नया पिछड़ा आयोग गठन की तैयारी

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प्रमोद भार्गव केंद्रीय मंत्रीमंड़ल ने राष्ट्रीय पिछड़ वर्ग आयोग की जगह नया आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है। पिछडे़पन के आधार पर आरक्षण की बढ़ती मांग को देखते हुए यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अघ्यक्षता में संपन्न हुई कैबिनेट की बैठक में लिया गया। इसे संवैधानिक दर्जा भी दिया जाएगा। मौजूदा आयोग… Read more »

भाजपाः वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति का समय

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लंबे समय के बाद भाजपा में अपनी वैचारिक लाइन को लेकर गर्व का बोध दिख रहा है। असरे बाद वे भारतीय राजनीति के सेकुलर संक्रमण से मुक्त होकर अपनी वैचारिक भूमि पर गरिमा के साथ खड़े दिख रहे हैं। समझौतों और आत्मसमर्पण की मुद्राओं के बजाए उनमें अपनी वैचारिक भूमि के प्रति हीनताग्रंथि के भाव कम हुए हैं। अब वे अन्य दलों की नकल के बजाए एक वैचारिक लाइन लेते हुए दिख रहे हैं। दिखावटी सेकुलरिज्म के बजाए वास्तविक राष्ट्रीयता के उनमें दर्शन हो रहे हैं। मोदी जब एक सौ पचीस करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करते हैं तो बात अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक से ऊपर चली जाती है। यहां देश सम्मानित होता है, एक नई राजनीति का प्रारंभ दिखता है। एक भगवाधारी सन्यासी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है तो वह एक नया संदेश देता है। वह संदेश त्याग का है, परिवारवाद के विरोध का है, तुष्टिकरण के विरोध का है, सबको न्याय का है।

मैकाले-पद्धति को शीर्षासन कराता महर्षि अरविन्द का शिक्षा-दर्शन

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“ वास्तविक शिक्षण
का प्रथम सिद्धान्त है- ‘कुछ भी न पढ़ाना’ , अर्थात् शिक्षार्थी के
मस्तिष्क पर बाहर से कोई ज्ञान थोपा न जाये । शिक्षण प्रक्रिया द्वारा
शिक्षार्थी के मस्तिष्क की क्रिया को सिर्फ सही दिशा देते रहने से उसकी
मेधा-प्रतिभा ही नहीं, चेतना भी विकसित हो सकती है, जबकि बाहर से ज्ञान
की घुट्टी पिलाने पर उसका आत्मिक विकास बाधित हो जाता है ।”

दिलचस्प दिन

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साठ के दशक के मध्य में अमेरिका में युवा आन्दोलन की एक धारा के रुप में हिप्पी उपसंस्कृति का जन्म हुआ और दुनिया भर के अनेको देशों में फैल गया। हिप्पियों के फैशन और मूल्य-बोध ने संगीत, फिल्म, साहित्य और शिल्प पर गहरा असर डाला। इस हिप्पी संस्कृति के अनेको पहलुओं का दुनिया भर के देशों की आज की संस्कृति की मुख्य धारा में समावेश हो गया है। साठ के दशक में दुनिया के विभिन्न देशों में प्रतिवाद और प्रतिरोध के स्वर गूँजते रहे थे। अमेरिका, यूरोप और एशिया के विश्वविद्यालयों के कैम्पस में छात्र अशान्त और उत्तेजित रहा करते थे।

मोदी का पौधा रोपण है योगी

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नरेंद्र दामोदर दास मोदी ये नाम आज कौन नहीं जानता देश दुनिया सब हैरान हैं विपक्ष परेशान है ऐसे में यूपी में योगी की ताज पोशी कोई एक्सपेरिमेंट नहीं बल्कि एक सोचा समझा कदम जान पड़ता है या यूँ कहें की योगी मोदी का पौधा रोपण है तो भी शायद गलत नहीं होगा इस साहस… Read more »

पंजाब ने डुबो दी केजरीवाल की भविष्य की राजनीति

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डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री पंजाब में इस बार कैप्टन अमरेन्द्र सिंह की कांग्रेस ने अपना परचम फहरा जिया है । पंजाब विधान सभा की कुल सीटें ११७ हैं । ये ११७ सीटें पंजाब के तीन भौगोलिक खंडों में विभक्त हैं । मालवा क्षेत्र में सबसे ज्यादा ६९ सीटें आती हैं । उसके बाद दोआबा में… Read more »

जिन्ना हाउस ध्वस्त होना ही चाहिए, आखिर भारत के विभाजन की निशानी है 

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वैसे भी ऐतिहासिक इमारतें किसी भी समाज के लिए धरोहर मानी जाती हैं। लेकिन जिस जगह पर राष्ट्र के विभाजन की साझिश रची गई हो, उसे धरोहर तो किसी भी हाल में नहीं माना जा सकता। जिन्ना हाउस निश्चित रूप से भारत के दुखद विभाजन का प्रतीक है। दक्षिण मुंबई में सबसे महंगे इलाके मलबार हिल में भाऊसाहेब हीरे मार्ग पर स्थित जिन्ना हाउस सन 1936 में बनाया गया था। उस जमाने में इसके निर्माण पर कुल दो लाख रुपए की लागत आई थी।

योगी का पराक्रम और प्रताप

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उत्तर प्रदेश की जनता को पुन: एक बार बधाई, जिसने परिपक्व निर्णय लिया और सत्ता की चाबी सत्ता के दलालों (त्रिशंकु विधानसभा बनने पर जो लोग सत्ता में अपनी-अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अपना-अपना हिस्सा मांगते) के हाथों में न देकर सीधे एक ऐसे व्यक्ति के हाथों में सौंप दी-जिसके आने की आहट से ही गौमाता को राहत की सांस मिलनी आरंभ हो गयी। पराक्रम इसी का नाम होता है कि जिसके पुण्य कर्मों से निर्मित उसका पुण्यमयी प्रतापी आभामण्डल समाज के अतिवादी लोगों को कंपायमान कर दे और सज्जनों को चैन की सांस दिला दे।

केेजरीवाल जी! पहले दिल्ली संभालो

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करके केजरीवाल अपने आपको मोदी के समान स्तर का राजनेता बनाने का अतार्किक प्रयास कर रहे हैं। माना कि लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को बड़े से बड़ा पद लेने का संवैधानिक अधिकार है, परंतु इस अधिकार की अपनी सीमाएं हैं और उन सीमाओं की पवित्रता इसमें है कि आप जितने बड़े पद को लेना चाहते हैं उतने ही बड़े अनुपात में आपके साथ जनाधार होना चाहिए। यह जनाधार किसी भी राजनेता को तभी मिलता है जब लोग उसके कार्य को प्रशंसा देने लगते हैं। यदि केजरीवाल जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए दिल्ली के दिल को जीतने में असफल हो रहे हैं तो मानना पड़ेगा कि वह प्रधानमंत्री मोदी से बराबरी करके न केवल अपनी ऊर्जा को नष्ट कर रहे हैं, अपितु अपनी अपने आपको उपहास का पात्र भी बना रहे हैं।

बिहार से यूपी तक और मोदी से योगी तक

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एक लम्बे समय तक साम्प्रदायिक शब्द भारतीय राजनीत का प्यारा शब्द रहा है। समयानुसार यह शब्द अपने अर्थ तब्दील करता रहा, राजनीतिज्ञों की जुबानी। कभी अटल बिहारी बाजपेयी असाम्प्रदायिक थे और आडवाणी साम्प्रदायिक। समय बदला आडवाणी हो गये असाम्प्रदायिक और मोदी हो गये साम्प्रदायिक। आज के दौर में एक बार पुनः इस शब्द की व्याख्या हो रही है, व्यक्ति के सन्दर्भ में । कहा ये जा रहा है कि अब मोदी असाम्प्रदायिक है और आदित्यनाथ योगी साम्प्रदायिक। सुविधा की राजनीत इसे ही कहते है।