लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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-लिमटी खरे

2011 की जनगणना के लिए भारत सरकार की सेनाएं (कर्मचारियों की फोज) सज गईं हैं। हर घर जाकर भारत की वर्तमान जनसंख्या के बारे में आंकडे जुटाए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया के पहले चरण में जनगणना में लगे अधिकारी लोगों के पास पहुंचने आरंभ हो गए हैं, बावजूद इसके संसद में बैठे जनसेवकों का एक बहुत बडा धडा आज भी इस बात पर आमदा ही नजर आ रहा हैं कि जनगणना को जातिगत अधार पर कराया जाए। आखिर जातिगत आधार पर जनगणना का औचित्य क्या है, इस बात पर कोई कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है, बस मेरी मुर्गी की डेढ टांग की कहावत चरितार्थ करने में लगे हैं सारे जनसेवक। जाति के अधार पर जनगणना के मासले पर केंद्रीय केबनेट भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है कि आखिर एसा क्या हुआ कि समय रहते इस मामले में विचार विमर्श क्यों नहीं किया गया। आखिर क्या वजह है कि जनसेवकों के तर्क कुर्तक पर केंद्र सरकार ठोस तर्क से लेस होकर सामने आने से क्यों घबरा ही है। कानून मंत्री वीरप्पा मोईली खुद भी जाति आधारित जनगणना के पोषक बनकर सामने आए हैं, तब केंद्र सरकार क्या खाक इस मामले में बचाव के लिए आगे आ सकेगी। जनगणना का काम आरंभ हो चुका है फिर उसे करने या न करने में केंद्र सरकार का संशय समझ से परे ही है।

अगर देखा जाए तो भारत जैसा देश दुनिया में बिरला ही होगा, जहां हर वर्ग, धर्म, सम्भाव के लोगों को अपने मन मर्जी के काम करने की पूरी आजादी है। इन परिस्थितियों में भारत में जनगणना को जाति, वर्ग, संप्रदाय से पूरी तरह मुक्त ही रखा जाना चाहिए था। एक तरफ तो भारत सरकार यह बात जोर शोर से कहती है कि हम सिर्फ भारतीय हैं, वहीं दूसरी ओर जनगणना में जाति, वर्ग, संप्रदाय की बात कहना बेमानी ही होगा। भारत में जाति आधारित जनगणना का आगाज 1881 में हुआ था, जिसे 1931 में समाप्त कर दिया गया था। 1931 से 2001 तक किसी को भी जाति आधारित जनगणना नहीं किए जाने से कोई आपत्ति नहीं हुई। भारत गणराज्य के संविधान निर्माताओं ने भी जाति आधारित जनगणना को समर्थन नहीं दिया।

दरअसल, जाति आधारित जनगणना को हवा मिली है पिछडों को आरक्षण देने की कवायद के बाद। पिछडों के बल पर राजनीति करने वाले नेताओं को लगने लगा है कि जाति अधारित जनगणना से अगडों और पिछडों की संख्या का ठीक ठीक भान होने पर वे अपनी राजनीति को और अधिक चमका सकेंगे। देखा जाए तो यह मामला काफी हद तक आईने की तरह ही साफ है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में भी इस तरह की मांग उठी थी, तब बाजपेयी की अगुआई में हुई मंत्रीमंडल की बैठक में इसे सिरे से खारिज कर दिया था। इसके बाद पिछले साल नवंबन में केंद्रीय कानून मंत्री ने भी जाति आधारित जनगणना चाही थी, पर प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने इसे भी खारिज ही कर दिया था।

जाति आधारित जनगणना चाहने वालों का तर्क सही करार दिया जा सकता है कि जब सरकार जाति के आधार पर आरक्षण और अन्य कार्यक्रमों का संचालन करती है तो फिर जनगणना को जाति के आधार पर क्यों नहीं! इस मामले में सरकार को सोचना ही होगा कि आखिर एसा क्यों! क्या देश के शासकों ने अब तक की नीतियां इतनी खोखली बनाईं थीं कि समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान करने के बावजूद भी देश को आजाद हुए 62 साल हो चुके हैं और पिछडों को मुख्यधारा में नहीं लाया जा सका है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि जाति आधारित आरक्षण को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया जाना चाहिए। इसके स्थान पर अब गरीबों की आर्थिक स्थिति को आधार बनाकर आरक्षण का प्रावधान किया जाना चाहिए, क्योंकि गरीब की कोई जात नहीं होती। आर्थिक तौर पर पिछडे लोगों को वास्तव में सरकारी इमदाद की आवश्यक्ता है। विडम्बना ही कही जाएगी कि इस मामले में ना तो केंद्र सरकार ही कोई ध्यान दे रही है और न ही विपक्ष में बैठे जनसेवक ही कोई प्रयास करते नजर आ रहे हैं।

भारत की आजादी के उपरांत यही अवधारणा जन्मी थी कि वंचित और दबे कुचले, असहाय समुदायों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण की अस्थाई व्यवस्था की जाए ताकि ये अपना सामाजिक जीवन बेहतर बना सकें। यह व्यवस्था पहले दस सालों के लिए लागू की गई थी, बाद में किसी जांच आयोग के कार्यकाल की तरह इसकी समयावधि निरंतर ही बढाई जाती रही है। देखा जाए तो आरक्षण के पीछे मूल भावना यह रही है कि जात पात के भेदभाव को अंततोगत्वा समाप्त ही किया जाए। पिछले कुछ दशकों में आर्थिक सामाजिक विकास की सतत प्रक्रिया ने लोगों के रहन सहन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसके परिणाम स्वरूप समाज और परिवार का ढांचा बदला है। एक समय था जब अंतर्जातीय विवाह करने वाले को आश्चर्य की नजर से देखा जाता था, पर आज खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों को अगर छोड दिया जाए तो इस तरह के विवाह आम हो चुके हैं।

2011 की जनगणना में 2,209 करोड रूपए फूंके जाने वाले हैं, इस बार। इस काम में 12 हजार टन कागज का प्रयोग किया जाएगा, एवं 64 करोड से ज्यादा फार्म भरे जाएंगे। इस काम में 25 लाख से अधिक कर्मचारी और अधिकारी शामिल हो रहे हैं इस काम में। इसमें 7 हजार कस्बे और 6 लाख गांव शामिल किए गए हैं। देखा जाए तो जब बच्चा स्कूल में पढता है, तब उसे यह पता नहीं होता है कि वह जिसके बाजू में बैठकर अध्ययन कर रहा है वह किस जाति का है, वह तो महज उसका नाम ही जानता है। स्कूल में रोजाना आधी छुट्टी के वक्त जिसके साथ बैठकर वह अपना टिफिन शेयर करता है, वह किस जाति का है उसे इससे कोई लेना देना नहीं होता है। बाद में जब वह पढ लिखकर नौकरी के लिए जाता है तब जरूर उसे पता चलता है कि फलां नौकरी उसके उसी बाल सखा को मिल गई क्योंकि वह पिछडा था, और वह इसलिए वंचित रह गया क्योंकि वह अगडी जाति के घर में जन्म लेकर दुनिया में आया है। इस तरह के भेदभाव को जन्म देने वाली व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से रोकने की महती आवश्यक्ता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारतवासियों की आपस में बढती कटुता को और अधिक बढाने के मार्ग प्रशस्त होंगे, जिसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि जनसेवकों को अपने निहित स्वार्थों को परे रखना ही होगा, और अखंड भारत में दरार डालने वाली जात पात की व्यवस्था पर लगाम लगाना होगा, वरना आने वाले कल के भारत की तस्वीर और भयावह हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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