हम सबकी जिम्मेदारी है : पिछड़े बालकों की समस्याएँ

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विकास व्यक्ति की अनुवांसिक क्षमताओं एवं वातावरण के मध्य होनें वाली आंतरिक क्रिया का परिणाम होता है. बालक की अनुवांसिक क्षमताओं का विकास वातावरण से ही होता है. इसके अतिरिक्त स्वयं वातावरण भी बालक के विकास की दिशा, दशा और गति निर्धारित करनें में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

बचपन मुस्कुराने से महरूम न हो जाए

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– ललित गर्ग – इन दिनों बन रहे समाज में बच्चों की स्कूल जाने की उम्र लगातार घटती जा रही है, बच्चों के खेलने की उम्र को पढ़ाई-लिखाई में झोंका जा रहा है, उन पर तरह-तरह के स्कूली दबाव डाले जा रहे हैं। अभिभावकों की यह एक तरह की अफण्डता है जो स्टेटस सिम्बल के… Read more »

कैसें प्राप्त करें अच्छे अंक परीक्षाओं में ???

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हर माता पिता के दिमाग एक बहुत बड़ा प्रश्न उठता  हैं कि उनका बच्चा  परीक्षा में अच्छे अंक कैसे प्राप्त करे ??? जिसका जवाब वही बच्चे दे सकते हैं जिन्होंने परीक्षा उत्तीर्ण  कर ली है। परीक्षाओं के नाम सें बच्चे तो बच्चे बल्कि उनके माता पिता भी घबराते हैं लेकिन यह बहुत बड़ी बात नहीं… Read more »

बाल पंचायत: बच्चों की अपनी सरकार

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अंतराष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस पर विशेष बाल पंचायत: बच्चों की अपनी सरकार रामकुमार विद्यार्थी बच्चे आने वाला कल हैं, वे देश का भविष्य हैं ! ऐसी बातें हम सालों से सुनते आ रहे हैं । लेकिन इन बच्चों का आज बना रहे इसके लिए हम क्या कर रहे हैं ? इन सवालों को लेकर बांलपंचायत… Read more »

बचपन की कैद  

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नन्हें नन्हें कांधों पर वजन उठाये कौन सी जंग लड़ रहे हैं ये ज़िन्दगी के मासूम सिपाही। क्या यही है इनके लिये ज़िन्दगी की अनमोल सौगात? कब तक यूँ ही बोझा ढोयेंगे ये नन्हें-नन्हें कोमल हाथ? क्या यही है इनके लिये ज़िन्दगी के असली मायने? या देख पाएंगे ये भी कभी बचपन के सपने सुहाने? गुड्डे-गुड़ियों का घर सजाने… Read more »

एक चुनौती:-बच्चों को ‘ना’ कैसे कहें

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बच्चा आपके बराबर नहीं है। इसलिए यह ज़रूरी नहीं कि माँ बाप ने जिस बात के लिए ‘ना’ कहा है, उस बारे में बच्चे से बहस करें, मानो उनको यह साबित करना है कि उनका ‘ना’ कहना सही है। यह सही है कि जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसे “अपनी सोचने-समझने की शक्‍ति का प्रयोग करके सही-गलत में फर्क करना आना चाहिए।माँ बाप बच्चे के साथ तर्क तो करे मगर उससे लंबी-चौड़ी बहस मत कीजिए कि आपने उसको ‘ना’ क्यों कहा।

बिना बाल शिक्षा के देश के उज्जवल भविष्य की कल्पना करना निरर्थक

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वर्तमान में भारत देश में कई जगहों पर आर्थिक तंगी के कारण माँ-बाप ही थोड़े पैसों के लिए अपने बच्चों को ऐसे ठेकेदारों के हाथ बेच देते हैं, जो अपनी सुविधानुसारउनको होटलों, कोठियों तथा अन्य कारखानों आदि में काम पर लगा देते हैं। और उन्हीं होटलों, कोठियों और कारखानों के मालिक बच्चों को थोड़ा बहुत खाना देकरमनमाना काम कराते हैं। और घंटों बच्चों की क्षमता के विपरीत या उससे भी अधिक काम कराना, भर पेट भोजन न देना और मन के अनुसार कार्य न होने पर पिटाईयही बाल मजदूरों का जीवन बन जाता है।

हम क्यों नहीं बन सकते जीनियस ?

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ललित गर्ग – एक सूफी कहावत है कि खुद को बेहतर बनाना ही, बेहतर गांव, बेहतर शहर, बेहतर देश और बेहतर दुनिया बनाने की ओर पहला कदम होता है।’ चाहता तो हर कोई बेहतर करना ही है, लेकिन बेहतर करने के लिये सबसे पहले इस बात की जरूरत है कि वह अपने आपको गंभीरता से… Read more »

चित्रकला बनाना कैसे सीखें….? आइये जानें

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आज के आधुनिक युग में तमाम कलाएं व शैलियाँ भारत में फल- फूल रही हैं. उन्ही में एक तेजी से पल्लवित – पुष्पित होती कला का नाम है ”चित्र कला” जिन्हें कुछ लोग पेंटिंग भी कहते हैं.आज मैं इसी विधा के बारे में बताऊंगा कि कैसे एक ‘’चित्र कला प्रेमी’’ बिना किसी प्रशिक्षण के पेंटिंग… Read more »