तेरी आहट

Posted On by & filed under गजल

                    जग मोहन ठाकन तेरी वक्रोक्ति को लबों की सजावट समझकर हम खिल खिलाते रहे  मुस्कुराहट समझकर जब जब घण्टी बजी किसी भी द्वार की हम दौड कर आये तेरी आहट समझकर ना आना था ,    ना आये    तुम कभी संतोष कर लिया तेरी छलावट समझकर… Read more »

अपनी भाषा और अपनी आन को लड़ते रहे उनके हिस्से लाठियों की मार है इस देश में ?

Posted On by & filed under गजल

राष्ट्र भाषा हिन्दी के सम्मान के लिये आन्दोलन करने वाले श्याम रूद्र पाठक के साथ पुलिस ने लगातार अभद्रता की पुलिसिया हरकत बताती हैकि इस देश में लोक तंत्र की असलियत क्या है. लोकतंत्र के पतन पर एक ग़ज़ल पेश है . कौन कहता है मेरी सरकार है इस देश में आम है जो आदमी… Read more »

उलझे हुए सवालात

Posted On by & filed under गजल

जग मोहन ठाकन अजीब से हालात हैं ,   हम क्या करें ? उलझे हुए सवालात हैं , हम क्या करें ? एफ डी आर्इ विदेशी   फंदा लग रहा , ये लोगों के ख्यालात हैं ,हम क्या करे ? धर्मों को उलझाकर  कुछ न पा सके तो , तंत्र खुफिया को उलझात हैं,हम क्या करें? कुत्ता… Read more »

बतियाँ

Posted On by & filed under गजल, साहित्‍य

तुम्हारे मुंह पर तुम्हारी बतियाँ हमारे मुंह पर  हमारी  बतियाँ बहुत मीठी मीठी सी लगती हैं उन की ऐसी खुशामदी बतियाँ ! तुम्हारे मुंह पर हमारी बतियाँ हमारे मुंह पर तुम्हारी बतियाँ सीना तक छलनी कर जाती हैं उन की ऐसी हैं कटारी बतियाँ ! कभी हैं शोला कभी हैं शबनम मरहम  नहीं हैं उन… Read more »

किसी को उस ने कबीरा बना दिया

Posted On by & filed under गजल, साहित्‍य

किसी को उस ने कबीरा बना दिया किसी को कृष्ण की मीरा बना दिया ! उसकी रहमतों का मै जिक्र क्या करूं मैं कांच का टुकड़ा था हीरा बना दिया ! किसी को खुशियों की सौगात दे दी किसी को दर्द का जज़ीरा बना दिया ! धूप और बारिश की दरकार जब हुई आसमा को… Read more »

आँसू को शबनम लिखते हैं

Posted On by & filed under गजल, साहित्‍य

जिसकी खातिर हम लिखते हैं वे कहते कि गम  लिखते हैं आस पास का हाल देखकर आँखें होतीं नम, लिखते हैं उदर की ज्वाला शांत हुई तो आँसू को शबनम लिखते हैं फूट गए गलती से पटाखे पर थाने में बम लिखते हैं प्रायोजित रचना को कितने हो करके बेदम लिखते हैं चकाचौंध में रहकर भी… Read more »

यह मुर्दों की बस्ती है

Posted On by & filed under गजल

व्यर्थ यहाँ क्यों बिगुल बजाते, यह मुर्दों की बस्ती है कौवे आते, राग सुनाते. यह मुर्दों की बस्ती है   यूँ भी शेर बचे हैं कितने, बचे हुए बीमार अभी राजा गीदड़ देश चलाते, यह मुर्दों की बस्ती है   गिद्धों की अब निकल पड़ी है, वे दरबार सजाते हैं बिना रोक वे धूम मचाते,… Read more »

अन्जान

Posted On by & filed under गजल, साहित्‍य

एक डर अन्जान सा, हर शख़्स के मन में बसा है | चीख़ने पर भी, सज़ा-ए-मौत से बढ कर सज़ा है | चुप रहो, सुनते रहो, चुपचाप सब सहते  रहो, देखना और बोलना, एक हुक्म से कुछ दिन मना है | हर ‘दुखद घटना’ पे दुख, होता है इस नेतृत्व को, भूल जाना दो दिनों… Read more »

यह मुर्दों की बस्ती है

Posted On by & filed under गजल

व्यर्थ यहाँ क्यों बिगुल बजाते, यह मुर्दों की बस्ती है कौवे आते, राग सुनाते. यह मुर्दों की बस्ती है यूँ भी शेर बचे हैं कितने, बचे हुए बीमार अभी राजा गीदड़ देश चलाते, यह मुर्दों की बस्ती है गिद्धों की अब निकल पड़ी है, वे दरबार सजाते हैं बिना रोक वे धूम मचाते, यह मुर्दों… Read more »

ममता कैसे अलग करोगे- श्यामल सुमन

Posted On by & filed under गजल, साहित्‍य

अलग अलग हैं नाम प्रभु के, प्रभुता कैसे अलग करोगे? सन्तानों के बीच में माँ की, ममता कैसे अलग करोगे?   अपने अपने धर्म सभी के, पंथ, वाद और नारे भी हैं मगर लहू के रंग की यारो, समता कैसे अलग करोगे?   अपने श्रम और प्रतिभा के दम, नर-नारी आगे बढ़ते हैं दे दोगे… Read more »