुजर रहे हैं, बलिक जनाक्रोश की गिरप्त में आ रहे हैं। गी्रस,यूनान,इटली,चीन और स्पेन ऐसे ही देशो की कड़ी में दर्ज हैं। हाल ही में खबर आर्इ है कि अमेरिकी शहर डेट्र्रायट ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया है। इस शहर पर 18 अरब डालर का कर्ज है। डेट्र्रायट में बद्रहाली का आलम यह रहा कि वहां बुनियादी सुविधाएं हासिल न कर पाने के कारण बीते कुछ सालों में बड़ी तादाद में यहां की आबादी पलायन कर गर्इ। नतीजतन 20 लाख की जनसंख्या वाले  इस शहर की आबादी घटकर महज 70 हजार रह गर्इ। जाहिर है, अमेरिका से थोपा जा रहा आर्थिक उदारवाद का सिद्धांत अब अमेरिका को ही भस्मासुर साबित होने लगा है। भारत यदि इस कूच्रक से उबरने की बजाय,विदेशी निवेश को येन-के्रन-प्रकारेण ललचाने का सिलसिला जारी रखता है तो देश में कालाधन अथवा आवारा पूंजी ही बढ़ेगी, जो आर्थिक संकट से उबारने से कहीं ज्यादा,मंहगार्इ बढ़ाने का सबब बनेगी ? बहरहाल ऐसे निवेश से तौबा कराना ही बेहतर है।

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