तेरे जाने के बाद ही शाम हो गई

Posted On by & filed under गजल, साहित्‍य

तेरे जाने के बाद ही शाम हो गई शब् पूरी अंधेरों के नाम हो गई ! मैक़दे की तरफ बढ़ चले क़दम ज़िंदगी ही फिर जैसे ज़ाम हो गई ! आँखों से आंसु बन बह गया दर्द उम्मीद मेरी मुझ पे इल्ज़ाम हो गई ! वक्त का फिर कभी पता नहीं चला रफ़्ता रफ़्ता उम्र… Read more »

गज़ल-मैंने देखा खून आज

Posted On by & filed under गजल

(राघवेन्द्र कुमार “राघव”) मैंने देखा खून आज , राह में गिरा हुआ । पूछा खून किसका है, कोई तो बताइए । क्या हुआ जो आप सब, क्रोध में उबल रहे । व्यर्थ ही सामर्थ्य आप, ऐसे ना जलाइए । खून कौन हिन्दू है, कौन खून मुसलमान । सिखों का है खून कौन आइए बताइए । जाति – पांति भेद भाव, सियासती उसूल हैं । नफरतों… Read more »

नज़्म

Posted On by & filed under गजल

राघवेन्द्र कुमार “राघव”   किसी की तासीर है तबस्सुम, किसी की तबस्सुम को हम तरसते हैं । है बड़ा असरार ये, आख़िर ऐसा क्या है इस तबस्सुम में ।। देखकर जज़्ब उनका, मन मचलता परस्तिश को उनकी । दिल-ए-इंतिख़ाब हैं वो, इश्क-ए-इब्तिदा हुआ । उफ़्क पर जो थी ख़ियाबां, उसकी रंगत कहां गयी । वो… Read more »

लो जान हथेली पे तो दुनिया है तुम्हारी…..

Posted On by & filed under गजल

-इक़बाल हिंदुस्तानी तूफ़ां में कश्तियों को किनारा नहीं मिलता, अपनों का भी गुरबत में सहारा नहीं मिलता।   लातूर से सूरत से सबक़ सीखना होगा, कुदरत से बार बार इशारा नहीं मिलता।   रहबर ही तंगनज़र है तो फिर लोग क्या करें, हो जिसमें सबकी बात वो नारा नहीं मिलता। लो जान हथेली पे तो… Read more »

रिश्तों को निभाना है मगर यह नहीं सोचा….

Posted On by & filed under गजल

इक़बाल हिंदुस्तानी पैसा तो कमाना है मगर यह नहीं सोचा, किरदार बचाना है मगर यह नहीं सोचा। मंदिर बने मस्जिद बने हंगामा है बरपा, मकतब भी बनाना है मगर यह नहीं सोचा।   बेटा मेरा अफ़सर बने हर बाप का सपना, इंसां भी बनाना है मगर यह नहीं सोचा।   कीमत चुका के आपने रिश्ते… Read more »

रिश्ते भी हो गये हैं व्यापार की तरह….

Posted On by & filed under गजल

               इक़बाल हिंदुस्तानी दावा तो कर रहे थे वफ़ादार की तरह , अब क्यों खड़े हैं आप ख़तावार की तरह। अफ़सोस मेरे क़त्ल में ऐसे भी लोग थे, आये थे घर मेरे जो मददगार की तरह ।   दौलत तमाम रिश्तों की चाबी है आजकल, रिश्ते भी हो गये… Read more »

छलकते जज्बात

Posted On by & filed under गजल

लोगों के बीच में आंखे चुराते हुए मुझे देखना और जब मैं मुस्कराऊं तो तुम्हारी आंखों की चमक गालों की लालिमा, कह जाती है तुम्हें हमसे प्यार है हमारी जरूरत है… मुझे देखते हुए जब लोगों ने शुरू की तुम्हारी खिंचाई  , तो बड़ी बहादुरी से आपका यह कहना हां, मैं देख रहा था और… Read more »

मतलब ना हो तो अपने भी पहचानते नहीं….

Posted On by & filed under गजल

               -इक़बाल हिंदुस्तानी जब ज़िंदगी हमारी परेशान हो गयी, अपने पराये की हमें पहचान हो गयी। सोने की चिड़िया उड़ गयी मुर्दार रह गये, दंगों से बस्ती देश की शमशान हो गयी।   मतलब ना हो तो अपने भी पहचानते नहीं, रिश्तों की जड़ भी फ़ायदा नुकसान हो गयी।… Read more »

अदना इंसां से भी रिश्ते को बनाकर रखना….

Posted On by & filed under गजल

इक़बाल हिंदुस्तानी क़हर आलोद निगाहों से बचाकर रखना, अपने महबूब को आंखों में बसाकर रखना।   आपके सारे ग़मों को भी मैं अपना लूंगा, आप होंटो पे तबस्सुम को सजाकर रखना।   हर तरफ खूनी फ़सादों के भयानक मंज़र, नाता अफ़ज़ल है पड़ौसी से निभाकर रखना।   बनके मशहूर ना मग़रूर बनाना खुद को, अदना… Read more »

मुहोब्बत की भला इससे बड़ी

Posted On by & filed under गजल

मुहोब्बत की भला इससे बड़ी सौगात क्या होगी जला कर घर खड़ा हूँ मै यहाँ अब रात क्या होगी ||   गुनाहों में गिना जाने लगा दीदार करना अब हसीनो के लिए इससे बड़ी खैरात क्या होगी ||   सुबह से शाम तक देखे कई पतझड़ दरीचे में गरजते बादलों की रात है बरसात क्या… Read more »