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छगन भुजबल

छगन भुजबल

हमारे देश में सब्जी बेचने वालों ने जो मुकाम हासिल किया है वह शायद ही किसी और पेशे वाले हासिल कर पाने में कामयाब हुए होंगे। सबसे पहले संजय गांधी उत्तरप्रदेश से आसकरण संखवार को लोकसभा का टिकट देकर उन्हें जितवा कर लाए थे। वे सदन में छाए रहते थे। सदन के बाहर भी ऐसी आवाजें लगाते कि लोग उनकी ओर आकर्षित होकर खींचे चले आते थे। फिर कुछ साल पहले पूर्वी उत्तरप्रदेश से मुंबई गए कृपाशंकर सिंह का मामला प्रकाश में आया। वे भी वहां जाकर ‘कांदा बटाटा’ (आलू-प्याज) बेचते थे। हालांकि इसके साथ ही उन्होंने भैंस दुहना भी शुरु किया जिससे आगे चल कर उन्हें राजनीति में दुहाई करने की कला में महारत हासिल हुई। वे मुंबई में ऐसे छा गए कि वहां गृह मंत्री बनाए गए और मुंबई प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने।

उनके बाद अब छगन भुजगल का मामला सबके सामने है। वे भी बचपन में सब्जी बेचा करते थे और बेचने की कला में इतने पारंगत हो गए कि अरबों रुपए की सरकारी जमीन ‘चुकौता’ सब्जी के भाव बिल्डरों को बेच डाली। अब जांच एंजेसियां उनके पीछे पड़ गई है और वे गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

छगन चंद्रकांत भुजबल का संघर्ष और उपलब्धि देखकर मुंबई के किसी भी फिल्म निर्माता को एक अच्छी कहानी मिल सकती है। वे एक गरीब परिवार में पैदा हुए थे। बचपन में उन्हें टीबी हो गई। उनकी मां-बाप दवा का खर्च उठा पाने के काबिल नहीं थे इसलिए उन्हें उनके नाना के पास मुंबई भेज दिया गया जो कि बायकुला में सब्जी बेचते थे। वहां उनका सरकारी अस्पताल में इलाज होने लगा। तब डाक्टर को इकन्नी (एक आना) फीस देनी पड़ती थी और वह 15 दिन की दवा लिखता था। यह फीस शारीरिक जांच की होती थी।

एक बार जब उन्हें दिखाने की तारीख आयी तो उनके घर में एक आना भी नहीं था। उनकी मौसी ने यह राशि उधार मांगी पर नहीं मिली। उल्टे उनकी पड़ोसन ने फटकारते हुए कहा कि क्या पैसे पेड़ पर उगते हैं जो तुम मांगने चली आयी। यह सारी घटना उस बच्चे के सामने घटी जिसका उसके दिल और दिमाग पर जबरदस्त असर हुआ और उसने तभी ठान लिया कि जिंदगी में पैसे का कितना महत्व होता है। हो सकता है कि उसने तभी यह कसम खा ली होगी कि जिस घर में इकन्नी भी नहीं है, उसे एक दिन में सोने की गिन्नियों से भर दूंगा।

उसने बहुत संघर्ष देखा। तब घरों में खाना बनाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था। जिसे खरीद पाना उसके ननिहाल के बस में नहीं था। इसलिए वह बोरा लेकर पास की लकड़ी काटने वाली मिल में जाता। वहां मुफ्त में मिलने वाला बुरादा बोरों में भरता और उसे कूड़ा ले जाने वाली लोहे की गाड़ी में रखकर घर लाता। एक बार कूड़े की गाड़ी का पहिया उसके अंगूठे से गुजर गया। उसका नाखुन उखड़ गया जो फिर कभी ठीक नहीं हुआ। उस पीड़ा और उखड़े हुए नाखून ने उसे पैसा कमाने की प्रेरणा देना जारी रखा। छगन भुगजबल काफी तेज तर्रार थे। वे माली जाति से हैं जो कि ओबीसी में आती है। पहले वे शिवसेना के साथ जुड़े। अपनी बोलने की कला और व्यवहार के कारण बाला साहब ठाकरे के नजदीक पहुंचे। उन्हें देश के सबसे बड़े शहर मुंबई का दो बार मेयर बनने का गौरव हासिल हुआ। जब इस शहर का नाम बांबे से मुंबई किया गया तो वे ही मेयर थे। उनकी इसमें अहम भूमिका रही और उन्होंने ही गेटवे आफ इंडिया पर मुंबई नाम का फलक लगवाया। वे मुंबई व महाराष्ट्र की राजनीति पर छाने लगे। जब 1990 में विधायक बने तो उन्हें पूरा विश्वास था कि शिवसेना प्रमुख बाला साहब उन्हें विपक्ष का नेता बना देंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। तब उन्हें अहसास हुआ कि इसकी वजह उनका माली जाति से होना था।

इसलिए मौका मिलते ही वे शरद पवार के निमंत्रण पर कांग्रेस में चले गए। वहां वे सोनिया गांधी के काफी करीब हो गए। शरद पवार को भी महाराष्ट्र में एक ओबीसी चेहरा चाहिए था। जब 1999 में शरद पवार कांग्रेस से अलग हुए और उन्होंने छगन भुजबल से साथ आने को कहा तो वे भूमिगत हो गए। कुछ दिन तक सोचते रहे कि उनका साथ जाना ठीक रहेगा या नहीं। अंततः उन्हें लगा कि कांग्रेस में पहले से ही उनके दुश्मनों की संख्या काफी ज्यादा है तो वे राकांपा में चले गए। उन्हें पार्टी व महाराष्ट्र का अध्यक्ष बनाया गया।

जब राकांपा और कांग्रेस की राज्य में सरकार बनी तो शरद पवार ने उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाने के साथ-साथ गृह मंत्रालय भी दिलवाया। धीरे-धीरे शरद पवार को लगने लगा कि छगन भुजबल कुछ ज्यादा ही ताकतवर होते जा रहे हैं। इस बीच नकली डाक टिकट छापने वाला तेलगी कांड हो गया जिसमें छगन का भी नाम आया। यह एक बढ़िया मौका था। उनसे गृह मंत्रालय लेकर उन्हें पीडब्ल्यूडी मंत्रालय सौंप दिया गया जो कि सबसे ज्यादा कमाई वाला मंत्रालय माना जाता है। जब 2014 के लोकसभा चुनाव में शरद पवार को लड़ने के उम्मीदवार नहीं मिल रहे थे तो उन्होंने पार्टी की बैठक में राज्य सरकार के मंत्रियों से चुनाव लड़ने को कहा जिसका सबने मजाक उड़ाया सिर्फ छगन भुजबल ने हामी भरी। वे नासिक से चुनाव लड़े व हार गए।

जब छगन भुजबल सत्ता में थे तभी उन पर व उनके बेटे पंकज व भतीजे समीर भुजबल पर ठेकेदारों के जरिए पैसे कमाने के आरोप लगने लगे थे। कुछ साल पहले ही राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक बोर्ड से लेकर प्रवर्तन निदेशालय तक से शिकायतें की जा चुकी थी। इनमें दिल्ली स्थित महाराष्ट्र सदन के निर्माण, मुंबई में कलीना यूनीवर्सटी की लाइब्रेरी व आरटीओ आफिस के निर्माण के ठेके दिए जाने में घपले करने के आरोप शामिल है। उन्होंने एक नई तरकीब अपनायी।
ठेकेदारों ने मुफ्त में महाराष्ट्र सदन कलीना लाइब्रेरी व आरटीओ दफ्तर तैयार करे। बदले में उन्हें मुंबई की जमीन पर फ्लैट बनाकर बेचने की छूट दे दी गई। आरोप है कि 150 करोड़ रुपए के निर्माण के बदले ठेकेदारों को 1500 करोड़ की जमीन दी गई। उनके बेटे और भतीजे की भवन निर्माता कंपनी पर लोगों से 44 करोड़ रुपए वसूलने के बाद भी फ्लेट न बनाने का आरोप है। पहले भतीजा समीर पकड़ा गया था और और अब प्रवर्तन निदेशालय ने समीर भुजबल को गिरफ्तार कर लिया है। उन पर सरकार को 900 करोड़ रुपए का चूना लगाने का आरोप है जबकि उनकी 26 संपत्तियों की कीमत 280 करोड़ रुपए बतायी जा रही है। इनमें फ्लेट, बंगले, फार्म हाउस से लेकर दुकानें तक शामिल हैं।

इंडिया बुल्स ने उनके एजनीओ को ढाई करोड़ का दान दिया व कलकत्ता की कुछ कंपनी ने उनके बेटे व भतीजे की लिफाफा कंपनियों के 100 रुपए के शेयरों को 15000 रुपए में खरीदा। उनकी कुल संपत्ति 2500 करोड़ की बतायी जाती है। उनके खिलाफ मनी लांडरिंग का मामला भी दर्ज हुआ हैं। उन्हें दुख इस बात का है कि जिस तरह राकांपा व शरद पवार को उनके बचाव में उतरना चाहिए था वे नहीं उतरे। पार्टी व नेता घड़ियाली आंसू बहाते रहे। जिस व्यक्ति ने बाला साहब ठाकरे को गृहमंत्री रहते हुए सामना में छपे एक लेख के जरिए घृणा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार करवाया हो, जब उसकी गिरफ्तारी का मौका आया तो वहां कोई इसके विरोध में नारे लगाने के लिए भी मौजूद नहीं था। शिवसेना छोड़ने के बाद शिवसैनिक उनसे बहुत नाराज थे व उन्हें अपना निशाना बनाने के मौके ढूंढते रहते थे। तब वे अपनी पत्नी को यह कहकर घर से निकलते थे कि किसी भी दिन घर पर दस्तक देकर कोई यह खबर दे सकता है कि मैं नहीं रहा। मगर इस बार तो प्रवर्तन निदेशालय ने दस्तक दे डाली।

विवेक सक्सेना

Naya India

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