चुनाव सुधार : बस, चार कदम चलना होगा

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जनगणना-2011 के अनुसार, कुल भारतीय ग्रामीण आबादी में से 74.5 प्रतिशत परिवारों की आय पांच हजार रुपये प्रति माह से कम है। इसके विपरीत भारत की वर्तमान केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के 78 मंत्रियों में से 76 करोड़पति हैं। राज्य विधानसभाओं के 609 मंत्रियों में से 462 करोड़पति हैं। स्पष्ट है कि भारत की जनता गरीब है,… Read more »

अदालतों से अंग्रेजी को भगाओ

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कानून और न्याय की संसदीय कमेटी ने बड़ी हिम्मत का काम किया है। उसने अपनी रपट में सरकार से अनुरोध किया है कि वह सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं के प्रयोग को शुरु करवाए। उसने यह भी कहा है कि इसके लिए उसे सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति या सहमति की जरुरत नहीं है,… Read more »

शादी को तमाशा न बनाएं!

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कांग्रेस की सांसद श्रीमती रंजीत रंजन एक ऐसा विधेयक पेश कर रही हैं, जो अगर कानून बन गया तो सारे देश का बड़ा लाभ होगा। यह ऐसा कानून बनेगा, जिससे सभी जातियों, सभी मजहबों और सभी प्रांतों के लोगों को लाभ मिलेगा। यह विधेयक शादी में होने वाले अनाप-शनाप खर्चे पर रोक लगाने की मांग… Read more »

माननीयों को उच्‍चतम न्‍यायालय का संदेश

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारतीय परिवेश में तोहफों का अपना एक महत्‍व हैं। भारत में ही क्‍यों दुनिया के किसी भी कोने में चले जाओ, गिफ्ट देने और लेने का अपना आनन्‍द है, लेकिन जिस तरह इन तौहफों के फेर में स्‍वार्थी तत्‍व अपने कार्यों को करवाने में माननीयों से कामयाब हो जाते हैं, तब जरूर… Read more »

जस्टिस कर्णन लड़ें जरुर लेकिन….

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक कोलकाता उच्च न्यायालय के चर्चित जज सी.एस. कर्णन ने अब एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। वैसे भी जब वे मद्रास उच्च न्यायालय में थे, तब भी उन्होंने अपनी साथी जजों के विरुद्ध आदेश जारी कर दिए थे। उन्हें सबसे बड़ी शिकायत यह है कि मद्रास हाईकोर्ट के कई जज… Read more »

कठघरे में संविधान !?

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मनोज ज्वाला हमारे देश भारत का संविधान ‘भारतीय संविधान’ नहीं है , यह ‘अभारतीय संविधान’ है । मतलब यह कि जिसे भारतीय संविधान कहा जा रहा है , इसका निर्माण हम भारत के लोगों ने अथवा हमारे पूर्वजों ने हमारी इच्छानुसार नहीं किया है । वैसे कहने-कहाने देखने-दिखाने को तो इस संविधान की मूल प्रति… Read more »

जजों की नियुक्ति का विकल्प तलाशना महत्वपूर्ण

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संवैधानिक देश के लिए यह नितान्त महत्वपूर्ण तथ्य होता है कि वहां के नागरिकों को ऐसी सुविधाएं नसीब हो, जिससे उन्हें अपना सामाजिक और आर्थिक जीवन में रूकावट न हो. देश के लोगों को भारतीय संविधान के द्वारा कुछ अधिकार दिये गए है जिसकी रक्षा करना हमारे संवैधानिक तंत्र की जिम्मेदारी बनती है। आज देश… Read more »

धर्म के अंसैवाधानिक चुनावी प्रयोग पर अंकुश

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प्रमोद भार्गव सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय पीठ के ताजा फैसले से राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को धर्म, जाति, नस्ल, समुदाय और भाषा के आधार पर वोट मांगना मुश्किल होगा। वोट मांगे तो उम्मीदवारी को अंसैवाधानिक ठहराया जा सकता है ? हालांकि ऐसा तभी संभव होगा जब आचार-संहिता के उल्लघंन की उच्च न्यायालय में अपील… Read more »

न्यायपालिका और बढती पेंडेंसी

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 एक समाचार के अनुसार कल सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर के विदाई समारोह में भारी भीड़ को देख कर जस्टिस ठाकुर ने कहा कि सात साल के सर्वोच्च न्यायालय के कार्यकाल में अट्ठाईस विदाई समारोह देखे हैं लेकिन इतनी भीड़ पहले कभी नहीं देखी!उन्होंने मनोनीत मुख्य न्यायाधीश जस्टिस खेहर से कहा कि… Read more »

इससे लोकतंत्र का बागवां महकेगा

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विमुद्रीकरण के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब मोदी सरकार चुनाव सुधार की दिशा में भी बड़ा निर्णय लेने की तैयारी में है। संभव है सारे राष्ट्र में एक ही समय चुनाव हो- वे चाहे #लोकसभा हो या #विधानसभा। इन चुनाव सुधारों में दागदार नेताओं पर तो चुनाव लड़ने की पाबंदी लग ही सकती है, वहीं शायद एक व्यक्ति एक साथ दो सीटों पर भी चुनाव नहीं लड़ पाएगा?