लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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बहुत पहले मैं भी यही सोचा करता था कि फलां जगह क्यों जाऊं? लोग क्या कहेंगे. लेकिन बाद में सोच बदली. मुझे लगता है कि लेखक को वर्जनावादी नहीं होना चाहिए. उसे उदारवादी सोच वाला होना चाहिए. उदारता ही हमें -या किसी को भी-बड़ा बनाती है.लेखक को हर मंच पर जा कर अपनी बात कहनी चाहिए. हाँ, ‘गंगा गए तो गंगादास, जमुना गए तो जमुनादास’ जैसी बात नहीं होना चाहिए. लेकिन अब इधर हिंदी के कुछ लेखक अपने आपको कुछ ज्यादा ही उच्च प्रजाति का समझ का व्यवहार करने लगे है. इससे उनकी वैचारिक दरिद्रता का ही पता चलता है. विकारों की दुनिया का यही सुख है कि यहाँ किसम-किसम के लोग मौजूद हैं. सबकी अपनी-अपनी सोच है. और वे अपने-अपने स्तर पर बेहतर काम कर रहे है. लेकिन मैं इस सोच में केवल उन्हीं लोगों को शरीक करूंगा जो देश और समाज में करुणा, सद्भावना, सांप्रदायिक सद्भावना के पक्षधर हैं. जो लोग धर्म के नाम पर हिंसा के पक्षधर हैं, उनसे दूर रहना ही ठीक है. लेकिन जो संस्थाएं वैचारिक मोर्चे पर काम कर रही हैं, उनके बीच जा कर अपने मन की बात रखने में कोई बुराई नहीं. मैं जहाँ भी जाता हूँ, मानुष के करुणा जगाने की बात ही करता हूँ. सांप्रदायिक सद्भावना का सन्देश देता हूँ. वैचारिक छुआछूत से कोई लाभ नहीं, ऐसा करके हम एक तरह का अलगाव ही फैलाते है.

साहित्य और पत्रकारिता की हालत यह हो गई है कि यहाँ तो निम्न श्रेणी की मानसिकता ही नज़र आती है. साहित्य का हाल अज़ब है. अगर कोई छंद-बद्ध कविता करता है, तो नयी कविता लिखने वाला उससे दूरी बना लेता है. जैसे वो कोई अछूत हो. गीत-ग़ज़ल लिखने वाले को नई कविता वाले या माफिया किस्म के आलोचक ”झंडूबाम” ही समझते है. ऐसा करके वे अपनी असलियत बताते है कि वे कितने ‘दरिद्र’ हैं. अगर कोई अपनी रचनाओं में आदर्शवाद का सहारा लेता है तो उसे हाशिये पर डाल देते है, देशप्रेम की बात करता है, उसका उपहास किया जाता है. हाँ, अगर कोई रचना में नंगापन उपस्थित करता है तो कहा जाता है, ”देखो, ये है लेखन. बोल्ड लेखन …उत्तर आधुनिक……माडर्न.” पतन का ये हाल है. नंगापन साहित्य और आलोचना के केंद्र में है और नैतिकता बहिष्कृत. इसे विषम दौर में विचार करने की ज़रुरत है कि आखिर हम कैसा समझ रचना चाहते है.’संघ’ से जुड़े लोग देश और समाज के लिये ही सोचते हैं. ये और बात है कि हम हर स्तर पर उनसे सहमत नहीं हो सकते, मगर उनके देश प्रेम का मानना होगा. मैं संघ के साहित्यिक प्रकल्पों में कभी-कभार बुलाया जाता हूँ, तो चला जाता हूँ. वैसे पहले नहीं जाता था. वही छुआछूत की मानसिकता से ग्रस्त होने के कारण. मगर अब इसलिये जाता हूँ कि वहाँ जा कर मैं अपनी ही बात कहूँगा. लोगो को भी समझूंगा कि वे क्या सोचते-विचारते हैं. लेखको को संकुचित नहीं होना चाहिए. उदार हो कर चीज़ों को देखना चाहिए. यह उदारता ही हमें बड़ा बनाती है. वरना हम सीमित दायरे में रह कर खुद-ब-खुद छोटे हो जाते हैं.

‘भारत नीति प्रतिष्ठान’ ने अच्छा आयोजन था. समान्तर सिनेमा पर ही बात हो रही थी. वहाँ जा कर मंगलेश डबराल ने बेहतर बात ही की होगी. उनकी आलोचना का कोई तुक नहीं थी. मंगलेश डबराल ने इसे अपनी ”चूक” कहा. यह उनके व्यक्तित्व का कमजोर पहलू है. वे साहस के साथ कह सकते थे कि मैंने कोई गलत काम नहीं किया. खैर, यह उनका अपनी चिंतन है. ‘भारत नीति प्रतिष्ठान’ को इसी तरह के आयोजन करते रहना चाहिए. आलोचनाएँ होंगी, मगर भले काम जारी रहने चाहिए. यह अच्छी बात है कि अभी भी अपने समाज में उदारवादियों की बहुलता है. इसलिये यह दुनिया भी चल रही है. छुआछूत से ग्रस्त लोग काम हैं. वे पड़े रहेंगे, अपनी जगह सड़े रहेंगे, और सद्भावना की खुशबू फैलती रहेगी.

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4 Comments on "उदारता ही हमें बड़ा बनाती है / गिरीश पंकज"

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Jeet Bhargava
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डबराल ने अपनी ‘चूक’ बताकर खुद को बौना और संकल्पशक्ति विहीन साबित किया है. मैं उनकी व्यक्तिगत रूप से इज्जत करता हूँ, लेकिन इस प्रकरण से उनकी वैचारिक और व्यक्तिगत कमजोरी उभरकर आई है.

गिरीश पंकज
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आपने अच्छी बात की है. मै सहमत हूँ लेकिन कई बार उपहास के बीच भी अपनी बात रख ही देनी चाहिए. हर उयुग में बच्छी बातें करने वाले उपहास के पात्र होते रहे हैं . आज भी आपका, हमारा उपहास लोग उड़ाते ही होंगे. लेकिन मैं अपनी कहू की जो कहाँ है, वही कहूँगा. भले ही लोग दुबारा न बुलाएँ. आपने सरता बात कही, अच्छा लगा. इकबाल हिन्दुस्तानी जी, आपका भी धन्यवाद.

डॉ. मधुसूदन
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गिरीश जी।
प्रत्येक परिस्थिति अलग और अपनी विशेषता रखती है।
सामान्य रूपसे आप की बात सही हो सकती है, पर कभी कभी आपको दो हानिकारक पर्यायों में से एक का चुनाव भी करना पडता है।
आप अपने विचार, जो आपको सहानुभूति पूर्वक सुनने वाले हों, वहीं रख सकते हैं। अन्यत्र नहीं। ऐसा भी देखा है, कि हमें (उपहास करने के लिए) बुलाया गया, और वहां सभी ने मिलकर हमारी हँसी उडायी।
संकुचितता भी विशालता का चोला पहन कर आती है। हर स्थान पर सुज्ञजन “विवेक” का प्रयोग करें। भोले बन कर ना रहें।
धन्यवाद।

इक़बाल हिंदुस्तानी
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सहमत हूँ.

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