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व्यंग्य/कुछ कहिए प्लीज!!

भाई जी, अब आप से छुपाना क्या! हम तो ठहरे जन्मजात दुर्बल! शादी से पहले और शादी के बाद बहुत कोशिश की कि दुर्बलता से छुटकारा मिले। पता नहीं कितने दावा करने वालों की गोलियां खाई, कभी बाप के पैसों की तो कभी ससुराल के पैसों की। अपने हाथों में ...

September 10th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 167 views | 2 Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: gव्यंग्य/कुछ कहिए प्लीजam!!, satire by Ashok Gautam

व्यंग्य/ बस यार बस!!

सुबह के साढ़े की दस बजे का टाइम हुआ होगा। मिसेज को दफ्तर रवाना करने के बाद लगे हाथ बरतन धो जरा धूप देखने के लिए दरवाजा खोल सीढ़ियों पर आराम फरमाने निकलने की सोच ही रहा था कि दरवाजे पर बेल हुई। कहीं श्रीमती दफ्तर से लौट तो नहीं ...

September 4th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 143 views | 2 Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, व्यंग्य

बुद्ध सेक्स के पहरेदार के रूप में

बुद्ध सेक्स के पहरेदार के रूप में मैं लाफिंग बुद्धा से वाकिफ़ नही था। दिल्ली में मुलाकात हुई, एक माल मे सजे हुए थे। मैने सोचा धर्म का बाज़ार बुद्ध से कैसे सुशोभित हो रहा है।  वह तो आकांक्षाओं को लगाम देने पर जोड़ देते थे और बाज़ार आकांक्षाओं पर आश्रित व्यवस्था है।  बाज़ार एक कदम आगे बढ़ ...

August 17th, 2009 | लेखक : कनिष्क कश्यप | 745 views | 2 Comments »
Posted in Category: प्रवक्ता न्यूज़, व्यंग्य, समाज | Tags: Laughing Buddha, मीडिया मॉनिटर

व्यंग्य/बाल भोगी महाराज की जय!!

समाज के तमाम सज्जनों की मानसिक कमजोरियों की वजह से, आपकी जेब, हैसियत और असंतोष के प्रति आपका अथाह प्रेम देखकर बाल भोगी जी महाराज आपका खराब हुआ वर्तमान सुधारने चौथी बार आपके शहर में पधार चुके हैं। तमाम मानसिक भोगियों को यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता होगी कि हम बाल ...

August 8th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 174 views | 1 Comment »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, व्यंग्य

व्यंग्य/कुकुरमुत्ते का उगना ……।

व्यंग्य/कुकुरमुत्ते का उगना ......। हम अपने दडबे में बैठे इस बात पर सोच को एकाग्र करने का सार्थक प्रयास कर रहे थे कि हमारे यहां पर आखिर एक कुकुरमुत्ता उग आने का हरसम्भव प्रयास क्यों कर रहा है? जबकि हमने ना ही तो कभी उसका बीजारोपण किया और ना ही ऐसा वातावरण बनाया कि ...

August 7th, 2009 | लेखक : रामस्‍वरूप रावतसरे | 92 views | No Comments »
Posted in Category: व्यंग्य |

व्‍यंग/रसोई घर में बनती सौ दिन की कार्य योजना

व्‍यंग/रसोई घर में बनती सौ दिन की कार्य योजना हम कमरे में बैठे टकटकी लगाये बाहर देख रहे थे कि कब गृहलक्ष्मी अपने कामों से फ्री हो और हमें भोजन मिले। पर गृहलक्ष्मी की स्थिति यह थी कि वह क्या कर रही है? किस कार्य में लगी है। मालूम ही नहीं चल रहा था। हमने उसे बार-बार पूछा कि ...

August 6th, 2009 | लेखक : रामस्‍वरूप रावतसरे | 222 views | 1 Comment »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, व्‍यंग

व्यंग्य : हे कुत्ते, तुझे सलाम!!

व्यंग्य : हे कुत्ते, तुझे सलाम!! वे मेरे परमादरणीय पड़ोसी हैं। मेरे लिए रोल माडल हैं। परमादरणीय इसलिए कि उन्होंने मुझे दुनियादारी की बहुत सी बातें सिखाई हैं। उनके ही आशीर्वाद से मैं यहां तक मक्खन लगाने की कला में निपुण हो पाया हूं। वे न होते तो कसम खाकर कहता हूं कि आज मैं एक ...

July 26th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 216 views | 1 Comment »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, व्यंग्य

व्यंग्य/ तालियां! तलियां!! तलियां!!!

व्यंग्य/ तालियां! तलियां!! तलियां!!! पहाड़ पर एक गांव था। गांव में सबकुछ था। पर पानी न था। कई बार चुनाव आए। वहां के लोगों से भरे पूरे मुंह मंत्रियों ने वोट के बदले पानी पहुंचाने के वादे किए और वोट ले रफूचक्कर होते रहे। और वे बेचारे पहाड़ पर से कोसों नीचे बहती नदी ...

July 21st, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 135 views | 2 Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, व्यंग्य

व्यंग्य : यार, लौट आओ!! – डॉ. अशोक गौतम

व्यंग्य : यार, लौट आओ!! - डॉ. अशोक गौतम इस इश्तहार के माध्यम से सर्व साधारण को एक बार फिर सूचित किया जाता है कि हमारे मुहल्ले का पिछले कई महीनों से गुम हुआ प्रेम अभी भी गुम है। इस बारे मैं कई बार देश के प्रमुख समाचार पत्रों के माध्यम से इश्तहार भी दे चुका हूं। पर आज ...

July 19th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 146 views | 2 Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, व्यंग्य

व्यंग्य/ बिन जूते सब सून/ अशोक गौतम

विश्व आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा हो तो गुजरता रहे भाई साहब! मुझे विश्व की आर्थिक मंदी से कोई लेना देना नहीं। विश्व को परेशान होते देख पत्नी ने मुझसे कहा, 'जब तक मैं चाय बनाती हूं, विश्व को ढांढस बंधा आओ।' 'मेरे अपने रोने ही क्या कम है ...

July 17th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 102 views | No Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, व्यंग्य

चुंबन की आवाज़ और चांटा !

चुंबन की आवाज़ और चांटा ! मुशर्रफ, मनमोहन, ऐश्वर्या राय और सोनिया एक ट्रेन में यात्रा कर रहे हैं। ट्रेन एक सुरंग से निकलती है ट्रेन में अंधेरा हो जाता है। अचानक वहां एक चुंबन ध्वनि और फिर एक थप्पड़ की आवाज आती है। ट्रेन सुरंग से बाहर आती है। सभी चुपचाप बैठे रहते हैं कोई कुछ नहीं ...

July 16th, 2009 | लेखक : जयराम 'विप्लव' | 466 views | 2 Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: Slap, आवाज़, चांटा

व्‍यंग/मुआ समय के फेर

इधर कम्बख्त चुनाव का दौर खत्म हुआ, उधर मेरे शहर में जूतों की दुकानों को ताले लगने की नौबत आ धमकी। कल तक जिन जूतों की दुकानों पर जूते खरीदने के लिए रेलमपेल हुई रहती थी, निम्न वर्ग के लोग बाग जूते खरीदने के लिए एक दूसरे के कपड़े फाड़ने ...

May 15th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 128 views | No Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, व्‍यंग

व्यंग्य/ अपनी राय दीजिए!!

वे हाथ में कुछ लहराते हुए पटरी से उतरी रेल के डिब्बे की तरह मेरी ओर आ रहे थे। डर भी लगा, हैं तो मेरे ताऊ! पर इन दिनों ताऊ ही दुश्मनों से अधिक पगला रहे हैं। वैसे भी आज के दौर में दुश्मन कौन से माथे पर दुश्मन का ...

May 12th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 80 views | No Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, व्यंग्य

व्यंग्य/शपथ खा, मौज़ मना

उसके बीसियों बार अपने बेटे के माध्यम से बुलाने पर मैं कुढ़ा, जला भुना उसके घर पहुंचा। हालांकि वह मेरा इमीजिएट पड़ोसी है। कहते हैं कि पेट और पड़ोस कभी खराब नहीं होने चाहिए। पर कहीं भी देख लो, आजकल और तो सब जगह सब ठीक है पर ये दो ...

May 8th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 99 views | No Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, व्यंग्य, शपथ

व्यंग्य/बुंदु उठ, लीडर बन

व्यंग्य/बुंदु उठ, लीडर बन बुंदु उठ, घराट बंद कर। चुनाव आ गया। खड्ड सूख गई। सिर में हाथ मत दे। परेशान मत हो। घराट का स्यापा मत कर। वोटर ही मत रह। वोटर होकर बहुत जी लिया। अब लीडर बन। कपीन फैंक। लंगोट कस। घराट में क्या रखा है? लीडरी में बहुत कमाई है। ...

April 27th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 1 views | No Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: vyangya, लीडर, व्यंग्य

एक समसामयिक राजनीतिक व्यंग्य – दीपक ‘मशाल’

एक समसामयिक राजनीतिक व्यंग्य - दीपक 'मशाल' आज की ताज़ा खबर, आज की ताज़ा खबर... 'कसाब की दाल में नमक ज्यादा', आज की ताज़ा खबर..... . चौंकिए मत, क्या मजाक है यार, आप चौंके भी नहीं होंगे क्योंकि हमारी महान मीडिया कुछ समय बाद ऐसी खबरें बनाने लगे तो कोई बड़ी बात नहीं. आप विगत कुछ दिनों की ...

April 15th, 2009 | लेखक : दीपक चौरसिया ‘मशाल’ | 341 views | 5 Comments »
Posted in Category: राजनीति, व्यंग्य | Tags: political satire, राजनीतिक व्यंग्य

तीर ए नजर/ जा बेटा, कुर्सी तोड़!!

इस स्कूल मास्टरी की वजह से कई बार घरवाली से जूते खा चुका हूं। बच्चे मुझे अपना बाप समझने में शरम समझते हैं। और वह अपनी बगल वाला माल मकहमे का चपड़ासी! उसके बच्चे भरे मुंह उसे बाप!बाप! कहते मुंह का थूक सुखाए रहते हैं। इधर-उधर के बच्चे भी जब ...

April 14th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 1 views | No Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: satire by Ashok Gautam, व्‍यंग

‘जरनैलिज्म’ नहीं जर्नलिज्म

यह अघोरपंथी राजनीति का दौर है। या यूं कहें कि अघोरपंथी राजनीति पर भदेस किस्म की प्रतिक्रिया है। अघोरपंथ में सांसारिक बंधनों और लोक मर्यादाओं की परवाह नहीं की जाती। आज राजनीति भी लोकआकांक्षाओं से बहुत दूर जा चुकी है और उस पर प्रतिक्रिया भी सत्याग्रह से आगे बढ़ कर ...

April 14th, 2009 | लेखक : आशुतोष | 223 views | 2 Comments »
Posted in Category: राजनीति, व्यंग्य | Tags: P. Chidambaram, reporter Janrail Singh, चिदंबरम, जरनैल सिंह

व्यंग्य/सशक्त उम्मीदवार का बायोडाटा

व्यंग्य/सशक्त उम्मीदवार का बायोडाटा कल सुबह ही मैं हाथ से मिली दाल को हाथी के दूध से बने घी का तड़का लगाने की तैयारी कर ही रहा था कि दरवाजे पर जोर-जोर की ठक-ठक हुई। साला तड़के का तड़के ही सारा मजा किरकिरा कर दिया। इससे पहले कि अनमने से आने वाले को कोसता ...

April 7th, 2009 | लेखक : अशोक गौतम | 1 views | 1 Comment »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: biodata, बायोडाटा, व्यंग्य

व्यंग्य /गंगा में चुनावी दंगा

चुनाव प्रचार की पिछले कल की थकी सांझ गंगा में ...........हाथ और हाथी चुनाव के वक्त सौभाग्य से एक साथ कहीं और डुबकी लगती न देख गंगा में डुबकी लगाने पधारे। गंगा ने बहुत रोका, पर नहीं माने तो नहीं माने। दोनों के जनता से झूठे वादे करके बुरे हाल। ...

April 6th, 2009 | लेखक : प्रवक्‍ता ब्यूरो | 1 views | No Comments »
Posted in Category: व्यंग्य | Tags: satire on election, चुनावी व्यंग्य

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