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भुवन शर्मा

लीबिया के तानाशाह मुअम्मर मुहम्मद अबू मिनयार अल – गद्दाफी की हत्या ने ये साबित कर दिया है कि किसी भी देश के लोगों पर लंबे अर्से से चली आ रही तानाशाही का अंत हमेशा बुरा होता है। लाख कोशिशों के बाद भी गद्दाफी अपने आप को विरोधियों से बचा नहीं सका और आखिरकार लोगों पर किए अत्याचार और शोषण का फल उसे अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। किसने सोचा था कि ट्यूनीशिया के एक छोटे से शहर में तानाशाह के खिलाफ लगी एक चिंगारी आग का इतना भीषण रूप ले लेगी जिससे समूचे अरब देशों में तानाशाह के खिलाफ लोगों में विद्रोह का गुबार पैदा होगा जो ट्यूनिशिया में बेन अली, मिश्र में हुस्नी मुबारक, और फिर लीबिया में गद्दाफी जैसे बड़े तानाशाहियों को तबाह कर देगा लेकिन चिंता की बात है कि लीबिया में तबाही के बाद का परिणाम क्या होगा..इसके लिए हमें ट्यूनिशिया में आंदोलन की रूपरेखा और तनाशाही के अंत के पश्चात वहाँ कि राजनीतिक और सामाजिक हालात को समझना होगा.१९५६ तक फ्रांस का उपनिवेश रहे ट्यूनीशिया में १९८७ से ज़ाइन अल अबीदीन बेन अली का शासन चला आ रहा था, जिसमें सत्ता के बेजा इस्तेमाल से संपूर्ण विपक्ष ही खतम कर दिया गया था | अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुचल दी गई थी और बेरोज़गारी अपने चरम पर थी | २०१० के अन्त में शुरू हुए जनाआंदोलन और कुछ शहादतों से उत्पन्न स्थिति के कारण बेन अली को सत्ता छोडकर भागना पडा | लेकिन तानाशाह खत्म होने के बाद भी एक और बड़ी समस्या अभी भी मुहँ बाएं खड़ी है वो है एक संगठनात्मक और लोकतांत्रिक देश के नवनिर्माण की जिसमें देश के विकास में सभी लोगों की भीगीदारी हो और उस विकास का लाभ सभी लोगों तक समूचित रूप से पहुँचे लेकिन इस बात के संकेत अभी तक किसी भी रूप में नहीं मिले हैं…हालाँकि अभी कुछ समय बाद होने वाले चुनाव के बाद ही सारी तस्वीर साफ हो पाएगी लेकिन एक ऐसे देश में जहाँ का कोई लोकतांत्रिक इतिहास नहीं है जहाँ कभी इस तरह का कोई आयोजन नहीं किया गया वहाँ लोगों के बीच जागरूकता उत्पन्न कर उन्हें वोटिंग बूथ तक लाना वहाँ के अंतरिम प्रधानमंत्री के लिए एक बड़ी चुनौती है…, ठीक यही स्थीति अब लीबिया में बनी हुई है.. लेकिन यहाँ हालात थोड़े से अलग हैं..गद्दाफी के खिलाफ छिड़े आन्दोलन में विभिन्न गुटों की मौजूदगी जिसमें इस्लामिक कट्टरपंथी मुस्लिम ब्रदरहुड , पश्चिमी उदारवादी और तीसरा खेमा ऐसा भी है जो गद्दाफी के तानाशाह का समर्थक है..लेकिन इसकी संख्या अपेक्षाकृत कम है…परंतु चिंता की बात है कि यहाँ मौजूद कट्टरपंथियों की तादाद बहुत अधिक है.. जिसने कि शुरूआत से ही इसे हाईजैक किया हुआ है..और यह खेमा शरियत कानून लाने के पक्ष में है..अब जहाँ समूचे आन्दोलन में इस तरह के लोगों का वर्चस्व हो वहाँ पर उस देश के भविष्य के हालातों का पूर्वानुमान आसानी से लगाया जा सकता है….यह कुछ-कुछ पाकिस्तान के हालात जैसें ही है जहाँ आतंकवाद के नाम पर अमरीका की सहायता से वहाँ मौजूद कट्टरपंथी आतंकवाद का पालन-पोषण करते रहे जिसका परिणाम अमरीका में 9/11 और भारत में 26/11 जैसे दो सबसे बड़े आतंकी हमले हैं…ठीक यही हालात लीबिया में भी दिखाई दे रहे हैं जहाँ अमरीका की नाटो सेना की मदद से कट्टरपंथियों द्बारा गद्दाफी को मार गिराया गया.. इसमें कोई दो राय नही कि तेल संसाधनों में धनी देश को आजाद कराने में अमरीकी हस्तेक्षेप की मंशा क्या रही है..लेकिन इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि यहाँ भी अमरीकी मदद निकट भविष्य में लीबिया में भी आतंकवादियों के लिए जमीन तैयार न करे….!!!

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1 Comment on "आज़ाद होते अरब मुल्कों की चुनौतियाँ"

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एल. आर गान्धी
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किसी भी मुस्लिम बहुल देश में लोक तंत्र या धरम निरपेक्ष राज्य की कल्पना ही मात्र दिवा स्वपन है…. इस्लाम में लोकतंत्र की कोई सम्भावना नहीं ..सिर्फ और सिर्फ शरिया- तंत्र ही लागु होता है…उतिष्ठ- कौन्तेय

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