भारत-रत्न दिलवाने की जिद

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विनोद उपाध्याय 2 जनवरी 1954 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने जब कला, साहित्य, विज्ञान और सार्वजनिक सेवा में उल्लेखनीय योगदान करने वालों को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने के लिए भारत रत्न की स्थापना की थी तब यह सोचा भी नहीं होगा की भविष्य में यह विवाद का केंद्र बनेगा। भारत… Read more »

खाकी में खोखली और बीमार U.P पुलिस

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शादाब जफर “शादाब’’ दरोगा बनने की ललक में मेरठ हादसे के अगले ही दिन 24 और अभ्यर्थी सिपाही दौड में बीमार होने के बाद आजमग में भी दौड पूरी न कर सके और अस्पताल पहुच गये। इन में से एक सिपाही तो निराशा के कारण अस्पताल की छत से जान देने के उद्देश्य से कूद… Read more »

शिव स्वयं सावन हैं

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समग्र किसान चेतना का प्रतीक है- शिव पंडित सुरेश नीरव सावन का महीना। चैत्र मास से शुरू होनेवाले भारतीय कैलेंडर का पांचवा महीना। पांच यानि सृष्टि के पंचभूत का प्रतीक। तो फिर क्यों न हो भूताधिपति महादेव को प्रिय यह पांचवां महीना। जो स्वयं जल की तरह तरल और भोले हैं। जिनके माथे पर चंद्रमा… Read more »

आज बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस है

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वीरेन्द्र जैन उन्नीस जुलाई वह तिथि है, जिसने वर्ष 1969 में न केवल राजनीति के क्षेत्र में अपितु आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में भी अपने निशान छोड़े है, यह वह दिन था जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने संसद में अपना बहुमत बनाने के लिए वामपंथी दलों से समर्थन प्राप्त करने हेतु 14… Read more »

और कितने आतंकवादी हमले सहेगा भारत?

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नरेश भारतीय भारत में आतंकवादी धमाकों का दौर फिर से शुरू हो गया है. महानगरी मुम्बई जो अभी २००८ के धमाकों की गूंज और विनाशलीला को भुला नहीं सकी है उस पर इन ताजा हमलों से प्रकटत: उन्हीं तत्वों द्वारा पुनरपि यह सन्देश भारत को दिया गया है कि उनकी तरफ से लड़ाई रुकी नहीं… Read more »

हुसैन की कला और कलाबाजी

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शंकर शरण भारत के लोग दिवंगत व्यक्तियों के प्रति अप्रिय सत्य सामान्यतः नहीं कहते। किन्तु राजनीतिक लोगों और राष्ट्रीय प्रश्नों पर यह सलीका छोड़ना पड़ता है। फिर भी यदि नीचे कही गई बातें किन्हीं को अवसर के उपयुक्त न लगे तो उसे निवेदन है कि मुल्कराज आनंद के निधन पर खुशवंत सिंह का लिखा लेख… Read more »

बलि दो नौकरी लो – सरकारी बाबा

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हादसों में शिकार मासूम जिन्दगी कि मौत पर गैर जिम्मेदाराना राजनीति और खबरों के नाम पर भावनाओं के साथ मीडिया द्वारा बलात्कार करना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं । रेल हादसा के बाद होने वाली मौत पर सरकार – मौत के सन्नटे को चीरता सरकारी घोषणा मौत के लिए मुआवज़ा देना, मानो हादसे में मरने… Read more »

चौथा विश्वयुद्ध डंडों और पत्थरों से लड़ा जाएगा

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महेश दत्त शर्मा प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1919) तथा द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) ने दुनिया को ऐसी अपूरणीय क्षति दी, जिसकी भरपाई वह आज भी कर रही है। हिरोशिमा और नागासाकी के जख्म आज भी नहीं सूखे हैं। हिटलर ने यहूदियों को जो घाव दिए, उनसे वे आज भी आतंकित हैं। पर्ल हारबर का हमला अमेरिकियों में आज… Read more »

टैगोर को नोबल प्राइज मिला, महात्मा गांधी को क्यों नहीं?

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महेश दत्त शर्मा अकसर बीचबीच में यह सवाल उठता रहता है कि महात्मा गांधी को नोबल प्राइज क्यों नहीं मिला? इसके लिए कहना यह होगा कि लोग नोबल प्राइज मिलने पर चर्चा में आते हैं, वहीं जब गांधी जी को नोबल प्राइज देने की सुगबुगाहर शुरू हुई, वे उससे काफी पहले संसार भर में एक… Read more »

सामाजिक लड़ाई जारी है समलैंगिकों की

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महेश दत्त शर्मा भारतीय समलैंगिकों को कानूनी लड़ाई जीतकर क्या मिला है, यकीनन कानूनी संरक्षण तो मिला ही है। लेकिन स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने इसे एक बीमारी कहकर एक नई बहस छेड़ दी है। इससे लगता है कि समलैंगिकों को अभी लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए। हमारा समाज जो अभी अंतरजातीय… Read more »