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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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भगवंत अनमोल

एक मेरे पड़ोस में एक खन्ना साहब का परिवार है. वो किसी प्राइवेट कंपनी में ऊँचे पद पर है और उनकी अर्धांग्नी भी सरकारी नौकर है. अर्थात काफी कमाने वाला परिवार है. उनके एक बेटा है जिसे सभी प्यार से अप्पू बुलाते है. वह कक्षा तीन में पढता है. कुछ दिन पहले उसका जन्मदिन था. उस दिन वह बहुत खुश था. उसकी ख़ुशी देख मैंने उसकी ख़ुशी का राज पूंछा” क्यूँ अप्पू आज जन्मदिन है इसलिए खुश हो?”

उसने बड़े ही प्यार से मुझे झुककर कान में खुसफुसाते हुए कहा ” जानते हो भैया, आज मेरे बड्डे के दिन सोनाली आ रही है”

मैंने उसकी बात सुनकर उसी के लहजे में पूंछा ” सोनाली कौन है?”

उसने फिर से प्यार भरे अंदाज में कहा”वो मेरे क्लास में पढ़ती है, मैं उसे पसंद करता हू”

उसकी बात सुनकर मुझे अचरज नहीं हुआ पर मुझे अपने दिन याद आगये. जब हम कक्षा तीन में थे तब हमारी ज़िन्दगी सिर्फ पढाई और खेलना कूदना थी, जब हम अपनी प्यारी प्यारी बहनों के साथ घर घर खेला करते थे, और शाम को “ॐ नमः सिवाय” नामक धारावाहिक देखा करते थे और रविवार के दिन क्रिकेट खेलने और “शक्तिमान” धारावाहिक देखने के नाम दिया करते थे..परन्तु आज कल के बच्चे क्रिकेट और धारावाहिक के बजाय कार्टून्स और “आशिक बनाया आपने” का रिमिक्स सोंग देखना ज्यादा पसंद करते है. और घर घर खेलने के बजाय उन्हें लड़की के बारे में सोचने में ज्यादा दिलचस्पी होती है.

इसका ज़िन्दगी में इतना बुरा असर पड़ रहा है कि आप लोग देखते होंगे की आपका पहला प्यार हमेशा ज़िन्दगी भर आपके दिल को कोसता रहता है. ज्यादातर लड़कियां बारहवी पास होने से पहले ही सम्बन्ध बना चुकी होती है. मुझे सम्बन्ध बनाने से कोई टेंशन नहीं है परन्तु मैंने ज्यादातर लड़कियों को देखा है कि उन्हें बाद में ऐसा महसूस होता है कि उनके पहले प्रेमी ने उनकी सिधाई का फ़ायदा उठाया.

होता कुछ इसतरह है कि जब लड़कियां आठवीं या नौवीं में होती है तो उनसे पांच-छह साल बड़ा लड़का उन्हें अपनी जाल में फंसा लेता है और वह परिपक्व दिमाग का भरपूर फ़ायदा उठा लेता है और वह भोली  भाली लड़की जो उसे अपनी ज़िन्दगी का पहला प्यार समझने कि गलती करती है वह ज़िन्दगी भर अपने आपको उस चीज़ से उभार नहीं पाती. यही बात लडको के लिए भी लागू है.. आईये जानते है ऐसा क्यूँ होता है?

 

मोम डैड का अपने बच्चो को समय न दे पाना-

इस भागती दौड़ती ज़िन्दगी में ज्यादातर मोम डैड पैसा कमाने के चक्कर में बच्चो को समय नहीं दे पाते और जब भी बात करते है तो सिर्फ पढाई की. केवल पढाई ही बच्चो का भविष्य नहीं बनती. आपको पता है ज्यादातर नौकरी रवैया देख कर दी जाती है न की पढाई. रवैया से मतलब एटीटीयूड से है. जब माँ बाप बच्चो को टाइम ही नहीं दे पायेंगे तो बच्चो को जो समझ आएगा वो वही करेंगे भले ही उन्हें किताबी ज्ञान कितना भी हो जाए परन्तु उनमे आचरण बिलकुल भी नहीं अपयेगा और हम दिल्ली रेप काण्ड जैसी घटनाओ को अंजाम देते रहेंगे…

 

समाज का असर-

समाज में आज जो चल रहा है वह आपके सामने है. हम समाज से इस कदर जुड़े हुए है की चाहे घर में रहे या बाहर समाज में जो चल रहा है वह हमे दिखता हता है. टीवी और इन्टरनेट ने बच्चो की ज़िन्दगी में ऐसा बुरा असर डाला है की उससे भाग पाना बहुत ही मुश्किल है. जब उनके पसंदीदा कलाकार जब वैसे काम करते नजर आते है तो बच्चे फिर क्यूँ पीछे रहे ?

 

जलवायु और वातावरण में बदलाव-

जलवायु और वातावरण में लगातार बदलाव आने की वजह से बच्चे बहुत जल्द बड़े हो रहे है. जिस कारन बच्चो में सेक्स भावना समय से पहले ही आरही है.

 

माँ बाप के लिए एक नशीहत-

देखिये पैसा कमाना कोई बुरी चीज़ नहीं है पर मै एक प्रश्न आप से करना चाहूँगा की अगर आपके सामने १० लाख रूपए की नोटों की गड्डी रखी है दूसरी तरफ एक खाली चेक जिस पर आप जितना चाहे  उतनी राशि भर सकते है और आपके पास शर्त इतनी है की आप उनमे से सिर्फ एक चीज़ को ही उठा सकते है.. आप क्या करेंगे??

बेशक आप चेक उठाएंगे उसी तरह आप जो कमा रहे है वह एक निश्चित राशि है परन्तु आपने अपने   बच्चे को उतना ही समय दे दिया तो वो कोरा कागज़ है जितना चाहे उस चेक में राशि भर ले.. जरा सोचे दायित्यो की पूर्ति  चक्कर में संतान जैसी संपत्ति को न खोये…. लाख रूपए की नोटों की गड्डी रखी है दूसरी तरफ एक खाली चेक जिस पर आप जितना चाहे  उतनी राशि भर सकते है और आपके पास शर्त इतनी है कि आप उनमे से सिर्फ एक चीज़ को ही उठा सकते है.. आप क्या करेंगे??

बेशक आप चेक उठाएंगे उसी तरह आप जो कमा रहे है वह एक निश्चित राशि है परन्तु आपने अपने  बच्चे को उतना ही समय दे दिया तो वो कोरा कागज़ है जितना चाहे उस चेक में राशि भर ले.. जरा सोचे दायित्यो की पूर्ति  चक्कर में संतान जैसी संपत्ति को न खोये….

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