हिंदी का अलख कैसे जगाएं ?

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हम अपनी मातृभाषा बोलने में ठीक वैसे ही शर्माते हैं जैसे कि एक मजदूर औरत के खून पसीने कि कमाई से पढ़ लिखकर बाबू बना बेटा अपनी उसी मजदूर माँ को, माँ कहते हुए शर्माता है ।हिंदी उस रानी की तरह है जिसे बाहर के राष्ट्र अपनी पटरानी बनाना चाहते हैं और उसका अपना राज्य… Read more »

काश, भारत को भी गांधी के शरीर में लिंकन मिल जाते

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी ये काश आज भारत की उस त्रासदी से जुड़ा है, जो भारत विभाजन की विभीषिका का स्याह पन्ना है। भारत का विभाजन हुआ यह सभी ने देखा, कहा जाता है कि नीयति ही उस दिन की ऐसी थी, पहले से सब कुछ तय था । पटकथा लिखी जा चुकी थी, परिवर्तन की… Read more »

मध्यकालीन भारतीय समाज और विदेशी यात्री

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डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री   विदेशी यात्रियों की नजर में भारत :   मध्यकालीन भारत के बारे में जिन विदेशियों ने भारत संबंधी कुछ विवरण लिखित रूप में छोड़ा, उनमें तीन लोगों का विशेष महत्व है – यूरोप का मेगस्थनीज, चीन का फाह्यान  और अरब का अल- बिरूनी । इनमें सबसे पुराना मेगस्थनीज (ईसा पूर्व तीसरी… Read more »

नेतृत्व, अनुशासन और संघशक्ति का प्रतीक ध्वज

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अशोक “प्रवृद्ध”   जाति और राष्ट्र को अतीत की स्मरण कराने वाले, उनकी रगों-नसों में प्राणों का संचार कराने वाले तथा उन्हें पूर्वजों की वीरता एवं गरिमा की ओर प्रेरित कर कर्तव्य पथ पर अग्रसर कराने वाले पताका, ध्वज अथवा झण्डे में नेतृत्व,अनुशासन और संघशक्ति तीनों एक ही साथ निहित समाहित हैं ।अतिप्राचीन काल से… Read more »

कपिलवस्तु का एक प्रमुख बौद्ध महाविहार-स्तूप

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सालारगढ़ डा. राधेश्याम द्विवेदी भारतीय संस्कृति एवं इतिहास में अध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक महापुरुषों का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। महात्मा बुद्ध और तीर्थंकर महाबीर के प्रादुर्भाव से एक नये युग का सूत्रपात हुआ है।1 धर्म दर्शन तथा ललित कलाओ के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन दिखलाई पड़ने लगे हें। उत्तर प्रदेश के नेपाल की सीमा… Read more »

हिन्दू धर्म ही नहीं जीवन दर्शन है

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डा राधेश्याम द्विवेदी हिन्दू राष्ट्र और हिन्दू धर्म को लेकर पूरे देश में कुछ लोगों ने एक मुहिम चला रखी है । अनेक राजनेता एवं धार्मिक जन इसका उल्टा.सीधा अर्थ निकालकर देश की भोली भाली जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं । वे अपनी पूर्वाग्रहयुक्त बातों को समाज एवं राष्ट्र पर थोपने का प्रयास कर… Read more »

हिन्दुओं के इतने बुरे दिन क्यों आ गए कि दलाई लामा से सहिष्णुता का सर्टिफिकेट लेना पड़ रहा है।

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काश मेरे पास भी कोई अकादमिक -साहित्यिक सम्मान पदक होता ! यदि राष्ट्रीय -अंतराष्ट्रीय किसी भी किस्म का कोई सम्मान पदक या साहित्यिक ,सामाजिक ,आर्थिक- वैज्ञानिक क्षेत्र में कोई विशिष्ठ उपलब्धि या ‘सनद’ मेरे पास होती ,तो फ़्रांस में हुए आतंकी हमलों के निमित्त, मैं ततकाल सारे सम्मान वापिस लौटा देता। पता नहीं मेरा यह… Read more »

लोकतंत्र का पर्व बनाम लोक कल्याण की भावना

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एम. अफसर खां सागर हर साल की तरह इस साल भी हम स्वतंत्रता दिवस का जश्न बड़े धूम-धाम से मना रहे हैं और मनाना भी चाहिए क्योंकि बड़ी कुर्बानियों के बाद देश को आजादी मिली है। कहीं शहादतों के कशीदे पढ़े जा रहे हैं तो कहीं लोकतंत्र का बखान मगर इन सबके बीच भूखतंत्र पर… Read more »

जन-गण-मन मंगलदायक जय हे

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नीलाक्ष “विक्रम”   राष्ट्रगान के एक शब्द अधिनायक को लेकर नई बहस शुरू है। बहस और अदालती मामले पहले भी सुर्खियां बने हैं। इस बार राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे दो लोगों में इस मुद्दे पर मतभिन्नता है। ‘अधिनायक’ शब्द हटाने या न हटाने को लेकर राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह और त्रिपुरा के… Read more »

गाँव इतिहास बन जाएंगे।

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इस मंजर को बयां करने के लिए मुझे करीब 12 -13 बरस पीछे जाना पड़ेगा क्योंकि इतने सालों पहले जब मैं शहर से गाँव के बीच का सफर तय किया करता था तो खेतों में लहलहाती फसलों, खेतों में पसीना बहाते किसानों, बहती नदियां व पेड़ पौधों से सृजित हरी भरी जमीन को देखता। कभी… Read more »