लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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छत्तीसगढ़ की पिछली सरकार अपनी पारी पूरे करने जा रही है. बस चंद दिन शेष हैं. कुछ अन्य लोगों के साथ यह लेखक भी मुख्यमंत्री से मिलने मंत्रालय में बैठा है. साथ में आदिवासी वर्ग से चुने गए एक संसदीय सचिव (विधायक एवं राज्यमंत्री का दर्ज़ा) भी बैठे हैं. तभी सीएम के चेंबर से मुख्य सचिव का निकलना होता है. बहुत ही दयनीय भाव और चेहरा पर जबरन की मुस्कराहट लिए संसदीय सचिव झटके से खड़े होकर हाथ जोड़कर अधिकारी को प्रणाम करते हैं पर एक उचटती हुई निगाह एवं अफसरी रौब चेहरे पर ग़ालिब किये मुख्य सचिव बिना कुछ बोले कमरे से बाहर निकल जाता है. गोया उसे प्रणाम करने वाला जन-प्रतिनिधि की कोई हैसियत ही नहीं हो उसके लिए. लोकतंत्र का यह हाल देखकर ठगा सा रह जाता हू साथ ही सोचने लगता हूँ….पता नहीं क्या-क्या!,

आज जब पंचायत मंत्री रामविचार नेताम द्वारा एक राज्य सेवा के प्रशासनिक अधिकारी के साथ किये गए कथित दुर्व्यवहार पर काफी कुछ लगातार लिखा जा रहा है तो अनायास ही वह प्रसंग याद आ गया. ऊपर के प्रसंग के बहाने किसी घटना को उचित ठहराना अपना मकसद नहीं है और ना ही इस घटना में पीड़ित किसी अधिकारी की पीड़ा को कम करके आंकना है. वास्तव में किसी भी ऊचे पर बैठे व्यक्ति से संयमित रहने की अपेक्षा करना उचित है. किसी मंत्री से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद की भी नहीं जा सकती. लेकिन इस मामले में अभी तक जो भी लिखा गया है उससे परे एक दुसरे पक्ष पर भी सोचने की ज़रूरत है. ऊपर वर्णित आँखों देखी और इस घटना के बहाने जनता, जनप्रतिनिधि एवं नौकरशाहों के अंतर्संबंध पर थोडा विमर्श किया जाना भी आवश्यक है., जैसा कि सब जानते हैं कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों एवं मंत्रियों के पास सत्ता की शक्तियां निहित होती है. अगर कोई मंत्री इरादतन या नाराज़ हो कर किसी अधिकारी को सबक सिखाना चाहे तो उसके पास कई रास्ते होते हैं. आखिर इस घटना में एकबारगी ऐसा क्या हो गया कि मंत्री को आप खो कर ऐसा कदम उठाना पड़ जाता है. सीधी सी बात है कि विपक्षी दलों द्वारा भी प्रदेश सरकार पर जो सबसे बड़े आरोप लगाए जाते हैं उसमें ये मुख्य रहता है कि छत्तीसगढ़ में नौकरशाही बेलगाम हो गयी है. भ्रष्ट, लापरवाह एवं अहंकारी नौकरशाही से आज प्रदेश की जनता किस कदर परेशान है यह आप आम जन की तो बात छोडिये, खास कहे जाने वाले लोगों से भी दरयाफ्त कर सकते हैं.

कुछ और उदाहरण देखिये…प्रदेश में बहुप्रसारित इलेक्ट्रोनिक मीडिया की एक पत्रकार “प्रियंका कौशल” को हाल ही में मंत्रालय के एक अधिकारी ने अपने कमरे से धक्के दे कर बाहर निकाल दिया था. प्रियंका का “कसूर” केवल इतना था कि उसने बगल के एक बदतमीज़ अधिकारी से यह सवाल पूछ लिया था कि बगल वाले अधिकारी कब आयेंगे. केवल इसीलिए उस महिला पत्रकार को अपमानित होकर उस चेंबर से निकलना पड़ा और बाकी के सभी अधिकारी भी अपने कलीग की ही तरफदारी करते नज़र आये., इसी तरह एक और पत्रकार की कहानी है. मुख्य मंत्री आवास के अधिकारियों द्वारा उनके लिए कोरबा में कमरे का आरक्षण करवाया गया था. ऐन नए साल के दिन वो पत्रकार अपने पूरे परिवार एवं बच्चों के साथ शहर में भटकते रहे और प्रोटोकोल अधिकारी अपना मोबाइल बंद करके सोया रहा. बार-बार कन्फर्म करने के बावजूद भी वहाँ पर किसी भी तरह की कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी. ठंडी की उस रात अपने बच्चों के साथ बड़ी मुश्किल से वो अनजाने शहर में किसी तरह रुकने का अपना बंदोबस्त कर पाए. इसी तरह प्रदेश के एक बड़े अधिकारी की ख्याति ही इसीलिए है कि वह अपने ही मंत्री के खिलाफ जब-तब तमाम लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रख कर बयानबाजी करते रहते हैं. एक बार तो अपने किसी समर्थक लेखक से उन्होंने यही लिखबा दिया कि नक्सली और राजनेता (सम्बंधित मंत्री) उनके खिलाफ “लामबंद” हो गए हैं. ऐसे ही एक दिन आयकर का छापा एक आईएएस के यहाँ पड़ता है और पता चलता है कि उसने एक ही गांव के गरीबों के नाम पर 250 के करीब फर्जी बैंक खातों में करोडों की काली कमाई को जमा कर रखा है. बहुत मुश्किल से बनायी गयी तेज़ी से विकसित हो रहे इस प्रदेश छवि एक झटके में तार-तार हो जाती है. देश भर में केवल यहाँ के भ्रष्टाचार की चर्चा शुरू हो जाती है. “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में….तुम रहम नहीं खाते बस्तियां जलाने में.”

अधिकारियों के गुरुर और भ्रष्टाचार के ऐसे दर्ज़नों उदाहरण और गिनाए जा सकते हैं. बाबूलाल को छोड़कर उपरोक्त वर्णित जितने भी उदाहरण हैं उसमे “पीड़ित” विशिष्ट कहे जाने वाले लोग ही हैं. तो इन चुनिन्दा नजीरों से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आखिर आम लोगों के साथ इन नौकरशाहों के द्वारा क्या और कैसा सलूक किया जाता होगा, “जब रात है ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्या होगा”. यह भी एक तथ्य है कि बहुधा अपने कार्यकलापों से ये अधिकारीगण खासकर आदिवासी जन प्रतिनिधियों को उपेक्षित और अपमानित करने से बाज़ नहीं आते. सीधी सी बात ये है कि आप कितनी भी बड़ी प्रतियोगिता से चुनकर आये कितने भी बड़े तीसमार खां हों, अन्ततः लोकतंत्र की शक्तियां जनता और उनके प्रतिनिधियों में ही निहित हुआ करती है. अगर आपके मन में उनके प्रति सम्मान का भाव हो तो आखिर किसी मंत्री को अपने पद को दाव पर लगा ऐसे किसी कदम को उठाने की ज़रूरत ही नही होगी. यहाँ आशय किसी के भी क़ानून को हाथ में ले लेने का औचित्य निरूपण करना नहीं है. आलोच्य घटना के बहाने बस निवेदन यही है कि जनता के पैसे से वेतन पाने वाले नौकरगण अगर अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे, अगर उन्हें ये महसूस हो जाए कि उनकी शान के लिए गरीबों के पसीनों की कमाई का ही सबसे बड़ा हिस्सा खर्च होता है, अतः उन्हें जन और जन-प्रतिनिधियों के प्रति जिम्मेदार रहना है तो शायद ऐसी नौबत ही नहीं आये. खबर आ रही है उस कथित घटना के लिए अधिकारियों का संघ भी उद्वेलित-आंदोलित है. ऐसे सभी संघ को उत्तर प्रदेश के अपने बिरादरी से सबक लेने की भी ज़रूरत है.

हर तरह के नकारात्मक कारणों के लिए जाने-जाने वाले उत्तर प्रदेश के अधिकारियों के संघ ने कम से कम इस मामले में देश को राह दिखाई है. वहाँ पर खुद ही आगे बढ़ कर अधिकारीगण अपने बीच के भ्रष्ट और अक्षम अधिकारियों की बकायदा सूची जारी करते हैं. छत्तीसगढ़ में भी उसका अनुकरण कर यहाँ के प्रशासनिक अधिकारी उपरोक्त वर्णित घटनाओं पर नियंत्रण करने में सफल हो सकते हैं. लेकिन उसके लिए आवश्यक ये होगा कि सबसे पहले अपने विशिष्ट होने के अहंकार का परित्याग करें. अगर वे सेवक भावना से काम कर अपनी जिम्मेदारियों का विनीत भाव से निर्वहन करेंगे, लोक और उसके तंत्र में अपनी आस्था का बदस्तूर प्रदर्शन करते रहेंगे तो फिर स्वाभाविक सम्मान का हकदार वे हो सकेंगे. कहावत है कि शिखर पर पहुचना नहीं उस पर आरुढ रहना महतत्वपूर्ण है तो एक बार प्रतिश्पर्द्धा में सफल हो जाने पर लोकतंत्र उनके जिंदगी भर आरूढ़ रहने की गारंटी मुहय्या कराता है जबकि इसके उलट किसी जन-प्रतिनिधि को तो हर समय अग्नि परीक्षा से गुजरना होता है. हर पांच साल( और कई बार उससे पहले भी) उन्हें अपने पद पर बने या बने रहने के लिए जनता से अनुमति लेनी होती है. तो इस आलोक में नौकरशाहों को चाहिए कि वे जनता एवं लोकतंत्र के प्रति कृतज्ञ रहे और हर तरह के अहंकार से खुद को मुक्त रहे. उपरोक्त का सबसे बड़ा सन्देश शायद यही है.

-पंकज झा

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8 Comments on "छत्तीसगढ़: राजनेता बनाम नौकरशाह"

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Rajesh Kumar
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Pakanj jee ye koe nayee bat nahi hai, Rajneta or brucrate, ke sambandh or anban koe nayi bat nahi hai.

विकास आनन्द
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apne sahi visleshan kia hai. yehi hal hai so called democracy ka. noukar shah apne ko malik samajh baithate hai ane apko.

Divya
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terrorism everywhere !

डॉ. महेश सिन्‍हा
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नेता हो या अधिकारी दोनों को अपने दायरे में रहना चाहिए
अंग्रेज चले गए लेकिन “Sir” अभी तक नहीं गया

पंकज झा
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संजीत जी. न तो मैं नेताम का नमक खाता हू और ना ही अदा करने जैसी कोई बात है. शायद आपने देखा होगा कि इस मामले में सबसे ज्यादा नेताम को गरियाने वाले अखबार छत्तीसगढ़ ने भी “प्रवक्ता” के इस आलेख को प्रमुखता से छापा है. आपने शायद गौर नहीं किया कि मैंने बार-बार इस बात का जिक्र किया है कि इस लेख का आशय किसी को क्लीन-चिट देना नहीं है….और ना ही किसी पीड़ित की पीड़ा को कम करके आंकना है.बस आलोच्य घटना के बहाने एक अलग पक्ष को भी सामने रखने का प्रयास किया गया है. ये उसी… Read more »
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