लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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अखिलेश कैबिनेट में फेरबदल
बदलाव हुआ,क्यों हुआ,नहीं बतायेंगे

संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मंत्रिमंडल में बदलाव करके जाते हुए 2015 में एक नया रंग भर दिया।उन्होंने इस बात की जरा भी परवाह नहीं की कि सियासत और सत्ता के रंग ‘निराले’ होते हैं।यहां कुछ करो तो हलचल और न करों तो परेशानी। सोचो कुछ,होता कुछ और है।चुप रहों तो मुश्किल और मुंह खोलो तो आफत।कहो कुछ,मतलब उसका कुछ और निकाला जाता है।इमेज बनाने के चक्कर में डैमेज होती चली जाती है।गैरों से क्या गिला, यहां अपने भी जख्म देने में पीछे नहीं रहते हैं।मौकापरस्ती तो सियासत की रग-रग में बसी है।इस बात को देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बेहतर कौन समझ सकता है।जब से अखिलेश ने सत्ता संभाली है,वह ऐसी तमाम बातों के भुक्तभोगी है।वह जब सबको साथ लेकर चलते हैं तो कहा जाता है कि ‘चाचाओं’ के आगे उनकी(अखिलेश) चलती ही नहीं है।सपा सुप्रीमों, पिता मुलायम उन्हें नसीहत देते हैं तो विरोधियों को यह समझने में देर नहीं लगती है कि पर्दे के पीछे से मुलायम सत्ता की बागडोर संभाले हुए हैं। सरकार को घेरने के लिये विरोधियों के पास अपने-अपने तर्क हैं,जिनको काटना मुश्किल है।ताज्जुब है,अखिलेश मंत्रिमंडल में बदलाव हुआ,क्यों हुआ,यह बताने को कोई तैयार ही नहीं है।मीडिया से लेकर राजनैतिक पंडित तक हवा में तीर चला रहे हैं।आखिर उन्हें भी तो अपनी ‘दुकान’ चलानी है।
सबसे बड़ा सवाल तो सीएम अखिलेश पर ही उठाया जा रहा है जिनके पास गृह विभाग भी है और कानून व्यवस्था का मसला गृह विभाग से ही जुड़ा हुआ है।प्रदेश की जनता सपा राज में सबसे अधिक त्रस्त प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था से ही रहती है।सबसे पहले तो अखिलेश को अपने आप आईना देखना चाहिए था।ऐसे लोगों की भी लम्बी-चैड़ी लिस्ट है जिनका मानना है कि सीएम अखिलेश ने अपने मंत्रिमंडल के आठ मंत्रियों की बर्खास्तगी के खेल में कुछ अच्छों को बुरा और कुछ बुरो को अच्छा साबित कर दिया।वर्ना प्रजापति जैसे विवादित मंत्री नही बचते और चेयरमैन तोताराम के बोगस वोटिंग कराने वाले वीडियों के वायरल होने के शक मे आलोक शाक्य को अपनी कुर्सी नहीं गंवाना पड़ती।कोई कहता है कि अखिलेश सरकार 2017 के लिये मेकओवर कर रही है।किसी को लगता है कि अब ऐसे कदम उठाने से सपा को कोई फायदा होने वाला नहीं हैं।उसकी स्थिति ‘एक तरफ कुआ और दूसरी तरफ खाई, निगलों तो अंधा,उगलो तो कोढ़ी जैसी है।इस सबसे इत्तर चर्चा इस बात की भी चल रही है कि आखिर ऐसे कौन से कारण थे जो इन मंत्रियों से इस्तीफा मांगने की बजाये उन्हें बर्खास्त करना जरूरी हो गया।आठ मंत्रियों की बर्खास्तगी की नौबत आ गई लेकिन सरकार ने यह बताना जरूरी नहीं समझा कि इनको क्यो बर्खास्त किया गया।आखिर मतदाताओं को इस बात का अधिकार मिलना ही चाहिए कि उसे यह पता चले कि उसके द्वारा चुने गये नुमांइदे ने ऐसे क्या किया जो उसे बर्खास्त करने की नौबत आ गई।सवाल कई हैं,लेकिन राजनीति की दुनिया में जबाव देने की परम्परा ही नहीं रही है।कभी जबाव दिया भी जाता है तो उसे पूरी तरह से राजनीति की चासनी में लपेट दिया जाता है।कमोवेश यह स्थिति सत्तारूढ़ होने वाले तमाम दलों में देखी जाती रही है।
बात अखिलेश मंत्रिमंडल के फेरबदल की कि जाये तो इस बदलाव से सपा के चाल-चरित्र और चेहरे में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं आने वाला है।अब इतना समय नहीं बचा है कि जो बदलाव करीब पौने चार वर्षो में नहीं हो पाया वह बाकी बचे सवा साल में इस बदलाव से हो जायेंगा,जो नये मंत्री बनेंगे उनके पास काम करने का तो मौका बहुत कम रहेगा,लेकिन इस बदलाव के सहारे सपा जातीय गणित जरूर मजबूत करना चाहेगी।वहीं भाजपा इस बात से खुश है कि समाजवादी पार्टी नेतृत्व ही 2017 के विधान सभा चुनाव के लिये उसके पक्ष में माहौल बना रही है।अखिलेश ने अपने कुछ मंत्रियों को सिर्फ इसी लिये मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिखाया है क्योंकि यह मंत्री भाजपा नेताओं से करीबी बना रहे थे और चुनाव आते-आते यह सपा से नाता तोakhileshड़कर भाजपा का दामन थाम सकते थे।ऐसे में यह चर्चा उठना लाजिमी है कि क्या अखिलेश के कद्दावर नेताओं और मंत्रियों को भी इस बात का भरोसा नहीं है कि 2017 में प्रदेश में समाजवादी पार्टी की वापसी होगी।

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