हिमाचल राजभवन में राष्ट्रनीति की गूंज

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राकेश कुमार आर्य    हिमाचल राजभवन में राष्ट्रनीति की गूंजहमारा मानना है कि भारत को ‘विश्वगुरू’ बनाने का हमारा संवैधानिक लक्ष्य तभी पूर्ण हो सकता है जबकि हमारे राजभवनों में तपे हुए संत प्रकृति के और दार्शनिक बुद्घि के राजनेता विराजमान होंगे। राजभवनों में यदि निकृष्ट चिंतन के लोगों को भेजा जाएगा तो… Read more »

प्रणव दा का अन्तिम सन्देश

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 राकेश कुमार आर्य प्रणव मुखर्जी अब भारत के पूर्व राष्ट्रपति हो गये हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि उनका व्यक्तित्व असाधारण है और उन्हें अपने जीवन में राष्ट्रपति के रूप में नहीं अपितु प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्र की सेवा करने का अवसर मिलना चाहिए था। परंतु कांग्रेस में जब तक एक ही परिवार… Read more »

लालू यादव बनाम चाणक्य

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वीरेन्द्र सिंह परिहार                         एक दिन यूं ही सुबह मार्निंग वाक में रामलाल जी मिल गये। मेरा उनसे बहस मुसाहबा चलता ही रहता है। मैनें कहा-सुना है, लालू यादव इन दिनों आचार्य चाणक्य के फैन हो गये हैं। रामलाल जी को बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होनें पूछा वह कैसे ? भला कहा लालू यादव और कहा… Read more »

चीन ने बनाया हिंदी को हथियार

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चीन हमें आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर ही मात देने की तैयारी नहीं कर रहा है बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी वह हमें पटकनी मारने पर उतारु है। उसने चीनी स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए अब हिंदी को अपना हथियार बना लिया है। इस समय चीन की 24 लाख जवानों की फौज में हजारों… Read more »

कोविन्द से जगी हैं  नयी उम्मीदें

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 ललित गर्ग देश के नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का शपथ ग्रहण के बाद पहला उद्बोधन नयी आशाओं एवं उम्मीदों को जगाता है। उन्होंने उचित ही इस ओर ध्यान खींचा कि हमारी विविधता ही हमें महान बनाती है। हम बहुत अलग हैं, फिर भी एकजुट हैं। संस्कृति, पंथ, जाति, वर्ग और भाषा की विविधता ही भारत… Read more »

रेलवे को संवेदनशील बनाना होगा

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-ः ललित गर्ग:- भारतीय जन-जीवन की आर्थिकी से लेकर सांस्कृतिक परिदृश्य तक भारतीय रेल एक सतत महत्वपूर्ण आधार और सशक्त माध्यम है, इसीलिए उसकी अव्यवस्था और बदहाली राष्ट्रीय चिंता का बड़ा कारण मानी जाती है। तरह-तरह की उपलब्धियों के बावजूद रेल यात्रियों को सफर में हर कदम पर कठिनाइयों से जूझना पड़ता है। लेकिन सबसे… Read more »

एक पहलवान और 25 मरीज

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गुजरात में शंकरसिंह वाघेला ने कांग्रेस छोड़ दी या कांग्रेस ने वाघेला को छोड़ दिया, उससे क्या फर्क पड़ने वाला है ? वाघेला यदि कांग्रेस में रह भी जाते तो क्या वे मुख्यमंत्री बन सकते थे? क्या चुनाव जीतकर वे सरकार बना सकते थे ? गुजरात में कांग्रेस की दाल पहले से पतली है। उसके… Read more »

ये देश को कहां ले जाना चाहते हैं !

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कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को यह भलीभांति समझ लेना चाहिए कि जिन मुद्दों के कारण कोई दल चुनाव में यदि अभूतपूर्व सफलता पाता है तो उन मुद्दों को स्वतः ही जनसामान्य के मुद्दों के रूप में मान्यता प्राप्त हो जाती हैं। ऐसे में किसी जाति या संप्रदाय विशेष के तुष्टिकरण के लिए या फिर… Read more »

कांग्रेसी सांसद : केवल आकाओं को सन्मति दे भगवान

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ललित गर्ग भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर शर्मसार हुआ, सांसदों के अमर्यादित व्यवहार ने  संसद की गरिमा को धुंधलाया है। कांग्रेस के छह सांसदों ने लोकसभा में जैसी अराजकता एवं अभद्रता का परिचय दिया और जिसके चलते उन्हें पांच दिनों के लिए निलंबित किया गया, यह भारतीय लोकतंत्र की एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। लोकसभा में… Read more »

रामनाथ कोविन्द: दसों दिशाएं कर रही हैं मंगलगान

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राकेश कुमार आर्य  श्री रामनाथ कोविन्द अब जबकि 66 प्रतिशत मत लेकर और अपनी प्रतिद्वंद्वी श्रीमती मीरा कुमार को परास्त कर भारत के राष्ट्रपति घोषित किये जा चुके हैं, तब उनके राष्ट्रपति बनने के अर्थ, संदर्भ और परिणामों पर विचार करना उचित होगा। श्री कोविन्द के राष्ट्रपति बनने का अर्थ है कि इस समय… Read more »