लेखक परिचय

दीपक शर्मा 'आज़ाद'

दीपक शर्मा 'आज़ाद'

स्वतंत्र पत्रकार, जयपुर

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बात बढ़ते बढ़ते इतनी बढ़ गई थी कि शहर के शहर सड़क पर आ उतरे और अन्तत: सरकार को पूरे देश में कर्फ्यू लगाना पड़ा। दरअसल, गत दो दिवस पहले चौथ का व्रत था। जिसके चलते सभी घरों में तनाव पसरा था। शर्मा जी, गांधी जी के तीसरे बंदर की तरह अपनी पत्नी के सामने स्वभावत: चुप और खुश रहते थे। मगर ये खुशी कितने दिन चलती, भाग्य ने साथ छोड़ा और चौथ का दिन आ मगया। इस दिन सभी पत्नियां अपने पति के लिए भूखी रहकर व्रत करती हैं। और भूखी पत्नियों का गुस्सा तेज होता है, बेचारा गांधीवादी पति कब तक अपनी खैर मनायेगा। भूखी पत्नियों से इस दिन जरा भी मजाक, प्राणघातक साबित होता है ऐसा किसी समझदार ने कहा है। और ऐसे में हालात ज्यादा खराब होते हैं जब पत्नी भूखी खुद रहे और फायदा पति का हो।
रात के बारह बज चुके थे, चांद के इंतजार में वक्त काटती घड़ियों ने भूखी मिसेज शर्मा जी की ललाट पर सलवटें डालने का काम किया, रही सही कसर शर्माजी की हंसी ने किया। ये असर आग में घी डालने जैसा ही था। सुबह से अब तक शर्माजी के लिए भूख से समझौता किये बैठी मिसेज शर्मा ने जब पति को हंसते हुए देखा तो, वे तमतमा उठी! मगर बोली कुछ नहीं। बेचारे शर्माजी की जान निकल गई, रात भर ये सोचने में नींद नहीं आई की अब क्या होवेगा।
अगले दिन सुबह अखबार उठाकर देखा तो समाचार पत्र में हेडलाईन थी,’कुछ पतियों ने चांद न दिखने पर जश्न मनाया, जिससे नाराज पत्नियों ने उन्हें दो दिन तक भूखा रहने की सजा दी।’ खबर पढ़ते ही शर्माजी के कंठ सूखने लगे, बेचारा पानी पीने बरामदे के आहते तक पहुंचा कि रसोईघर के ताला लगाते हुए पत्नी का रौद्र रूप देखा। बेचारा पति दबे पांव बिना पानी पिये अपने कमरे में आकर वापस चद्दर ओढ़कर सो गया। पति समझ गया था, रात को अपनी पत्नी पर हंसने वाला वो अकेला नहीं था। अब पूरे देश में पत्नियों ने आंदोलन शुरू कर दिया था, अपने पतियों की बेहयाई और चांद की बेवफाई के खिलाफ। दोपहर में टीवी चैनलों ने बताया कि चौथ के रोज चांद न निकलने की घटना, पति और चांद की मिलीभगत थी। ये खबर सुनकर तो बेचारे शर्माजी और उनके जैसे जाने कितने बेचारों के तोते उड़ने लगे। वहीं पत्नियों के गुस्से का पार नहीं रहा, शाम के अखबार में खबर फैली की देशभर में महिला संगठनों ने चांद और पतियों के खिलाफ प्रदर्शन किया। कहीं कहीं से खबर आ रही थी कि दोनों के पुतले भी फूंकें गये थे। ज्यों ज्यों खबरों का स्वरूप भयानक होता जा रहा था त्यों त्यों पतियों का खून सूखने लगा। बेचारों को सुबह से खाने को कुछ मिला नहीं, उस पर ‘अब क्या होगा’ की चिंता सो अलग। महिला संगठनों और पत्नी एकता परिषदों के कड़े आंदोलनों की चेतावनी को देखते हुए सरकार ने पूरे देश में कर्फ्यू की घोषणा कर दी। इनके आंदोलनों की अनदेखी बड़ी से बड़ी सरकार नहीं करती तो भोले पति जो स्वभावत: हमेशा से ही ‘गांधीवादी’ होते हैं, की क्या औकात। सरकार ने हस्तक्षेप कर पति सहायता समिति जैसे राष्ट्रीय संगठनों से माफीनामा तैयार करवा पतियों को पत्नियों के सामने घुटने के बल बैठने पर मजबूर किया। तब जाकर कहीं पत्नी एकता परिषदों का गुस्सा ठंडा हुआ। मगर बेचारे पतियों का डर अगले दिन सुबह तब तक कम नहीं हुआ, जब तक उन्होंने अखबार में चांद का स्पष्टीकरण नहीं पढ़ लिया।
चौथ के चौथे रोज सुबह वाले अखबार की हेडलाईन्स थी,’पतियों को राहत, चांद ने चौथ के रोज न दिखाई देने के पीछे पतियों का हाथ होने से किया इनकार।’ अब शर्माजी चाय की गरमा—गरम चुस्कियों के साथ ये ताजा हेडलाईन्स पढ़ रहे थे और मिसेज शर्मा बगीचे से पूजा के फूल तोड़ रहीं थी। माहौल बदल चुका था, शर्माजी और मिसेज शर्मा को बीते दिन क्या हुआ कुछ याद ही नहीं था और वैसे भी इसका फायदा भी क्या था।

दीपक शर्मा ‘आजाद’,

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