लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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लिमटी खरे

एक समय में ठक टिक की आवाज के साथ गर्व से सीना ताने चलने वाला टाईपराईटर अब इतिहास की वस्तु हो गया है। कम ही जगहों पर टाईपराईटर देखने को मिला करते हैं। भारतीय सिनेमा की जासूसी फिल्मों में टिक टिक की आवाज के साथ शबदों को कागज पर उतारने वाले टाईपराईटर के अक्षरों के माध्यम से अनेक अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाया जाता रहा है। कोर्ट कचहरी, अर्जीनवीस, समाचार पत्र, सरकारी कार्यालयों आदि में टाईपराईटर की आवाज बहुत ही मधुर हुआ करती थी। कालांतर में इसका स्थान कम्पयूटर के बेआवाज की बोर्ड ने ले लिया। अब तो हर जगह डेक्स टाप या लेपटाप की ही धूम है। अस्सी के दशक के बीतने तक टाईपिंग सिखाने वालों की दुकानें रोशन हुआ करती थीं।

टाईपराईटर का उत्पादन कर रही दुनिया की आखिरी कंपनी गोदरेज एण्ड बोएस ने अब इसका उत्पादन नहीं करने का फैसला लिया है। निश्चित तौर पर यह समय की मांग है किन्तु सालों साल उत्पादन करने वाली कंपनी ने भारी मन से यह फैसला लिया होगा, कंपनी के कर्मचारियों और मालिकों की पीड़ा को समझा जा सकता है। कंपनी के पास लगभग दो सौ टाईपराईटर हैं जिन्हें वह एंटीक के बतौर उसी तरह बेच सकती है जिस तरह आज ग्रामो फोन लोगों के घरों की बैठक की शान बन गए हैं।

अस्सी के दशक तक मीडिया में प्रिंट का दबदबा चरम पर था, (है तो आज भी किन्तु इलेक्ट्रानिक और वेब मीडिया के आगे इसकी छवि उतनी उजली नहीं बची है) इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। उस समय संपादकों द्वारा वही रचनाएं प्रकाशन के लिए स्वीकार की जाती थीं, जो सुपाठ्य अक्षरों में या टाईप की हुई हुआ करती थीं। न जाने कितने चलचित्र की पटकथा भी इन्ही टाईपराईटर से कागजों पर उतरी होंगी। कहते हैं कि हालीवुड के मशहूर किरदार जेम्स बांड की सुपर डुपर हिट फिल्मों के लेखक इयान फ्लेमिंग के पास एक सोने का बना टाईपराईटर था।

दुनिया के चैधरी अमेरिका में 1714 में हेनरी मिल द्वारा इस मशीन का अविष्कार किया था। इसके लगभग डेढ़ सौ साल के लंबे सफर के उपरांत क्रिस्टोफर लाॅमथ शोलेज द्वारा इसे 1864 में अंतिम बार नया रूप दिया और तब से इसका स्वरूप यही बना रहा। टाईपराईटर का व्यवसायिक उत्पादन 1867 में आरंभ हुआ था। 1950 के आते आते टाईपराईटर की लोकप्रियता लोगों के सार चढ़कर बोलने लगी। सरकारी कामकाज में टाईपराईटर का उपयोग जरूरी महसूस किया जाने लगा। इसी दौरान अमेरिका की कंपनी स्मिथ कोरोन ने दस लाख टाईपराईटर बेचकर रिकार्ड कायम किया। 1953 में तो दुनिया भर में एक करोड़ बीस लाख टाईपराईटर बिके।

नब्बे के दशक के आगाज के साथ टाईपराईटर में एक बार फिर तब्दीली महसूस हुई उस दौरान सामान्य टाईपराईटर से डेढ़ गुना बड़े आकार का इलेक्ट्रानिक टाईपराईटर बाजार में आया। इसमें मेमोरी थी, जिसमें कुछ प्रोफार्मा बनाकर सेव किए जा सकते थे। यह काफी हद तक लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इसमें टाईपिस्ट को एक ही पत्र को बार बार टाईप नहीं करना होता था। इलेक्ट्रानिक टाईपराईटर की सांसे जल्द ही उखड़ गईं और इसका स्थान ले लिया कंप्यूटर ने।

कोर्ट कचहरी और भवन भूखण्डों की रजिस्ट्री के लिए अर्जीनवीस कार्यालय में टाईपिंग की स्पीड देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते थे, जब वे टाईपिंग मशीन पर बैठे व्यक्ति को एक ही उंगली से फर्राटे के साथ टाईप करते देखते थे। टाईपिंग करने वाले का की बोर्ड पर एक ही उंगली से निशाना गजब का होता था, जिसमें गल्ति की गुंजाईश ही नहीं होती थी। एक समय था जब टाईपिंग की परीक्षा आहूत होती थी, इसमें हर परीक्षार्थी को टाईपिंग मशीन साथ लाना अनिवार्य होता था। टाईपिंग की परीक्षा प्राप्त आवेदकों को स्टेनोग्राफर, टाईपिस्ट या क्लर्क की नौकरी में वरीयता भी मिला करती थी।

नब्बे के दशक के आगाज के साथ ही कंप्यूटर ने अपनी आमद दी। धीरे धीरे यह समाज पर छा गया। मुख्य तौर पर देखा जाए तो टाईपराईटर के लिए कंप्यूटर ही दुश्मन या सौतन साबित हुआ। टाईपिंग के प्रशिक्षण के लिए खुले संेटर वीरान होने लगे, शार्ट हेण्ड और टाईपिंग की विधा में से टाईपिंग भर जिंदा मानी जा सकती है, शार्ट हेण्ड तो अब गुजरे जमाने की बात हो चली है। रही बात टाईपिंग सीखने की तो कंप्यूटर के की बोर्ड पर उंगलियां चलाते चलाते बच्चे आसानी से टाईपिंग सीखने लगे हैं। हिन्दी की टाईपिंग जरा मुश्किल है, किन्तु अंगे्रजी की टाईपिंग बेहद आसान मानी जाती है। अब तो हिन्दी के शब्दों के स्टीकर की बोर्ड पर लगाकर बच्चे आसानी से हिन्दी मंे टाईप करने लगे हैं। हालात देखकर लगने लगा है मानो बच्चे मां के पेट से ही टाईपिंग सीखकर आ रहे हैं।

तीस साल की हो रही पीढ़ी इस परिवर्तन की साक्षात गवाह मानी जा सकती है जिसने टिक ठक से लेकर बेआवाज की बोर्ड तक का सफर अपनी नंगी आंखों से देखा होगा। इस पूरे बदलाव का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि टाईपराईटर की जवान पीढ़ी कंप्यूटर का की बोर्ड आज भी लोकप्रिय रही टाईपराईटर कंपनी रेमिंगटन के नाम पर आज भी धडल्ले से चल रहा है।

हर चीज जो पैदा होती है उसका अंत अवश्य ही होता है। कहा जाता है कि मनुष्य और उसके द्वारा निर्मित हर प्रोडक्ट कभी न कभी मृत्यु को प्राप्त होता है, उसका अवसान सुनिश्चित है। टिक टक की ध्वनि के साथ शब्दों को कागज पर उकेरने वाले टाईपराईटर ने लगभग तीन सौ सालों तक एक छत्र राज्य किया, अंत में वह मानव निर्मित संगणक (कंप्यूटर) के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गया है।

टाईपराईटर में शब्दों का आकार सीमित हुआ करता था, किन्तु उसके परिष्कृत स्वरूप कंप्यूटर में हिन्दी अंगे्रजी उर्दू सहित अनेक भाषाओं के अनगिनत फॉन्टस के साथ ही साथ उनका आकार (साईज) भी मनमाफिक करने की सुविधा है। एक ओर जहां टाईपराईटर से टाईप करने पर गल्ति होने पर उसमें व्हाईट फ्लूड लगाना या फिर उस शब्द पर दूसरा शब्द बार बार टाईप करना होता था उसके स्थान पर कंप्यूटर पर स्क्रीन पर ही पढ़कर उसमें करेक्शन किया जा सकता है।

टाईपराईटर के अवसान के साथ ही साथ इसके सहयोगी अव्यव टाईप रिबिन और कार्बन भी आने वाले समय में विलुप्त हो जाएं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अनेक चीजें एसी हैं जो समय के साथ ही बाजार से गायब तो हो चुकी हैं, पर गाहे बेगाहे, उनकी चर्चा होने पर पुनः उन प्रोडक्ट्स से जुड़ी मीठी यादें ताजा हो जाया करती हैं। उसी प्रकार जिन लोगों ने टाईपराईटर को देखा या उसका उपयोग किया है, उनके मानस पटल से लंबे समय तक टाईपराईटर विस्मृत होने वाला नहीं।

 

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