लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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-अरविंद जयतिलक-
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यह स्वागतयोग्य है कि देश की शीर्ष अदालत ने दिल्ली स्पेषल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट (डीएसपीइए) की धारा 6(ए) को असंवैधानिक करार दिया है, जिसके तहत अभी तक सीबीआइ को संयुक्त सचिव और उससे उपर के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए केंद्र सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने स्पष्ट कहा है कि भ्रष्ट सेवक भ्रष्ट हैं, चाहे वह वरिश्ठ हों या कनिश्ठ। किसी को भी भ्रष्टाचार करने की छूट नहीं दी जा सकती और न ही भ्रष्टाचार के सवाल पर बड़े एवं छोटे अधिकारियों में भेद किया जा सकता है। पीठ ने धारा 6ए को समानता के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए कहा है कि भ्रष्टाचार निवारण कानून-1988 के तहत अपराध की जांच में अधिकारियों का स्तरीकरण नहीं किया जा सकता। इस बात पर भी हैरानी जतायी है कि जब सीबीआइ को प्रारंभिक जांच ही नहीं करने दी जाएगी तो प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ेगी? अदालत ने सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया है कि धारा 6ए का उद्देश्य किसी भी भ्रष्ट नौकरशाह को संरक्षण देना नहीं, बल्कि नीति निर्धारण की प्रक्रिया में शामिल नौकरशाहों की जांच का सामना करने से पहले समुचित संरक्षण सुनिश्चित करना है। अब सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि क्या इस फैसले से सीबीआइ की ताकत बढ़ेगी? क्या वह पेशेवर तरीके से अपने काम को अंजाम देगी? क्या उस पर सरकार की मनमानी नहीं चलेगी? क्या वह विरोधियों को सीबीआइ का डर नहीं दिखाएगी? क्या भ्रष्टाचार में लिप्त उन उच्च अधिकारियों के मामलों की जांच में तेजी आएगी जो अभी तक धारा 6ए के प्रावधानों का खोल ओढ़ रखे हैं? अभी कुछ कहना मुश्किल है। इसलिए कि सीबीआइ की लगाम पूरी तरह केंद्र सरकार के हाथ से छूटी नहीं है। अभी भी ट्रांसफर और पोस्टिंग का अधिकार उसी के पास है। ऐसे में सीबीआइ सरकार के नजदीकी भ्रष्ट शीर्ष नौकरशाहों पर आसानी से हाथ डाल सकेगी इसमें संदेह है। बहरहाल इस फैसले से सीबीआइ को कुछ मजबूती जरुर मिलेगी। अब उसे बड़े अधिकारियों के खिलाफ जांच व पूछताछ करने के लिए किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं होगी और न ही मामले की छानबीन में देरी होगी। जानकारी लीक होने का भी खतरा नहीं होगा। यह तथ्य है कि देष में भ्रष्टाचारी नौकरशाहों की विशाल फौज है और उन्हें सत्ताधीशों का संरक्षण प्राप्त है। लिहाजा सीबीआइ उनके खिलाफ एक्शन नहीं ले पाती है। उदाहरण के तौर पर केरल कॉडर के आईएएस अधिकारी पीजे थॉमस जिनपर पामोलिन ऑयल घोटाले का संगीन आरोप था, के बावजूद भी सरकार उन पर मेहरबान रही और उन्हें केंद्रीय सतर्कता आयुक्त नियुक्त की। यह अलग बात है कि न्यायालय की लताड़ खाने के बाद उसे पीजे थॉमस को पद से हटाना पड़ा और खुद प्रधानमंत्री को देश से माफी मांगनी पड़ी। कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले में लिप्त शीर्ष नौकरशाहों पर भी कानून का चाबुक नहीं चल पाया। दरअसल सत्ताधारी उन्हें बचाने में लगे हैं। जबकि शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट से जाहिर हो चुका है कि आधारभूत ढांचे से जुड़े प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन में नौकरशाहों ने जमकर लूटपाट मचायी है। एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ रुपए के टू-जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री ए. राजा के अलावा कई शीर्ष नौकरशाहों की संलिप्तता पायी गयी। पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा और ए. राजा के निजी सचिव आरके चंदोलिया की कारस्तानी उजागर हो चुकी है। ए राजा के साथ उन्हें भी तिहाड़ जेल की षोभा बनना पड़ा। लेकिन कहना मुश्किल है कि इन सभी मामलों में दुध का दुध और पानी का पानी होगा। सच्चाई तो यह है कि सीबीआइ खुद स्वतंत्र होना नहीं चाहती और इसके लिए अदालत कई बार उसकी कान उमेंठ चुका है। अभी कुछ माह पहले ही कोयला घोटाले की जांच में सरकार के हस्तक्षेप पर सख्त नाराजगी जताते हुए शीर्ष अदालत ने सीबीआइ को पिंजरे में बंद ऐसा तोता कहा जो अपने मालिक की भाषा बोलता है।

अगर चारा घोटाले मामले को छोड़ दें तो शायद ही किसी मामले को सीबीआइ अंजाम तक पहुंचायी हो। उसकी तत्परता उन्हीं मामलों में देखने को मिलती है जिसमें केंद्र सरकार को राजनीतिक लाभ होता है। बाकी सभी मामलों में उसका रवैया अचंभित करने वाला होता है। हवाला कांड मामले में केंद्र सरकार ने अपने राजनीतिक विरोधियों को फंसाने के लिए किस तरह सीबीआइ का सहारा ली, यह किसी से छिपा नहीं है। केंद्र सरकार के इशारे पर ही सीबीआइ ने नामचीन राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ मनगढ़ंत सबूत जुटाए और उन्हें परेषान किया। यह अलग बात है कि उसके सबूत अदालत में टिक नहीं पाए। सीबीआइ अपनी कार्यप्रणाली से कई बार साबित कर चुकी है कि वह एक निरपेक्ष जांच एजेंसी नहीं, बल्कि सरकार के इशारे पर काम करने वाली मशीनरी है।

देश का सर्वाधिक चर्चित बोफोर्स दलाली कांड जिसकी वजह से राजीव गांधी की सरकार चली गयी उस मामले की जांच को सीबीआइ ने क्लोजर रिपोर्ट लगाकर दफन कर दिया। जबकि आयकर न्यायाधिकरण ने अपने आदेश में साफ कहा कि होवित्जर तोप सौद में दिवंगत विन चड्ढा और इतालवी व्यापारी ओतावियों क्वात्रोच्चि को 41 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गयी। नरसिंहा राव की सरकार बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों की खरीद-फरोख्त के मामले में आज तक एक भी आरोपी के खिलाफ सीबीआइ ने चार्जशीट दाखिल नहीं की। विधायक खरीदकांड में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर सीबीआइ की कृपादृष्टि बनी हुई है। गौर करें तो इन घपले-घोटाले और साजिशों में सिर्फ राजनेता ही नहीं नौकरशाह भी शामिल रहे हैं। लेकिन धारा 6ए की वजह से सीबीआइ उन पर हाथ डालने में विफल रही। शीर्ष अदालत द्वारा इस प्रावधान को खत्म किए जाने के बाद देखना दिलचस्प होगा कि सीबीआइ ऐसे भ्रष्ट नौकरशाहों को धर दबोचने में कितना कामयाब होती है जो सत्ता के संरक्षण में महफूज हैं।

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