लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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childशैलेन्द्र चौहान
वर्ष 2007 में महिला और बाल विकास मंत्रालय के द्वारा कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ जिन बच्चों का सर्वेक्षण किया गया उनमें से 53 प्रतिशत ने कहा कि वह किसी न किसी क़िस्म के यौन शोषण के शिकार हुए हैं. अध्ययन से पता चला कि विभिन्न प्रकार के शोषण में पांच से 12 वर्ष तक की उम्र के छोटे बच्चे शोषण और दुर्व्यवहार के सबसे अधिक शिकार होते हैं तथा इन पर खतरा भी सबसे अधिक होता है. इन शोषणों में शारीरिक, यौन और भावनात्मक शोषण शामिल होता है. इस अध्ययन के मुताबिक़ आम धारणा है कि मात्र लड़कियों का ही यौन शोषण होता है. लेकिन इसके विपरीत लड़कों पर भी बराबर ख़तरा रहता है. इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि बड़ी संख्या में शोषणकर्ता ‘भरोसे के और देख-रेख करने वाले लोग’ होते हैं जिनमें अभिभावक, रिश्तेदार और स्कूल शिक्षक, घरेलू नौकर, ड्राइवर, पडोसी आदि शामिल हैं. अध्ययन के अनुसार हरेक तीन में से दो बच्चे शारीरिक शोषण के शिकार बने. शारीरिक रूप से शोषित 69 प्रतिशत बच्चों में 54.68 प्रतिशत लड़के थे. 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे किसी न किसी प्रकार के शारीरिक शोषण के शिकार थे. 20.90 प्रतिशत बच्चों ने गंभीर यौन शोषण का सामना करने की बात कही, जबकि 50.76 प्रतिशत बच्चों ने अन्य प्रकार के यौन शोषण की बात स्वीकारी. पारिवारिक स्थिति में शारीरिक रूप से शोषित बच्चों में 88.6 प्रतिशत का शारीरिक शोषण माता-पिता ने किया. आंध्र प्रदेश, असम, बिहार और दिल्ली से अन्य राज्यों की तुलना में सभी प्रकार के शोषणों के अधिक मामले सामने आये. 50 प्रतिशत शोषक बच्चों के जान-पहचान वाले या विश्वसनीय लोग जिम्मेवार थे. 83 प्रतिशत मामलों में माता-पिता ही शोषक थे. 48.4 प्रतिशत लड़कियों ने कहा कि वे लड़के होते तो अच्छा था. दुनिया में यौन शोषण के शिकार हुए बच्चों की सबसे बड़ी संख्या भारत में है लेकिन फिर भी यहां इस बारे में बात करने में हिचक दिखती है. एक चिकित्सा निदान के रूप में, बाल यौन शोषण पीडोफिलिया (या पेडोफिलिया), को आमतौर पर वयस्कों या बड़े उम्र के किशोरों (16 या उससे अधिक उम्र) में मानसिक विकार या विकृति के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो गैर-किशोर बच्चों, आमतौर पर 13 साल या उससे कम उम्र के प्रति प्राथमिक या विशेष यौन रूचि द्वारा प्रदर्शित होता है। 16 या उससे अधिक उम्र के किशोर शोषकों के मामले में बच्चे को कम से कम पांच साल छोटा होना चाहिए. पीडोफ़ीलिया एक ऐसी स्थिति है जिसे समाज घृणित मानता है लेकिन साथ ही साथ उससे जुड़े मामलों से आकर्षित भी होता है. सामान्यतः पीडोफ़ाइल ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जिसे बच्चों के संपर्क से यौन आनंद मिलता है. पीडोफ़ीलिया की स्थिति उत्पन्न होने के लिए एक वयस्क, एक बच्चा और असहमति से बनाए गए यौन संबंध का होना ज़रूरी होता है.पश्चिम के देशों में इसके शाब्दिक अर्थ को पीडोफाइलों द्वारा, जो अपनी पसंद को दर्शाने के लिए प्रतीकों और कोड का इस्तेमाल करते हैं “बाल प्रेम” या “बाल प्रेमी” शीर्षक के तहत बच्चों के प्रति यौन आकर्षण के रूप में बदल दिया गया है. रोगों के अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण (आईसीडी) ने पीडोफिलिया को “वयस्क व्यक्तित्व और व्यवहार के विकार” के रूप में पारिभाषित किया है, जिसमें छोटे उम्र के किशोरों या बहुत छोटे उम्र के बच्चों के प्रति यौन रूचि होती है। मनोरोग, मनोविज्ञान, स्थानीय भाषा और कानून प्रवर्तन में शब्द की कई परिभाषाओं को पाया गया है. डाइगनोस्टिक एंड स्टेटिसटिकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिसऑर्डर्स (DSM) के अनुसार पीडोफिलिया एक पैराफिलिया है जिसमें एक व्यक्ति छोटे बच्चों की ओर भावुक और बारम्बार यौन आग्रहों की दिशा में कल्पनाशील हो जाता है और जिसके बाद वह या तो यथार्थ में इसे पूरा करते है या जो संकट का कारण होता है या पारस्परिक समस्या होता है. वर्ष 2012 में भारत में बच्चों को यौन हिंसा से बचाने वाला क़ानून (पॉस्को) बनाया गया ताकि बाल यौन शोषण के मामलों से निपटा जा सके लेकिन इसके तहत पहला मामला दर्ज होने में दो साल लग गए. वर्ष 2014 में नए क़ानून के तहत 8904 मामले दर्ज किए गए लेकिन उसके अलावा इसी साल नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने बच्चों के बलात्कार के 13,766 मामले; बच्ची पर उसका शीलभंग करने के इरादे से हमला करने के 11,335 मामले; यौन शोषण के 4,593 मामले; बच्ची को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला या शक्ति प्रयोग के 711 मामले; घूरने के 88 और पीछा करने के 1,091 मामले दर्ज किए गए. ये आंकड़े बताते हैं कि बाल यौन शोषण के अधिकतर मामलों में पॉस्को लगाया ही नहीं गया. बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह क़ानून बहुत अच्छा बना है लेकिन इसके अमल और सज़ा दिलाने की दर में भारी अंतर है. इस पर केवल 2.4 प्रतिशत मामलों में ही अमल हुआ है. राही (रिकवरिंग एंड हीलिंग फ़्रॉम इंसेस्ट) फ़ाउंडेशन- इंसेस्ट और बाल यौन शोषण से लड़ने वाला भारत का पहला संगठन है. इसकी प्रमुख अनुजा गुप्ता कहती हैं अभिभावक सामान्यतः यौन शोषण की बात स्वीकार करने में हिचकते हैं और परिवार के सदस्यों की यौन हिंसा की बमुश्किल कभी शिकायत की जाती है. अनुजा कहती हैं कि ‘ख़ामोशी के इस षड्यंत्र’ के पीड़ितों, उनके परिवारों और संपूर्ण समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं. “ये पूरी तरह असहायता और सदमा पीड़ित को कमज़ोर कर देते हैं. एक बच्चे के लिए आगे आकर यह कहना बहुत मुश्किल होता है कि उसका शोषण किया गया और किसी ने कुछ नहीं किया. यह उनके लिए बहुत हानिकारक होता है.” दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य से एक निर्दलीय सांसद राजीव चंद्रशेखर ने इस समस्या को एक ‘महामारी’ बताते हुए दिल्ली में एक ‘ओपन हाउस’ का आयोजन किया जिसका उद्देश्य था कि ‘हम बाल यौन शोषण के बारे में बात करना शुरू करें और अपने बच्चों को बचाएं.’ “बाल यौन शोषण भारत में महामारी बन चुका है. इस समस्या को गोपनीयता और इनकार की संस्कृति ने ढक रखा है और सरकारी उदासीनता से यह बढ़ी है. ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि बाल यौन शोषण उतने बड़े पैमाने पर नहीं है जितना मैं कह रहा हूं, लेकिन आंकड़े मेरी बात की गवाही देते हैं.” बैंगलुरु, दिल्ली और भारत भर में बच्चों के यौन शोषण के कई हाई-प्रोफ़ाइल मामले सामने आए हैं- यह आश्चर्य की बात भी नहीं है क्योंकि देश में हर तीन घंटे में एक बच्चे का यौन शोषण होता है. इन हैरान कर देने वाले आंकड़ों के बावजूद बाल यौन शोषण पर बात करने की चंद्रशेखर की कोशिशें परवान नहीं चढ़ी हैं. ट्विटर पर महीनों तक उन पर ‘भारत को बदनाम करने के पश्चिमी षड्यंत्र का हिस्सा’ होने का आपोह लगाया जाता रहा. उनका कहना है कि यही बाल यौन शोषण और इंसेस्ट (परिवार के अंदर व्यभिचार) को रोकने की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है. आंध्र प्रदेश, असम, बिहार और दिल्ली से अन्य राज्यों की तुलना में सभी प्रकार के शोषणों के अधिक मामले सामने आये हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में भारत के 13 राज्यों के 12,500 बच्चों पर किए सरकारी सर्वेक्षण का हवाला दिया गया है. इस सर्वेक्षण में पाया गया कि जवाब देने वाले आधे बच्चों ने कहा कि उन्होंने किसी न किसी प्रकार का यौन उत्पीड़न अनुभव किया है. बेहतर होगा कि अभिभावक खुद अपने बच्चों के इस अपराध के बारे में बताने की कोशिश करें. किसी भी बच्चे का पहली क्लास उसका घर होता है और पहली टीचर उसकी मां होती है, इसलिए समय की दरकार के मुताबिक आज की मम्मी को स्मार्टली अपने बच्चों को इस दूषित वातावरण के बारे में समझाना होगा. अभिभावकों को अपने बच्चों को किसी अजनबी से बात करने को, उससे कोई सामान लेने से मना करना होगा. बच्चों को आप गुड टच और बैड टच के बारे में खुलकर बतायें. अभिभावकों को भी अपने नासमझ बच्चों के आगे अपने दांपत्य जीवन के संयमित पहलुओं को दिखाना होगा, कभी भी टीन एज के बच्चों के सामने आप अपनी पत्नी को किस न करें और न ही गले लगायें क्योंकि ऐसा करना उसके ब्रेन को गलत दिशा में मोड़ देगा. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि आप अपने बच्चों के सबसे अच्छे दोस्त बनें. ताकि बच्चे आप से कोई भी बात छुपाये नहीं और अपने साथ हुई हर बात को वो आपसे बेझिझक शेयर करें.

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