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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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सुप्रिया साहू

छह साल की पारूल (बदला हुआ नाम) के लिए खुशी का ठिकाना नहीं था। क्योंकि उसका घर और वह दुल्हन की तरह सजी थी। लाल कपड़े में इठलाती पारूल सभी मेहमानों की आकर्षण का केंद्र थी। अतिथियों के आवभगत में उसके माता-पिता काफी व्यस्त थे लेकिन पारूल को सिर्फ इतना पता था कि अपनी सहेलियों के साथ वह जिस तरह गुडडे-गुडि़या की शादी किया करती थी उसी तरह आज उसकी भी शादी होने वाली है। बिहार के मुज़फ्फरपुर के एक छोटे से गांव बसौली की रहने वाली पारूल शादी की परिभाषा और दायित्व से अनजान है। उसके लिए यह किसी उत्सव से कम नहीं है। वह अभी तीसरी क्लास में पढ़ती है और अपने चंचल स्वभाव के कारण गुरूजनों की चहेती है। लेकिन उसे नहीं पता कि विवाह के बाद वह आगे पढ़ पाएगी या अपनी बड़ी बहन की तरह ससुराल वालों की सेवा के नाम पर नौकरानी बना दी जाएगी। दो साल पहले उसकी दीदी की शादी भी उस वक्त हुई थी जब वह आठवीं में पढ़ती थी। अपनी शादी के वक्त उसकी दीदी काफी रोई थी क्योंकि वह आगे पढ़ना चाहती थी। लेकिन माता पिता की गरीबी के आगे उसे मजबूर होना पड़ा। दो वर्ष में वह दो बच्चों की मां बन चुकी है। लेकिन उचित पोशण और ईलाज के अभाव में जच्चा और बच्चा लगातार बीमार रहने के कारण उसके ससुराल वाले मायके में ही छोड़ चुके हैं।

यह दास्तां किसी एक पारूल की नहीं है। बल्कि ऐसी कई पारूल हैं जो कच्ची उम्र में ही ब्याह दी जाती हैं। कहीं संस्कृति के नाम पर तो कहीं दहेज के नाम पर बच्चों से उनका बचपन छिनकर उन्हें विवाह के बंधन में बांध दिया जाता है। बाल विवाह के लिए भले ही राजस्थान का प्रमुख स्थान है। लेकिन हकीकत यह है कि यह कुप्रथा बिहार समेत देश के कई राज्यों में गहराई तक अपनी जड़ें जमाया हुआ है और तमाम प्रयासों के बाद भी इस पर काबू नहीं पाया जा सका है। बच्चों और किशोरियों के अधिकार के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीाय संस्था यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन-2012‘ के अनुसार विश्वच में बाल विवाह के मामलों में 40 प्रतिशत योगदान भारत के हैं। देश में 47 फीसदी लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले ही कर दी जाती है। इनमें 19 फीसदी लड़कियों की उम्र शादी के वक्त 15 वर्ष से भी होती है। जबकि 22 फीसदी लड़कियां 18 वर्ष से पहले ही मां बन जाती हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रति लाख शिशुओं में 4500 बच्चों को जन्म देने वाली माताओं की उम्र औसतन 15 से 19 वर्ष के आसपास होती है। चौंकाने वाली बात यह है कि बाल विवाह के मामले में अब राजस्थान नहीं बल्कि बिहार पहले पायदान पर पहुंच चुका है। यूनिसेफ द्वारा कराए गए राश्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार बिहार में बाल विवाह का स्तर 68.9 प्रतिशत, झारखंड में 63.5 प्रतिशत, राजस्थान में 62.8 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 57.8 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 55.4 प्रतिशत और पष्चिम बंगाल में 53.9 प्रतिशत है। रिपोर्ट में चैंकाने वाली बात यह है कि बिहार के जिन जि़लों में सबसे अधिक बाल विवाह का प्रचलन है उनमें नेपाल की सीमा से सटे पूर्वी और पश्चिम चंपारण, अररिया, गया और नक्सल प्रभावित क्षेत्र जहानाबाद और औरंगाबाद शामिल है। यूनिसेफ की यह रिपोर्ट उस कुरीतियों को बेनकाब करती है जिसे हम ज्यादातर रीति और रिवाज़ तथा परंपरा के नाम पर नजरअंदाज़ कर देते हैं।

बसौली पंचायत के मुखिया चुल्हाई राय कहते हैं कि पंचायत में बाल विवाह सामान्य जीवन का एक हिस्सा है। लड़की के 13 साल होते ही उसकी शादी आम बात है। यानि बाल विवाह को समाज का पूरा समर्थन प्राप्त है। इसके कारण सबसे अधिक लड़की को ही कष्टि सहना पड़ता है। एक तरफ जहां उसे शिक्षा से वंचित कर दिया जाता है वहीं कम उम्र में मां बनने के कारण उसे कई प्रकार की कठिनाईयों का भी सामना करना पड़ता है। उचित पोषण के अभाव में मां और बच्चे दोनों के जीवन को खतरा बना रहता है। सबसे दुखद पहलू यह है कि शादी के अगले कुछ सालों के अंदर ही वह एक के बाद एक वह बच्चों की मां बनती जाती है। ऐसी सूरत में वह न तो अपने बच्चों का उचित लालन पालन कर पाती है और न ही वह स्वंय की देखभाल कर पाती है। साक्षरता के अभाव में दंपति बच्चों के बीच अंतर के फायदे को भी नहीं समझ पाते हैं। हालांकि सरकारी और गैर सरकारी दोनों ओर से परिवार नियोजन के संबंध में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। पुरूशों के लिए जहां सरकार की ओर से मुफ्त नसबंदी प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं वहीं एक गैर सरकारी संस्था ने बच्चों के बीच अंतर रखने के लिए विशेष रूप से बिहार की महिलाओं के लिए ‘डिम्पा‘ शुरू किया है। लेकिन इनका फायदा उस वक्त तक संभव नहीं है जबतक कि जागरूकता को बढ़ावा नहीं मिलता है। हालांकि पूर्व उप मुखिया राम नंदन राय बाल विवाह होने के पीछे प्रमुख कारण अशिक्षा, दहेज और समाज में बढ़ते अपराध को मानते हैं। उनका मानना है कि दहेज के बढ़ते लालच के कारण लोग अपनी लाडली को शादी की आग में झोंक देते हैं, वहीं दूसरी ओर बलात्कार और लड़कियों को भगाने जैसे सामाजिक अपराध के कारण भी अभिभावक कम उम्र में ही अपनी बेटी का ब्याह कर देना उचित समझते हैं।

देश में बाल विवाह को रोकने के लिए कानून भी मौजूद है लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी ख़ामियों के कारण यह अधिक कारगर नहीं हो पाया है। हालांकि केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्रालय ने इस कुप्रथा को जड़ से समाप्त करने के लिए बाल विवाह रोकथाम कानून संशोधन विधेयक 2012 के तहत यह प्रावधान जोड़ने की कोशिश कर रही है कि बाल विवाह होने की सूरत में केवल अभिभावक ही नहीं बल्कि पूरी पंचायत और गांव के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। इसके लिए मुखबिरों की मदद लेने की योजना भी बनाई जा रही है। चूंकि बाल विवाह का प्रचलन शहरों के मुकाबले गांवों में अधिक है। इस बात को ध्यान में रखते हुए मंत्रालय गांव में काम करने वाली आशा कार्यकताओं, एएनएम नर्सों और महिला संगठनों की मदद लेने पर भी विचार कर रही है। बाल विवाह जैसी कुप्रथा को जड़ से समाप्त करने के लिए सबसे अधिक जरूरत समाज की मानसिकता को बदला है। ऐसे में मंत्रालय की यह योजना इस कुप्रथा को रोकने की उम्मीद जगाता है। (चरखा फीचर्स)

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