क्या आज भी उतना ही प्रासंगिक है संविधान ?

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समूचा देश पिछले एक वर्ष से 25 नवंबर के दिन अपना संविधान दिवस मनाता है । इसकी शुरूआत 2015 से हुई क्योंकि ये वर्ष संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर के जन्म के 125वें साल के रूप में मनाया गया था। आज संविधान को अंगीकृत किये हुए देश को 66 वर्ष का समय हो गया है… Read more »

कब मिलेगा न्याय

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संविधान की व्याख्या के अनुसार भारत सरकार के तीन प्रमुख अंगों मंे व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के अधीन विभिन्न मंत्रालय और विभाग कार्यरत हैं । चूॅंकि नैसर्गिक न्याय से बढकर कुछ नहीं, अतः न्यायपालिका की कार्यकारी और महती भूमिका का जनतंत्र पर प्रभावी होना बहुत जरूरी है । संविधान के अनुसार भले ही दस गुनाहगार… Read more »

पूर्वाग्रही राजनीति की भेंट चढ़ता संविधान का अनुच्‍छेद 48

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जानवर कई बार बिकते हैं। कई हाथों से गुजरते हैं। हर खरीदार उनसे बदसलूकी करता है। जानवरों को ठीक से खाना-पानी नहीं मिलता क्योंकि हर खरीदार को पता होता है कि इसे आखिर में कत्ल ही होना है। कई बार तो जानवरों को फिटकरी वाला पानी दिया जाता है, जिससे उनके गुर्दे फेल हो जाएं। इससे उनके शरीर में पानी जमा हो जाता है। इससे जानवर हट्टे-कट्टे दिखते हैं। इससे उनकी अच्छी कीमत मिलती है। उन्हें पैदल ही एक बाजार से दूसरे बाजार ले जाया जाता है।

हिन्दू मामलों में माननीय सुप्रीम कोर्ट की रुचि अपेक्षाकृत ज्यादा

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डा. राधेश्याम द्विवेदी वैसे तो न्यायपालिका लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है। इसे पूरे देश की अखण्डता तथा समग्र देशवासी की भावना को देखते हुए ही कार्य करना चाहिए, परन्तु व्यवहार में अनेक अवसर आये हैं कि हिन्दू मामलों में जन भावना की अनदेखी की गई है। भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट एक स्वतंत्र संस्था… Read more »

बातचीत से सुलझ सकता है जाधव का मसला

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जाधव के मामले में पाकिस्तानी राजनीति में जूतम पैजार शुरु हो गई है लेकिन यह संतोष का विषय है कि भारत में पक्ष और विपक्ष एकजुट हैं। भारत सरकार, खासतौर से हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज बधाई की पात्र हैं, जिन्होंने जाधव के मामले में इतनी दृढ़ता और कर्मण्यता दिखाई लेकिन अभी खुशी से फूलकर कुप्पा हो जाना ठीक नहीं है। पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखना जरुरी है। सभी दक्षेस देशों, इस्लामी राष्ट्रों और महाशक्तियों से फोन करवाए जाएं और संयुक्त राष्ट्र के नए महासचिव अंतानियो गुतरस भी मध्यस्थता करें तो बेहतर हो।

अलविदा-तीन तलाक

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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब तीन तलाक की वर्तमान में जारी प्रक्रिया को सुधारने की दिशा में मौलवियों और काजियों को दिशा-निर्देश जारी करेगा। इन दिशा-निर्देशों को पूर्णत: लोकतांत्रिक और एक उदार सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप बनाने व ढालने का प्रयास किया जाएगा। अब विवाद होने पर पति पत्नी पारस्परिक सहमति से हल निकालेंगे। यदि उनकी पारस्परिक सहमति से हल नहीं निकलता है तो कुछ समय के लिए वे अस्थायी रूप से अलग हो जाएंगे जिससे कि परिस्थितियों की उत्तेजना शांत हो सके और दोनों को एक दूसरे को समझते हुए अपनी गलती का अहसास करने का अवसर मिल सके।

धर्मग्रंथ बड़ा है कि राष्ट्रग्रंथ ?

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तीन तलाक के बारे में हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने अभी जो शुरुआती विचार रखा है, उसी पर देश के विचारकों को खुली बहस चलाने की जरुरत है। अदालत ने कहा है कि वह सिर्फ तीन तलाक के मुद्दे पर विचार करेगी और यह देखेगी कि कुरान में उसका समर्थन है क्या? यदि कुरान तीन तलाक… Read more »

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार या अवहेलना न्यायालय की ??

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ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप पहली बार लगे हैं | इसके पहले भी कई जजों को स्टिंग ऑपरेशन में रंगे हाथों पकड़ा गया है | सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश तथा प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष रह चुके जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कई बार सार्वजनिक रूप से न्यायपालिका में हो रहे भ्रष्टाचार पर चिंता जताई है | कितनी ही बार पूर्व न्यायाधीशों ने कोर्ट में हो रहे भ्रष्टाचार पर चिंता व्यक्त की है | न्यायपालिका में चल रहे भ्रष्टाचार पर जस्टिस काटजू ने भी कहा था कि “मेरा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के ज्यादातर मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने से परहेज करते रहे हैं, शायद इसलिए कि इससे न्यायपालिका की बदनामी होगी |”

यह न्यायिक आपातकाल क्यों?

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पता नहीं, वह उनसे इतना डरा हुआ क्यों है? एक माह बाद वे सेवा-निवृत्त होने वाले थे। वे हो जाते। मामला खत्म होता लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आप को दलदल में फंसा लिया है। उसका यह आदेश तो बिल्कुल भी मानने लायक नहीं है कि अखबार और टीवी चैनल कर्णन का कोई भी बयान प्रकाशित न करें। कर्णन का न करें और उनका करें, यह क्या मजाक है? क्या यह न्यायिक आपात्काल नहीं है?

निर्भया को आखिर मिला इंसाफ

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स्त्री की इस परिपक्वता और न्यायपालिका के दायित्व निर्वहन के बाद अब समाज की जिम्मेबारी बनती है कि वह समाज में उस मानसिकता को बदलने का काम करे, जो बलात्कार जैसे अपराधों का कारण बनती है। क्योंकि केवल सजा के जरिएं इस दुष्प्रवृत्ति को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता है। समस्या के टिकाऊ हल के लिए उन पितृसत्तात्मक धारणाओं पर भी कुठाराघात करना होगा, जो स्त्री के साथ दुष्कृत्य करने की भावना को उत्तेजित करती हैं।