लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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पंडित सुरेश नीरव

ये कितनी नाइंसाफी है कि बेचारा आदमी एक और उसकी जान को रिश्ते अनेक। बेचारा कहां जाए। और कितने रिश्ते निभाए। एक को पकड़ो तो दूसरा मेंढक की तरह उछलकर दूर खड़ा हो जाता है। हम यह तो फिजूल ही कहते हैं कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है। असलियत में तो हमारा देश रिश्ताप्रधान देश है। रिश्तों में दुनिया का इकलौता सुपरपावर देश। पहला रिश्ता देश से। देश हमारी माता है। भारत माता। मदर इंडिया। गाय हमारी माता है। नदियां हमारी माता है। जय गंगा मैया की। जय जमुनाजी की। और-तो-और हमने बीमारियों से भी अंतरंग रिश्ते बनाते हुए चेचक को भी माता कहकर अपनी रिश्ताबनाऊ क्षमता का विश्व में कीर्तिमान स्थापित कर रखा है। एक फिल्मी गीतकार ने तो- गंगा मेरी मां का नाम बाप का नाम हिमालय कहकर अपने खानदान का पूरा बायोडाटा ही सार्वजनिक कर के अपने खानदानी होने का परिचय दिया हैं। वरना तो हमारे यहां मौके के मुताबिक गधे को भी बाप बनाने की गौरवशाली परंपरा रही है। जो आज तलक पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से बिलकुल अछूती है। यह हमारे लिए राष्ट्रीय अभिमान की बात है। चलो एक तो ऐसी परंपरा है जिस पर पश्चिमी सभ्यता का साया नहीं पड़ा। हो सकता है गधे के फादरीकरण प्रतियोगिता में हम से पराजित पश्चिमी देश हमारे महान देश का मज़ाक उड़ाते हुए यह कहने लगें कि कि इंडिया में तो लोग गधे को ही बाप बनाते हैं तो हम इस कुप्रचार का मुंह तोड़ जवाब देते हुए पूछेंगे कि गांधीजी को बापू क्या तुम्हारे बाप ने बनाया था। अरे वो क्या समझें हमारे रिश्तों की पवित्रता को। अरे पवित्र आत्मा थे हमारे बापू। रोज भगवान का भजन करते हुए कहते थे- वैष्णव जन तो तैने कहिए जो पीर पराई जाने रे। कैसी करुणामयी प्रार्थना करते थे। जो भी प्रार्थना-पूजा करता है,हम भारतीय तो तड़ से उसे बापू कह डालते हैं। हमारी इस उदार परंपरा के कारण ही आज कई महात्मा चैनलों पर भजन-प्रवचन करके बापू की केटेगिरी में आ गए हैं। इसलिए हम फिरंगियों के इस आरोप को सिरे से खारिज करते हैं कि हम सिर्फ गधों को ही बाप बनाते हैं। तमाम वेरायटी के बापू आज भी हमारी मार्केट में घूम रहे हैं। करे मल्टीनेशनल कंपनियां हमारा मुकाबला। मैं ये सोचकर हैरत में हूं कि इन फिरंगियों की सुई केवल पिताजी के रिकार्ड पर ही क्यों रुक गई। खुद इन फिरंगियों को अपने ऑरीजनल फादर का तो पता होता नहीं है गोया हर चर्च में इनका एक फादर जरूर होता है। जितने चर्च उतने फादर। यह हमारी बापू संस्कृति का ही प्रभाव है,जो इनके सर चढ़कर बोल रहा है। चलो फादर-प्रतियोगिता में इन्होंने कूद कर फटें में टांग अड़ाई है मगर हमारा मुकाबला ये क्या खाकर करेंगे। हमारे यहां राष्ट्रीय स्तर पर चाचा हैं,ताऊ हैं,ताई हैं,काकी हैं,काका हैं,काके हैं। एक अदद चाची की कमी थी सो कमल हसन ने चिकनी चाची बनाके इस कमी की भी राष्ट्रीय आपूर्ति कर दी। बाबाओं की तो हमारे देश में भरमार है ही। इनकी जनसंख्या तो अब इतनी ज्यादा हो गई है कि देश में आदमी कम और बाबा ज्यादा हो गए हैं। फिर भी जिन सफाई पसंदों को ये दाढ़ी-मूंछवाले लेआउट के बाबा पसंद न हों तो उनके लिए बालीवुड की ओर से संजू बाबा का तोहफा पेश है। सच तो यह है कि राजनीति और फिल्म इंडस्ट्री ने देश के हरेक रिश्ते का राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करके हमेशा रिश्तों की फसल को सूखने से बचाया है। यहां अम्माएं भी हैं,दीदीयाएं भी हैं और बहनजीआएं भी इफरात में एवलेबल हैं। रिश्तों की सेल लगी हुई है। कुछ माल डिस्काउंट पर भी उपलब्ध है। राष्ट्रपिता और राष्ट्रपति के सम्मानित ओहदों के अलावा चाचा नेहरू,देवीलाल ताऊ,शालिनी ताई, काका हथरसी, जयललिता अम्मा,ममता दीदी, लता दीदी, मायावती बहनजी सभी रिश्ते तो मौजूद हैं। बस एक पत्नी का रिश्ता ही रह गया था जिसका कि राष्ट्रीयकरण नहीं हो सका है। इंदिराजी ने राष्ट्रीयकरण की मुहिम छेड़ी तो थी मगर वह बैंकों पर ही आकर रुक गई। खैर..परंपरा प्रेमी और प्रगतिशील दोनों की मिलीजुली कोशिशों से पत्नियों की कई वेरायटी अब प्रकाश में आईं हैं। मसलन-धर्म पत्नी,पत्नी,उप-पत्नी,प्रवासी-पत्नी, गुप्त-पत्नी और दफ्तरी- पत्नी। पत्नियों की इतनी नस्लें पैदा करके हम भारतीयों ने अपनी फर्स्टहैंड प्रतिभा का परिचय देकर इस मामले में भी विश्व को चमत्कृत कर दिया है। पत्नी की संख्या बताकर हम इन लोगों को और शर्मिंदा नहीं करना चाहते। लोकिन बात चल निकली है तो हता ही देते हैं कि ब्रह्मचर्यप्रधान इस देश में सोलहहजार एकसौआठ पत्निया रखने का विश्व रिकार्ड आज तक कायम है। इस प्रतियोगिता में स्वर्ण तो क्या कोई लोह पदक भी हमारे सामने नहीं जीत सका है। फिर भी यदि कुछ नकचढ़ों को यह शिकायत हो कि पत्नी रही तो हर हाल में निजी संपत्ति ही तो उनके संज्ञान के लिए हमारे यहां मिडवाइफ की भी तदर्थ व्यवस्था है। वे चाहें तो अपनी पत्नी को इस संबोधन से पुकारकर अपनी प्रचंड सामाजिकता का सबूत दे सकते हैं। हम किसी के साथ कोई सौतेला व्यवहार नहीं करते। एक बार मिल तो लें। निराश न हों। रिश्ते-ही-रिश्ते। गर्व से कहो हम भारतीय हैं। अस्पताल की सारी नर्सें हमारी सिस्टर हैं। इन जगत सिस्टोरों के निजी पति भी सार्वजनिकतौर पर इन्हें सिस्टर ही कहकर बुलाते हैं। यह है हमारा बहननुखी भारतीय चिंतन। जिसे हम गाली-गफ्तार के दौर में भी याद करना नहीं भूलते। अब बात सिस्टरों के भाईयों की। हमारे देश में सुपर स्टार भाई तो अंडरवर्ड में ही पाए जाते हैं। और इन भाईयों की प्रगाढ़ रिश्तेदारी देखिए कि हमारे देश में सब चोर-चोर मौसेरे भाई होते हैं। रिश्ते की कैसी नाजुक डोर से बंधे हैं सारे चोर भाई। इन भाइयों के अलावा भैया और भइयन भी हमरे पूरब में बहूत होते हैं। लोगों की भावुकता का ही कारण हैं कि लोगों ने अच्छे-खासे राहुल गांधी को भी भैया बना डाला हैं। ताउओं की फसल वैसे तो हरियाणा मे होती है मगर बछिया के ताऊ देश में कश्मीर से कन्याकुमाकी तक फैले हुए हैं। मगर ये किस बछिया के ताऊ होते हैं इसका उल्लेख हम अकेले में करेंगे। कारण ये कि बछिया पब्लिसिटी बिव्कुल नहीं चाहती। इसीलिए वेद,पुराण कहीं पर भी इसे सार्वजनिक नहीं किया गया। बछिया के ताऊ से थोड़ी भिन्न लोमड़ी के फूफा की दुर्लभ प्रजाति भी हमारे देश में सौभाग्य से अभी भी पायी जाती है। अब एक रिश्ता ऐसा भी है जिसे हमारे देश के होनहार पट्ठों ने उल्लू को डैडी के रूप में गोद लेकर ईजाद किया है। और अपने अदम्य पक्षीप्रेम का भी परिचय दिया है। वैसे ऐसी मान्यता है कि जो लोग गधे को बाप बनाने से चूक जाते हैं वही कालांतर में उल्लू को अपना डैडी बनाकर मनुष्यता में पिता के एक नए गोत्र का गठन करते हैं। इन रिश्तों की नुमाइश में मामाओं को देखना-दिखाना भी हम जरूरी समझते हैं। मामाओं के मामले में हम भारतीय बहुत भाग्यशाली हैं जहां कंस और शकुनी-जैसे मामाओं ने अवतार लेकर अपनी दिव्यलीलाओं से हम भारतवासियों को कृतार्थ किया। ज़रा सोचिए अगर मामा कंस नहीं होते तो भांजे कृष्ण का क्या फ्यूचर होता। और अगर शकुनी मामा नहीं होते तो महाभारत करने की औकात भांजे दुर्योधन की थी क्या। वैसे असफल प्रेमी को प्रेमिका के बच्चों द्वारा मामा कहे जाने का भी प्रचलन हमारे देश में प्रचुर मात्रा में विद्यमान है। भारतीय बच्चों के जगत मामा चंदा मामा के लफड़े तो इतने बारीक हैं कि बच्चों के मामा फटाक से उनकी मम्मियों के करवाचौथ के चांद भी बन जाते हैं। मैंने अपनी चांद खुजा-खुजाकर गंजी कर ली मगर चंदामामा घोटाला-लफड़ा समझ में नहीं आया। इस संगीन प्रकरण पर विद्वानों की नजर अभी तक नहीं गई है। अफसोस है कि इस मामले में सारे-कगे-सारे पुरुष मामा ही सिद्ध हुए। भारत के कई भूभागों में बंदर को भी मामा कहने का रिवाज़ है। ये जरूरी नहीं कि हर मामा कंस और हर मामी राधा हो। मामा-मामियों की अन्य प्रजातियां भी देश में देखी गईं हैं। अब बात मौसियों की। मौसी तो मौसी होती हैं। कोठी से कोठे तक यह सर्वत्र पायी जाती हैं। आजकल किन्नरों को मौसी कहने का भी लेटेस्ट फैशन चल निकला है। अब यदि मनुष्य योनि की मौसियों से मन न भरे तो म्याउं-म्याउं कहकर बिल्ली मौसी भी अपनी हाजिरी दर्ज कराने के लिए आपकी सेवा में हाजिर हैं। जहां तक बुआओँ का सवाल है तो प्रहलाद की बुआ के अलवा इंदिराजी की बुआ विजयलक्ष्मी पंडित का ही इतिहास में उल्लेख मिलता है बाकी बुआएं तो भतीजे-भतीजियों के लिए आंदोलन की ही वस्तु रही हैं। भतीजे-भतीजिया- बुआ री बुआ…दे…दे पुआ की इंकलाबी मांग कर यह सिद्ध कर देते हैं कि बुआ नामक वस्तु हमेशा मेनेजमेंट का ही भाग होती है। और उन्हें उनका पूरा हक नहीं देती है। भाभी और देवर के संबंधों को पता नहीं किन बाहरी शक्तियों ने प्रदूषित किया है पर इतिहास के मुताबिक भाभियों का रिश्ता बड़ा ही पवित्र होता है। चाहे लक्षमण की भाभी सीता हो,चाहे भगतसिंह की मुंहबोली दुर्गा भाभी हो या सलमान की मलाइका भाभी। सभी भाभियां वीआईपी हैं। वैसे भाभी होती ही वीआईपी हैं। क्योंकि देवर का सारा वजूद ही भाभियों पर टिका होता है। भाभी न हो तो देवर जिंदगीभर भाई-का-भाई ही रह जाता है। और भाई होना कोई मजाक बात नहीं है मगर किसी को भाई कह देना गंभीर मजाक जरूर है। भाई का संबोधन इतना हत्यात्मक है कि अगर कोई कन्या किसी छैलाबाबू को भाई कह दे तो वह अपनी निजी पर्सनल आत्महत्या कर लेगा या फिर उस कन्या का सार्वजनिक वध करने पर उतारू हो जाएगा। कुछ स्वाभिमानी भाई तो सहर्ष आत्महत्या कर भी लेते हैं। भाभी का देवर होना उसकेलिए हेल्प लाइन है। भाई का भाई के रूप में पैदा होना तो एक दुर्घटना है,मजबूरी है मगर स्वेच्छा से भाई तो गुजरात में भी शायद कोई होता हो। भले ही मरते दम तक मोटा भाई, छोटा भाई, और मीराबैन,दीपा बैन-जैसे संबोधनों को ढोने को वे अभिषप्त हों। मन से भाई की टाइटिल किसी भाई को नहीं भायी। और भाई-भाई को तो बिल्कुल नहीं भायी। रावण-विभीषण,कौरव-पांडव,बाली-सुग्रीव सभी इसी झल्लाहट में खीझते रहे। चाहे किसी भी सभा का सभाई हो,भाई आखिर भाई ही होता है। और मौका पड़ते ही वह अपने भाई होने का सबूत हर हाल में दे ही देता है। औरंगजेब ने अपने भाइयों को तुरंत सेवा के तहत जन्नत की सैर करा के अपने भातृत्व प्रेम की जो अनुपम मिसाल कायम की वह भाइयों की दुनिया में इतिहास बन गई। सौभाग्य से हमें आज भी राहुल और वरुण दो भाई मिले हुए हैं। सारे देश की निगाहें इन दोनों भाइयों पर टिकी हुई हैं कि कब ये अपने भाई होने का सबूत देते हैं। रिश्तों का ऐसा विविधभारती कार्यक्रम, है विश्व के किसी और देश में। हो भी कैसे सकता है। हमारे यहां रिश्ते-तो-रिश्ते खुद लोग ऐसी टेक्नीक से पैदा होते हैं कि विश्व में कोई हमारा मुकाबला नहीं कर सकता। जहां धरती से सीता,खंभे से नरसिंह अवतार और घड़े से अगस्त मुनि पैदा हो जाते हैं। और रिश्तों का तो हाल यह है कि अगर धोखे से आदमी की नजर में कोई सांप आ जाए और वह उसकी आस्तीन की नागरिकता प्राप्त करले तो वह अपने आस्तीन के मालिक से ताउम्र दोस्ती का रिश्ता निभाता है। यह है हमारे देश में रिश्तों का सम्मान। रिश्तों में सबसे पवित्र रिश्ता आस्तीन के सांप का ही होता है। जिसे हर भारतीय दूध पिला-पिलाकर पालता-पोसता है। आस्तीन का सांप। गद्दारी में फुर्तीला और वफादारी में आलसी। दुनिया का और कोई देश इस मामले में हमसे टक्कर ले ही नहीं सकता। क्योंकि आस्तीन के सांप सिर्फ हिंदुस्तान में ही पाए जाते हैं। जंगल से लेकर शहर तक,दफ्तर से लेकर घर तक, किसी-न-किसी रूप में ये हमेशा बिन मांगी मुराद की तरह हर भारतीय को ईश्वर के वरदान की तरह उपलब्ध है। और सबसे गौरव की बात यह है कि ऐसे इच्छाधारी सिद्ध सिर्फ भारतीय ही होते हैं जो जब चाहें मनुष्य होते हुए भी आस्तीन के सांप बन जाएं। हम आभारी हैं इन आस्तीन के सांपों के जिनकी बदौलत हम एक गौरवशाली इतिहास के मालिक बने। और जिनकी दूरदृष्टि और उदार विचारधारा के कारण हमें अंग्रेजों और मुगलों को अपने देश का अतिथि बनाने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। अगर ये नहीं होते तो हम वसुधैव कुटुंबकम और अतिथि देवो भव-जैसे महावाक्यों को कैसे सही सिद्ध कर पाते। कैसे हम दुनिया को मुंह दिखाते। हमारे इतिहास को हर बार इन्हीं आस्तीन के सांपों ने एक नई दिशा दी है। हमारा तो इतिहास ही परिवार और रिश्तों की बुनियाद पर खड़ा है। पहले राजशाही में भी परिवार थे जो राज्य करते थे। आज प्रजातंत्र में भी कुछ परिवार हैं जो राज्य करते हैं। बाकी का रिश्ता सिर्फ प्रजा का है। पहले भी यही था। हम लोग रिश्तों को कमीज की तरह नहीं बदलते। यही तो हमारे रिश्तों की ताकत है। अगर आपसे हमारा इस जन्म में कोई डाइरेक्ट रिश्ता नहीं बनता है तो भी हम यह कहकर कि मेरा तुझसे पहले का नाता है कोई आपसे पिछले जनम की डायरेक्टरी से जोड़कर,खंगालकर कोई रिश्ता बना ही लेंगे। क्योंकि रिश्ते हमारी पावर हैं। और इन रिश्तों की बदौलत ही हम दुनिया में सुपर पावर हैं।

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