अभिलाषा

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आओ धरती को सजाएं,  हम एक उपवन की तरह, इसके हर अंश को महकाएं हम मधुबन की तरह, आओ धरती को सजाएं……….. एक धरती है जो बिन मांगे,  अपना सब देती, हमने छलनी किया सीना,  चुप कर सब सहती, रात-दिन सजदा करो,  चरणों में भगवन की तरह, आओ धरती को सजाएं…….. अपनी एक सांस भी… Read more »

आग बुझती जा रही है बस धुंआ सा रह गया

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आग बुझती जा रही है बस धुंआ सा रह गया राजनीती देख लगता, ये तमाशा रह गया,   जात में बंटते दिखे, धर्मों के ठेकेदार सब आदमी उनकी जिरह में बस ठगा सा रह गया,   एक बदली ने गिराई चंद बूंदे आस की, उस भरोसे की वजह से खेत प्यासा रह गया,   हर… Read more »

मेरे लफ़्ज तुझसे यकीं माँगें

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शालिनी तिवारी झुरमुट में दिखती परछाइयाँ घुँघुरू की मद्दिम आवाज लम्बे अर्से का अन्तराल तुझसे मिलने का इन्तजार चाँद की रोशन रातों में पल हरपल थमता जाए ऐसा लगता है मानो तुम मुझसे आलिंगन कर लोगी पर कुछ छण में परछाइयाँ नयनों से ओझल हो जायें दिन की घड़ी घड़ी में बस बस तेरी ही… Read more »

मिर्जा ग़ालिब का जीवन व आगरा की हवेली

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डा. राधेश्याम द्विवेदी जन्म व परिवार :- मिर्जा ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर सन् 1796 को आगरा के काला महल में हुई थी । गालिब ने अपनी जिंदगी का लंबा वक्त आगरा शहर के बाजार सीताराम की गली कासिम जान में बनी हवेली में गुजारा है। इस हवेली को संग्रहालय का रुप दे दिया गया… Read more »

अब पहले वाली कोई बात न रही !

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बस इतना इल्म कर लो अंधेरें के रहनुमाओं !
आफताब के आने पर कोई रात न रही !!
ऐतबार किस पर करें इस शहर में हम ‘मनीष’ !
आदमी अब भरोसे वाली जात न रही !!

चुपचाप सा सुनसान सा !

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चुपचाप सा सुनसान सा ! चुपचाप सा सुनसान सा, मेरा जहान है लग रहा; ना कह कहे चुलबुला-पन, इतना नज़र आ पा रहा ! वाला कहाँ अठखेलियाँ, लाला कहाँ गुलडंडियाँ; उर उछलते पगडंडियाँ, मन विचरते कर डाँडिया ! सोचों बँधे मोचों रुँधे, रहमों करम पर हैं पले; आत्मा खुली पूरी कहाँ, वे समझ पाए रब… Read more »

खो गया क्या वत्स मेरा !

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  खो गया क्या वत्स मेरा, विधि के व्यवधान में; आत्म के उत्थान में, या ध्यान के अभियान में ! उत्तरों की चाह में, प्रश्नों की या बौछार में; अनुभवों की अाग में, या भाव के व्यवहार में ! सहजता के शोध में, या अहंकारी मेघ में; व्याप्तता के बोध में, या शून्य के आरोह… Read more »

हो मुक्त बुद्धि से, हुआ अनुरक्त आत्मा चल रहा !

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हो मुक्त बुद्धि से, हुआ अनुरक्त आत्मा चल रहा; मैं युक्त हो संयुक्त पथ, परमात्म का रथ लख रहा ! मन को किए संयत नियत, नित प्रति नाता गढ़ रहा; चैतन्य की भव भव्यता में, चिर रचयिता चख रहा ! देही नहीं स्वामी रही, मोही नहीं ममता रही; चंचल कहाँ अब रति रही, गति अवाधित… Read more »