लेखक परिचय

वसीम अख़्तर

वसीम अख़्तर

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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भारतीय समाज में औरतों के साथ भेदभाव कोई नई बात नहीं है। इस विषय पर चर्चा परिचर्चा भी खूब होती है। हमारे देश में तो सरकारों ने महिला सशक्तिकरण के लिए अलग से योजनाओं का क्रियान्वयन भी किया है। यहां तक कि घरेलू हिंसा निरोधक कानून को भी अमल में लाया गया है। लेकिन दुःख की बात है कि महिलाओं के साथ भेदभाव का ग्राफ घटने के बजाय और अधिक बढ़ा है। बाहर से भले ही महिलाओं की स्थिति में सुधार के कुछ तत्व दिखाई दे रहे हों जैसे शिक्षा और नौकरियों में उनकी बढ़ती तादाद वगैरह। जनगणना 2011 में महिला-पुरूष लिंगानुपात में सुधार भी हुआ है लेकिन जब नज़र 0 से 6 वर्ष के बच्चों की आबादी पर पड़ती है तो हमें हैरान होना पड़ता है। क्योंकि इस आयु वर्ग में लिंगानुपात पिछले दस वर्षों में असंतुलित हुआ है। 2011 के आंकड़ों के अनुसार बाल लिंग अनुपात 2001 के 927 प्रति 1000 लड़कों की तुलना में 914 प्रति 1000 लड़के दर्ज किया गया। देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में यह अनुपात 2001 के 916 से घटकर 899 दर्ज किया गया। जो राष्ट्रीय स्तर पर -1.40 के नाकारात्मक गिरावट से अधिक -1.86 प्रतिशत। इस असंतुलन को पिछले बीस वर्षों के शैक्षिक, सामाजिक, ग्रामीण और शहरी विकास के संदर्भ में रखकर देखा जाए तो पता चलता है कि विकास के नए सोपानों को तय करने के बाद भी लिंगभेद के विषय पर प्रगतिशील सोच विकसित करने में सफलता नहीं मिल सकी है। शायद यही कारण है कि 0 से 6 वर्ष आयु में लडकियों की संख्या कम हुई है।

यहां मकसद सरकारी और गैर सरकारी आकडों की प्रस्तुति नहीं है बल्कि सामाजिक संदर्भों में लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव की घटनाओं मौजूदा सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में समझना है। विशेषकर उन घटनाओं को जिन्हें समाज भेदभाव मानता ही नहीं है।

पहला उदाहरण उन महिलाओं का जिन्हें घर दहलीज की ज़ीनत समझा जाता है। बेशक 21वीं सदी की दूसरी दहाई में कुछ महिलाओं के नाम जरूर सुने जाते हैं जो उच्च शिक्षा से लेकर व्यापार और राजनीति में अहम भूमिका निभा रही हैं। लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू या तो हम देख नहीं पाते या हमें दिखाया नहीं जाता है। घर के अन्दर रहने वाली औरतों का दर्द सिक्के के इसी पहलू में छिपा होता है। सिक्के का यह पहलू सामाजिक मूल्यों, परंपराओं और संस्कृति के नाम पर छिपाया जाता रहा है।

महिलाओं के शोषण और उन पर होने वाले अत्याचारों को कम करने के लिए प्रीवेन्शन ऑफ डोमेस्टिक वाइलेन्स एक्ट, 2005 जैसा कानून भी प्रवर्तन में है। लेकिन 5 वर्ष बाद भी घरेलू हिंसा की घटनाओं में कोई खास कमी नहीं आई है। विभिन्न रूपों में होने वाला घरेलू हिंसा हर समाज की महिलाओं को झेलना पड़ता है। ये बात अलग है कि यह किसी स्थान पर कम और किसी जगह पर अधिक है। यदि उत्तर प्रदेश की बात करें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश इस दृष्टि से अधिक संवेदनशील है। सामाजिक स्तरीकरण और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर देखा जाए तो हर जाति और धर्म में घरेलू हिंसा किसी न किसी रूप में मौजूद है। जहां तक मुस्लिम समाज का संबंध है तो इस समाज की महिलाओं का जिक्र तलाक, हलाला और परदा से आगे नहीं बढ़ पाता है। बहस का इस दायरे तक सीमित रहना इस बात का प्रमाण है कि सूचना-तकनीक के दौर में शिक्षा, नौकरी और समाज व राजनीति में मुस्लिम महिलाओं की भूमिका काफी सीमित है। इसके कारणों पर विचार करने का पहला दायित्व समुदाय का है। समुदाय चिन्तन करता भी है लेकिन तलाक, हलाला और परदा से आगे नहीं निकल पाता है। इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि अन्य समाजों के लोग इस सवाल पर प्रगतिशील सोच रखते हैं। घरेलू हिंसा के विभिन्न रूपों, माध्यमों और तरीकों पर विभिन्न समुदायों और समाजों के लोगों में मौन सहमति और विलक्षण समानता है। यह समानता लिंग आधारित भेदभाव को बरतने का है। घरेलू हिंसा के विभिन्न स्वरूप प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही रूपों में महिला रूपी मनुष्य के अधिकारों के हनन के कारक होते हैं। कैसे संभव होता है कि एक ही छत के नीचे जन्मने वाले मानव जीवों को लैंगिक पहचान के आधार पर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं और अवसरों से वंचित रखा जाता है। लड़कों के मामले में अवसरों के तमाम दरवाजे खुले रखे जाते हैं। जो दरवाजे बन्द होते हैं उन्हें भी खोलने के लिए हर प्रयास किए जाते हैं। लेकिन लड़कियों के मामले में अवसरों के सीमित दरवाजे ही खोले जाते हैं। यह सब करता भी मनुष्य है। वह मनुष्य जो अपने बच्चों का सबसे बड़ा शुभचिन्तक होता है।

जाहिर है मां-बाप के फैसलों जिनमें पुरूष प्रधानता होती है, से कोई नवजात शिशु लड़का बना दिया जाता है और कोई लड़की। किसी हद तक वैज्ञानिक प्रगति ने भी सामाजिक जड़ता को बढ़ाया है। वैज्ञानिक प्रगति पुरूष सत्ता की मान्यताओं को कमजोर या खत्म करने में नाकाम रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आज भी समाज मनोवैज्ञानिक स्तर पर पुरूष सत्ता के अनुरूप पुत्र-प्रेम और संतानोत्पत्ति से संबंधित पुराने विचारों से आजाद नहीं हो सका है। पुरूष वर्चस्व अपने आस्तित्व को वंश बढ़ाने के लिए बचाए रखने की कोशिश करता है। इस फैसले में महिलाओं की भी सहमति होती है। क्योंकि वह शिक्षित नहीं होती हैं। क्योंकि उन्हें शिक्षा के अवसरों से वंचित रखा जाता है। अवसरों के अभाव में महिलाएं समाजीकरण की प्रक्रिया से अलग-थलग रह जाती हैं। परिणाम स्वरूप उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक भूमिका घर के रसोई तक सीमित रहती है।

लेकिन महिलाओं को रसोई तक सीमित रखने वाला पुरूष सत्तात्मक समाज यह नहीं सोचता की वह गाहे-बगाहे महिलाओं के श्रम से ही सामाजिक पूंजी खड़ी करता है। उदाहरण स्वरूप किसी के घर पर जब अतिथि आते हैं तो उन्हें चाय-पानी से लेकर स्वादिष्ट भोजन कराने और उनके जूठे बरतनों को साफ करने का दायित्व औरतों का ही होता है। इस काम में 8-10 साल की बच्चियां भी अपनी मां के साथ सहायिका की भूमिका में होती हैं।

यह बिन्दु विचारणीय है कि कोई माता-पिता अपनी ही सन्तान के साथ दोहरा रवैया क्यों अपनाता है? ऐसे दौर में जबकि शिक्षा और साक्षरता के ग्राफ में लगातार वृद्धि दर्ज की गयी है, तो ऐसे समय में लिंगभेद की घटनाएं भी निरन्तर बढ़ी हैं। यद्यपि शिक्षा के चलते “हम दो-हमारे दो” के साकारात्मक परिणाम जरूर आए हैं। लेकिन पढ़े-लिखे समाजों में भ्रूण हत्या की घटनाओं का बढ़ता ग्राफ लैंगिक भेदभाव की नयी कहानी बयान करता है। जनगणना 2011 के प्रोविजनल आंकड़े हमें और हमारी सोच को सचेत करने के लिए काफी हैं। यदि अब भी हम मान्यताओं और धारणाओं की कैद से बाहर नहीं निकलेंगे और बच्चियों के जन्म से संबंधित पूर्वाग्रहों को समाप्त करने के लिए जागरूक नहीं होंगे तो हमें बीस बरस बाद आने वाले भयावह परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। लिंगानुपात में असंतुलन कई पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों व घटनाओं को जन्म देता है। ज्ञात हो कि पिछले एक दशक में वयस्क लिंगानुपात में कमोबेश बढ़ोत्तरी के बाद भी लिंगभेद का कांटा हमारे मन मस्तिष्क में कहीं फंसा है। इस कांटे को मन से निकालना नितान्त आवश्यक है। अन्यथा 0 से 6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में असंतुलित लिंगानुपात बीस बरस बाद न जाने कितने भयावह परिणामों को सामने लाएगा।

 

 

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