उलझे हुए सवालात

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जग मोहन ठाकन अजीब से हालात हैं ,   हम क्या करें ? उलझे हुए सवालात हैं , हम क्या करें ? एफ डी आर्इ विदेशी   फंदा लग रहा , ये लोगों के ख्यालात हैं ,हम क्या करे ? धर्मों को उलझाकर  कुछ न पा सके तो , तंत्र खुफिया को उलझात हैं,हम क्या करें? कुत्ता… Read more »

बतियाँ

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तुम्हारे मुंह पर तुम्हारी बतियाँ हमारे मुंह पर  हमारी  बतियाँ बहुत मीठी मीठी सी लगती हैं उन की ऐसी खुशामदी बतियाँ ! तुम्हारे मुंह पर हमारी बतियाँ हमारे मुंह पर तुम्हारी बतियाँ सीना तक छलनी कर जाती हैं उन की ऐसी हैं कटारी बतियाँ ! कभी हैं शोला कभी हैं शबनम मरहम  नहीं हैं उन… Read more »

किसी को उस ने कबीरा बना दिया

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किसी को उस ने कबीरा बना दिया किसी को कृष्ण की मीरा बना दिया ! उसकी रहमतों का मै जिक्र क्या करूं मैं कांच का टुकड़ा था हीरा बना दिया ! किसी को खुशियों की सौगात दे दी किसी को दर्द का जज़ीरा बना दिया ! धूप और बारिश की दरकार जब हुई आसमा को… Read more »

आँसू को शबनम लिखते हैं

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जिसकी खातिर हम लिखते हैं वे कहते कि गम  लिखते हैं आस पास का हाल देखकर आँखें होतीं नम, लिखते हैं उदर की ज्वाला शांत हुई तो आँसू को शबनम लिखते हैं फूट गए गलती से पटाखे पर थाने में बम लिखते हैं प्रायोजित रचना को कितने हो करके बेदम लिखते हैं चकाचौंध में रहकर भी… Read more »

यह मुर्दों की बस्ती है

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व्यर्थ यहाँ क्यों बिगुल बजाते, यह मुर्दों की बस्ती है कौवे आते, राग सुनाते. यह मुर्दों की बस्ती है   यूँ भी शेर बचे हैं कितने, बचे हुए बीमार अभी राजा गीदड़ देश चलाते, यह मुर्दों की बस्ती है   गिद्धों की अब निकल पड़ी है, वे दरबार सजाते हैं बिना रोक वे धूम मचाते,… Read more »

अन्जान

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एक डर अन्जान सा, हर शख़्स के मन में बसा है | चीख़ने पर भी, सज़ा-ए-मौत से बढ कर सज़ा है | चुप रहो, सुनते रहो, चुपचाप सब सहते  रहो, देखना और बोलना, एक हुक्म से कुछ दिन मना है | हर ‘दुखद घटना’ पे दुख, होता है इस नेतृत्व को, भूल जाना दो दिनों… Read more »

यह मुर्दों की बस्ती है

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व्यर्थ यहाँ क्यों बिगुल बजाते, यह मुर्दों की बस्ती है कौवे आते, राग सुनाते. यह मुर्दों की बस्ती है यूँ भी शेर बचे हैं कितने, बचे हुए बीमार अभी राजा गीदड़ देश चलाते, यह मुर्दों की बस्ती है गिद्धों की अब निकल पड़ी है, वे दरबार सजाते हैं बिना रोक वे धूम मचाते, यह मुर्दों… Read more »

ममता कैसे अलग करोगे- श्यामल सुमन

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अलग अलग हैं नाम प्रभु के, प्रभुता कैसे अलग करोगे? सन्तानों के बीच में माँ की, ममता कैसे अलग करोगे?   अपने अपने धर्म सभी के, पंथ, वाद और नारे भी हैं मगर लहू के रंग की यारो, समता कैसे अलग करोगे?   अपने श्रम और प्रतिभा के दम, नर-नारी आगे बढ़ते हैं दे दोगे… Read more »

मेरे जीने की रफ्तार कम तो नहीं- श्यामल सुमन

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मौत आती है आने दे डर है किसे, मेरे जीने की रफ्तार कम तो नहीं बाँटते ही रहो प्यार घटता नहीं, माप लेना तू सौ बार कम तो नहीं   गम छुपाने की तरकीब का है चलन, लोग चिलमन बनाते हैं मुस्कान की पार गम के उतर वक्त से जूझकर, अपनी हिम्मत पे अधिकार कम… Read more »

तेरे जाने के बाद ही शाम हो गई

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तेरे जाने के बाद ही शाम हो गई शब् पूरी अंधेरों के नाम हो गई ! मैक़दे की तरफ बढ़ चले क़दम ज़िंदगी ही फिर जैसे ज़ाम हो गई ! आँखों से आंसु बन बह गया दर्द उम्मीद मेरी मुझ पे इल्ज़ाम हो गई ! वक्त का फिर कभी पता नहीं चला रफ़्ता रफ़्ता उम्र… Read more »