लेखक परिचय

जावेद अनीस

जावेद अनीस

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े पत्रकार है ।

Posted On by &filed under विधि-कानून, विविधा.


जावेद अनीस

दिसम्बर 2012 में दिल्ली में एक चलती बस में हुई बर्बर घटना में एक नाबालिग के शामिल होने के बाद से किशोर न्याय अधनियम में बदलाव को लेकर पूरे देश में एक बहस की शुरुआत हुई ,कानून के हिसाब से दोषी किशोर का ट्रायल जुवेनाइल कोर्ट में हुआ था, जहाँ हत्या और रेप के जुर्म में उसे तीन साल के लिए सुधार गृह भेज दिया गया था जो कि भारत के किशोर न्याय अधिनियम के हिसाब से अधिकतम मुद्दत है। 20 दिसंबर 2015 को यह समय सीमा पूरा होने से पहले एक बार फिर जुवेनाइल जस्टिस बिल में बदलाव की मांग ने एकबार फिर जोर पकड़ लिया, आरोपी के रिहाई को लेकर भी असमंजस्य की स्थिति बन गयी थी और मीडिया, राजनेताओं, महिला संगठनों और समाज के एक बड़े हिस्से द्वारा इसका  विरोध किया जाने लगा. उसके रिहाई पर रोक के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में अपील भी दायर की गयी. जिस पर अदालतों ने कानून का हवाला देते हुए रिहाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. इसके बाद दोषी किशोर के रिहाई का रास्ता साफ़ हो गया. इसके साथ ही मीडिया और तथाकथित जनाक्रोश के दबाव की वजह से जुवैनाइल जस्टिस संशोधित बिल भी राज्यसभा में पारित हो गया है. लोकसभा में यह विधेयक मई 2015 में ही पास हो चुका है, राज्यसभा में लगभग सभी दलों ने इस बिल का समर्थन किया. सिर्फ सीपीआई (एम) ने इसके विरोध में वोटिंग से वॉक आउट किया. इस विधेयक में प्रमुख रूप से जघन्य अपराधों में लिप्त 16 से 18 आयुवर्ग के किशोरों वयस्कों की तरह ही  सजा दिये जाने  प्रावधान किया गया  है.

juvenile justiceइस संसोधन को लेकर समाज के एक हिस्से, बाल अधिकार कार्यकर्ताओं और सुधारवादियों की आपत्तियां भी रही हैं । उनका कहना था कि कानून का आधार “विधि विवादित बच्चों” का सुधार और पुनर्वास ही बना रहना चाहिए ना कि उनसे प्रतिशोध लेना’. जस्टिस जे.एस. वर्मा कमेटी भी किशोर अपराध के मामलों में आयु-सीमा घटाने के पक्ष में नहीं थी । इसको लेकर दिवंगत जस्टिस वर्मा ने कहा था कि “हमारे सामाजिक ढांचे की वजह से इसका सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता”।  इस बिल का परीक्षण करने वाली मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संसदीय स्थाई समिति ने भी 16 से 18 साल के बीच के नाबालिगों से वयस्क किशोरों के तौर पर पेश आने के सरकार के प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इससे कानून के साथ संघर्ष की स्थिति पैदा होगी, समिति ने सरकार से 16 साल से अधिक उम्र के बच्चों के लिए अलग बर्ताव करने के प्रस्ताव की समीक्षा करने को कहा था और यह माना था कि 18 साल से कम उम्र के सभी नाबालिगों को सिर्फ बच्चे के तौर पर देखा जाना चाहिए।

 

नाबालिग होने के कारण कम सजा पाया यह किशोर आज शायद भारत में सब से ज्यादा नफरत किया जाने वाल व्यक्ति बन चुका है. मीडिया,नेताओं और समाज के एक बड़े हिस्से द्वारा उसकी रिहाई को इतिहास का काला दिन और सड़कों पर आतंक लौटने के रूप में व्याखित किया गया. जैसा की हमारी मीडिया ज्यादातर मामलों में करती है, उसने इस मामले को भी शुरू से ही सनसनीखेज तरीके से पेश किया, पहले कुछ अपुष्ट ख़बरों के हवाले से यह बताया गया था कि इस दर्दनाक काण्ड में किशोर ही सबसे बर्बर था, हालाकि इस केस की जांच कर रही टीम ने इसे गलत बताया. इसके बाद यह मांग उठी कि इस किशोर के साथ बड़ों जैसा सलूक हो. कई लोग तो यह तक कहने लगे कि उसे सावर्जनिक रूप से फांसी लगा देनी चाहिए या भीड़ के हवाले कर देना चाहिए जिससे इन्साफ किया जा सके. सोशल मीडिया पर तो  इस पूरे मामले को अलग ही रंग देने की कोशिश की गयी,जिसमें आउटलुक में प्रकाशित अलक़ायदा से जु़ड़े एक आतंकी की तस्वीर को निर्भया मामले में दोषी किशोर के रूप में पेश करते हुए उसका नाम अफ़रोज़ बताया गया, अव्वल तो किसी विधि-विवादित नाबालिग का पहचान इस तरह से सामने लाना ही कानूनन गलत है, यहाँ तो उसको मजहब का भी खुलासा किया जा रहा है ,कुल मिलकर इस कवायद की मंशा किसी एक व्यक्ति गुनाह के बहाने पूरी क़ौम को कठघरे में खड़ा करने की रही है । फिर जिस तरह से निर्भया की मां को आगे रख कर उन्मादी अभियान चलाया गया उसके पीछे  पीछे कौन लोग थे और उनका क्या स्वार्थ था ? जैसे जैसे निर्भय काण्ड में शामिल इस किशोर के रिहाई के दिन पास आ रहे थे, मीडिया द्वारा एक बार फिर अप्रमाणित श्रोतों के माध्यम से इस तरह की खबरें दी जाने लगीं की कि ‘आईबी के एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दोषी किशोर सुधार गृह में दिल्ली विस्फोट मामले में गिरफ्तार किए गए एक अन्य जुवेनाइल के साथ रहकर कट्टरपंथी हो गया है’, अगर इस खबर को सही भी मान लिया जाये तो सबसे पहले सवाल यह उठता है कि सुधार गृह में रहने वाला किशोर सुधरने के बजाये और बिगड़ कैसे  गया? यह किसकी विफलता है? इसकी जिमेदारी कौन लेगा? इतने बहुचर्चित मामले के जुवेनाइल कट्टरपंथी बन सकता है तो अन्य जुवेनाइल दोषियों की हालत क्या होगी? और फिर कानून बदल कर उस जैसे किशोरों को बड़ों के साथ जेल में रखा जाएगा तो वे क्या बन कर निकलेंगें ? इस तरह से तो हम हर साल हजारों के संख्या में किशोरों को कट्टर अपराधी बनाने के लिए जेल भेज रहें होंगें.

 

हमारे देश में किशोर अपराध के पुनर्वास में जबरदस्त खामियां है, इस केस ने हमें मौका दिया था कि इन खामियों को बाहर लाकर उन्हें दूर करते लेकिन निर्भया कांड के बाद बने जनमत द्वारा कानून में ही बदलाव को लेकर मांग की जाने लगी, बदलाव के पक्ष में कई तर्क दिए गये, जैसे आजकल बच्चे बहुत जल्दी बड़े हो रहे हैं, बलात्कार व हत्या जैसे गंभीर मामलों में किशोर होने की दलील देकर “अपराधी” आसानी से बच निकलते हैं और पेशेवर अपराधी किशोरों का इस्तेमाल जघन्य अपराधों के लिए करते हैं, उन्हें धन का प्रलोभन देकर बताया जाता है कि उन्हें काफी सजा कम होगी और जेल में भी नहीं रखा जाएगा आदि, इन्ही तर्कों के आधार पर यह मांग जोरदार ढंग से रखी गयी कि किशोर अपराधियों का वर्गीकरण किया जाए, किशोर की परिभाषा में उम्र को 16 वर्ष तक किया जाए ताकि नृशंस अपराधियों को फांसी जैसी सख्त सजा मिल सके। शायद इसी जनमत और राजनीतिक नफे – नुक्सान को देखते हुए राज्यसभा ने भी  किशोर न्याय (संशोधन) विधेयक पारित कर दिया गया इस विधेयक में जघन्य अपराध करने वाले 16-18 आयुवर्ग के किशोरों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाए जाने के प्रावधान किये गये हैं. जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को को यह तय करने की जिम्मेदारी दी गयी है कि किसी बच्चे पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाना चाहिए या नहीं. लेकिन किशोर न्याय व्यवस्था का किर्यान्वयन ही तो हमारी सबसे बड़ी समस्या है , बाल सुरक्षा के लिए काम करने वाली संस्था “आंगन” के एक रिपोर्ट किशोरे न्याय व्यवस्था  की कार्यशाली और संवेदनहीनता को रेखांकित करती है जिसमें एक तिहाई  बच्चों ने बताया कि पेशी के दौरान बोर्ड उनसे कोई सवाल नहीं पुछा और ना ही उनका पक्ष जानने का प्रयास किया। कई बच्चे का कहना था कि   पूरे पेशी के दौरान बोर्ड के सदस्यों ने  हम पर एक नजर डालने की भी जहमत भी नहीं की । एक संभावना कानून के  दुरूपयोग की भी है ,आंकड़े बताते हैं कि 80 % “विधि विवादित बच्चे” ऐसे गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हैं जिनके परिवारों की वार्षिक आय 50 हजार रुपये के आस-पास होती हैं। हमारे पुलिस की जो ट्रैक- रिकॉर्ड और कार्यशैली है उससे इस बात की पूरी संभावना है कि इस बदलाव के बाद इन गरीब परिवारों के बच्चे पुलिस व्यवस्था का सॉफ्ट टारगेट हो सकते हैं और इन पर  गलत व झूठे केस थोपे जा सकते हैं। ऐसे होने पर गरीब परिवार इस स्थिति में नहीं होंगें की वे इसका प्रतिरोध कर सकें ।

 

सुधार पर आधारित एक किशोर न्याय व्यवस्था तक पहुँचने में हमें लम्बा वक्त लगा था . 1989 में बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र का दूसरा अधिवेशन हुआ जिसमें लड़का-लड़की दोनों को 18 वर्ष में किशोर माना गया. भारत सरकार ने 1992 में इसे स्वीकार किया और सन् 2000 में 1986 के अधिनियम की जगह एक नया किशोर न्याय कानून बनाया गया. 2006 में इसमें संशोधन किया गया .यह सही है कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत बच्चों की उम्र 18 साल करने के अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं. इसके दुरुपयोग से भी इनकार नहीं किया जा सकता है, जघन्य अपराधों में किशोरों के इस्तेमाल के मामले सामने आये हैं लेकिन यह तो कोई हल नहीं होगा कि एक ऐसे प्रगतिशील कानून को जिसे हमने अपने ही बच्चों के हित में बनाया है अगर ठीक से लागू नहीं कर पा रहे हैं तो उसे बदल ही डालें, बेहतर तो यह होता कि पहले हम उसे लागू करने की दिशा में आ रही रुकावटों को तो दूर करते. हम हर मामले में अमरीका के माँडल को कॉपी करके अपने आप को धन्य मान लेते हैं भले ही वह कितना भी कचरा क्यूँ ना हो, पूरी दुनिया में अमरीका और सोमालिया केवल दो मुल्क ऐसे हैं जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। अमरीका और इग्लैंड जैसे मुल्क भी यह मानने लगे है कि किशोर अपराध पर लगाम लगाने के लिए कड़े प्रावधानों की व्यवस्था अप्रभावी साबित हुई है, अमरीका में किशोर न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए चलाए जा रहे अभियान,“नेशनल कैम्पेन टू रिफार्म स्टेट जुवेनाइल सिस्टम” के अनुसार वहां बड़ों के जेलों में रहने वाले 80% किशोर जेल से वापस करने के बाद और ज्यादा गंभीर अपराधों में संलिप्त हो जाते हैं. हमें इससे सबक लेते हुए अपनी निष्क्रिय और चरमराई किशोर सुधार व्यवस्था को बेहतर बनाना होगा, इसके दुरूपयोग के संभावनाओं को सीमित करते हुए ऐसे मजबूत व्यवस्था का निर्माण करना होगा जहाँ “विधि विवादित बच्चों” को सजा नहीं बल्कि सुधार और पुनर्वास का मौका मिल सके.सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूरे देश के बाल सुधार ग्रहों की स्थिति के अध्ययन के लिए न्यायाधीश मदन बी. लोकर की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गयी थी, जिसकी रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश के सरकारी बाल सुधार गृहों में रह रहे 40% “विधि विवादित बच्चे” बहुत चिंताजनक स्थिति में रहते हैं, इन बाल सुधार गृहों की हालत वयस्कों के कारागारों से भी बदतर है. कमेटी के अनुसार बाल सुधार गृहों को “चाइल्ड फ्रेंडली” तरीके से चलाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं।

 

यह हमारी सामंतवादी सनक है जो हमसे न्याय के लिए अपराधी के साथ क्रूरतम बदला लेने की मांग करती है, हमारा राजनीतिक नेतृत्व और मीडिया में यह साहस ही नहीं है कि वह तथाकथित जनभावनाओं के खिलाफ जा सके, दरअसल वे खुद इन जनभावनाओं के परजीवी बन गये है, यह एक खतरनाक प्रवृति है जो अंततः हमें अराजकता की तरफ ले जा सकती है, क्योंकि यह जनभावनायें पहले ही हमारे राजनीति, मीडिया और कार्यपालिका पर हावी हो चुकी है,एक न्यायपालिका ही इससे बची है, अगर यह भावना उस पर भी हावी हो जायें तो स्थितियां गंभीर हो सकती हैं, भारत विविधताओं से भरा देश है इसलिए हमें कितना भी पसंद-नापसंद हो या कैसा भी  जनदबाव हो यह सुनाश्चित करना होगा कि कानून से ऊपर कुछ नहीं हो सकता है.

इस बात में कोई शक नहीं कि दिल्ली गैंगरैप तथा इस तरह की दूसरी वीभत्स और रोंगटे खड़ी करने घटनाओं में किशोरों की संलिप्तता एक गंभीर मसला है, लेकिन क्या इस मसले में एक देश और समाज के रूप में हमारी कोई भूमिका नहीं है ? इस तरह के अमानवीय घटनाओं के शामिल होने वाले बच्चे/किशोर कहीं बाहर से तो आते नहीं हैं, यह हमारा समाज ही है जो उन्हें  पैदा कर रहा है, इसलिए गंभीर अपराधों में शामिल किशोरों को कड़ी सजा देने से ही यह मसला हल नहीं होने वाला, बाल अपराध एक सामाजिक समस्या है, अतः इसके अधिकांश कारण भी समाज में ही विद्यमान हैं,एक राष्ट्र और समाज के तौर में हमें अपनी कमियों को देखना चाहिए और जरूरत के हिसाब से इसका इलाज भी करना पड़ेगा. कड़ी सजा देना आसन है और पुनर्वास मुश्किल, दुर्भाग्य को हम ने आसान को चुन लिया है.

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz