लेखक परिचय

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर धानापुर-चन्दौली (उत्तर प्रदेश) के निवासी हैं। इन्होने समाजशास्त्र में परास्नातक के साथ पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। स्वतंत्र पत्रकार , स्तम्भकार व युवा साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। पिछले पन्द्रह सालों से पत्रकारिता एवं रचना धर्मीता से जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अखबारों , पत्रिकाओं और वेब पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिखते रहते हैं। Mobile- 8081110808 email- mafsarpathan@gmail.com

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child labourएम. अफसर खां सागर
बच्चों को देश का भविष्य माना जाता है। समाज व राष्ट्र के विकास को गति देने के लिए हमेशा से बच्चों को बेहतर शिक्षा व संस्कार देकर जिम्मेदार नागरिक बनाने का प्रयत्न रहा है। मगर आर्थिक विसंगति व गरीबी की वजह से आज भी बहुत से बच्चे बाल श्रम की जंजीरों में जकड़कर बेहतर जिन्दगी के लिए सिसक रहे हैं। गरीब परिवार मजबूरी में काम करने के लिए अपने बच्चों को भेजते हैं वजह साफ है अगर उन बच्चों को काम से हटा दिया जाए, तो न सिर्फ उनके, बल्कि उनके परिवार के भरण-पोषण की समस्या भी आ खड़ी होती है। इसलिए बच्चों को काम से निकालकर शिक्षा दिलाने की योजना बहुत कारगर सिद्ध नहीं हो पा रही है। एक अनुमान के मुताबिक देश में लगभग सवा करोड़ के आसपास बाल श्रमिक हैं। यहां सबसे बड़ा सवाल सरकारों द्वारा चलायी जा रही गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों पर है? गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओं का लाभ प्रत्येक जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचायी जाए, ताकि कोई भी गरीब परिवार परिवार भरण-पोषण के लिए अपने बच्चों के श्रम पर निर्भर न रहे। तब जाकर बाल श्रम के खिलाफ चलने वाली मुहीम को कामयाबी मिल सकती है।

एक आकलन के अनुसार देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या 18 वर्ष से कम उम्र की है। सिर्फ 35 प्रतिशत बच्चों का ही जन्म पंजीकरण हो पाता है। प्रत्येक 16 में से एक बच्चा एक वर्ष की आयु पूर्ण करने के पहले कालग्रस्त हो जाता है और प्रत्येक 11 में से एक बच्चा पांच वर्ष की आयु के पूर्व मौत के आगोश में सो जाता है। दुनिया में कम वजन के साथ पैदा होने वाले कुल बच्चों में से 35 प्रतिशत भारत में पैदा होते हैं। विश्व के सम्पूर्ण कुपोषित बच्चों में से 40 प्रतिशत भारत में हैं। भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने 16 खतरनाक व्यवसायों एवं 65 खतरनाक प्रक्रियाओं में 14 से कम उम्र के बच्चों को रोजगार देने पर प्रतिबंध लगा रखा है। इन प्रतिबंधों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए आज भी लाखों भारतीय बच्चे प्रतिबंधित कार्यों को कर रहे हैं। कुड़ा बीनने, चाय की दुकानों, ढ़ाबों, मोटर-गैराज और घरों में बच्चे बड़ी संख्या में काम करते हुए देखे जा सकते हैं। यहां इन्हें न सिर्फ कम मेहनताना मिलता है, बल्कि इन्हें निरंतर शोषण का भी सामाना करना पड़ता है। महज चन्द रूपयों की खातिर ये बच्चें जिन्दगी की हर ख्यहिशों से महरूम हो जाते हैं।

अगर देखा जाए तो वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 43.36 करोड़ बच्चे हैं। इनमें से 43.5 लाख बाल श्रमिक के रूप में कार्य कर रहे हैं। देश में 14 लाख बच्चे, जिनकी उम्र 6 से 11 वर्ष के मध्य है, वे स्कूल नहीं जा रहे हैं। देश में बच्चों को उचित पोषण नहीं मिल रहा है और बड़ी संख्या में वे कुपोषण के शिकार हैं। भारत में तीन वर्ष से कम उम्र के 46 प्रतिशत बच्चे जहां छोटे कद के हैं, वहीं 47 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं। भारत में शिशु मृत्युदर काफी अधिक है, जो स्वतंत्र भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी सवालिया निशान खड़ा करती है। देश में 40 नवजात प्रति हजार की मृत्युदर यह बताती है कि स्वतंत्रता के छह दशक बाद भी हम बच्चों का उचित पालन-पोषण कर पाने में अक्षम साबित हुए हैं। देश में वर्ष 2013 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 50683 मामले दर्ज किए गए हैं। वास्तव में भारत में इससे कई गुना अधिक संख्या उन आपराधिक मामलों की होती है, जो लापरवाहीवश तथा अन्य कारणों के चलते आधिकारिक रूप से कहीं दर्ज ही नहीं होते। या यूं कह लें कि बच्चों के खिलाफ होने वाले ज्यादातर अपराध छुपे होते हैं कयोंकि वे इसकी शिकायत ही नहीं कर पाते हैं।

हाल ही में भारत सरकार द्वारा जारी आर्थिक जनगणना पर गौर करें तो आज भी देश का तकरीबन 52 फीसदी परिवार दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। लगभग 45 लाख परिवार दूसरों के घरों में काम कर के जी रहा है। चार लाख परिवार कचरा बीनकर और तकरीबन साढ़े छः लाख परिवार भीख मांग कर जीने पर मजबूर है। इसमें वो बाल श्रमिक भी हैं जो परिवार वालों का उनके काम में हाथ बटा रहे हैं। गरीबी की मार झेल रहे ज्यादातर लोग महज जिन्दगी बचाने व परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए अपने बच्चों को काम पर लगाते हैं। कुछ ऐसे मामले भी प्रकाश में आए हैं, जहां माता-पिता ने बहुत थोड़ी रकम के लिए अपने बच्चों को बेचकर ‘बंधुआ मजदूर’ बना दिया। सच यह है कि उन बच्चों की कार्य-स्थितियां अमानवीय हैं। भीषण स्थितियों में काम करने पर भी उन्हें बहुत ही कम मजदूरी मिलती है। वे भोजन की कमी की वजह से कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। इन बच्चों पर ही परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी का बोझ उस वक्त है जब उनकी उम्र स्कूल जाने व खेलने की है। ज्यादातर बंजारा जीवन जीने वाले लोगों के बच्चे कूड़ा बीन कर परिवार का आर्थिक मद्द करते नजर आते हैं। इसके अलावा ग्रामीण भारत के बेसतर आर्थिक रूप से कमजारे परिवार के बच्चे बाल श्रम की जंजीरों में जकड़े हुए हैं।

सरकार व समाज को चाहिए कि बाल श्रम उन्मूलन के कार्यक्रमों को जमीनी स्तर पर कारगर बनाये तथा बाल श्रम के लिए जिम्मेदार असली वजहों की तलाश कर उनके खात्मा के लिए प्रयास करे। बाल श्रम के लिए सबसे जिम्मेदार गरीबी है, जिसके लिए सरकार गरीबी हटाओ के नारों से आगे निकलर कर गरीबी को मिटाने के लिए काम करे। सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे बाल श्रम की दलदल में फंसे बच्चों को चिन्हित कर सरकार की मद्द से उन्हे मुक्त कराने का जोरदार अभियान चलाएं। सिर्फ कैलाश सत्यार्थी जैसे लोग ही नहीं वरन् व्यापारी घरानों व समाज के आर्थिक रूप से सम्पन्न तबके की जिम्मेदार बनती है कि शिक्षा से वंचित बच्चों की मद्द के लिए हाथ बढ़ायें। सरकार द्वारा बाल श्रम के लिए बनाए कानूनों का सख्ती से पालान हो। फूल से कोमल बच्चों के बेहतर भविष्य के सरकार और समाज को आगे आना होगा वर्ना यूंही बाल श्रग के जंजीरों में बचपन सिसकता रहेगा।

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