इतनी बेरूखी कभी अच्छी नहीं

Posted On by & filed under गजल

इतनी बेरूखी कभी अच्छी नहीं ज्यादा दीवानगी भी अच्छी नहीं। फासला जरूरी चाहिए बीच में इतनी दिल्लगी भी अच्छी नहीं। मेहमान नवाजी अच्छी लगती है सदा बेत्क्लुफ्फी भी अच्छी नहीं। कहते हैं प्यार अँधा होता है मगर आँखों की बेलिहाज़ी भी अच्छी नहीं। हर बात का एक दस्तूर होता है प्यार में खुदगर्जी भी अच्छी… Read more »

प्यादे बहुत मिले मगर वज़ीर न मिला

Posted On by & filed under गजल

प्यादे बहुत मिले मगर वज़ीर न मिला सबकुछ लुटा दे ऐसा दानवीर न मिला। जिसे दरम चाहिए न चाहिए दीनार ऐसा कोई मौला या फकीर न मिला। अपनी फकीरी में ही मस्त रहता हो फिर ऐसा कोई संत कबीर न मिला। प्यार के किस्से सारे पुराने हो चले अब रांझा ढूंढता अपनी हीर न मिला।… Read more »

बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा

Posted On by & filed under गजल

बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा। वक़्त का हर एक कदम, राहे ज़ुल्म पर बढ़ता रहा। ये सोच के कि आँच से प्यार की पिघलेगा कभी, मैं मोमदिल कहती रही, वो पत्थर बना ठगता रहा। उसको खबर नहीं थी कि मैं बेखबर नहीं, मैं अमृत समझ पीती रही, वो जब भी ज़हर देता… Read more »