लेखक परिचय

घनश्याम भारतीय

घनश्याम भारतीय

राजीव गांधी एक्सीलेंस एवार्ड प्राप्त

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घनश्याम भारतीय

वर्तमान जीवन परिवेश में नाना बुराईयां स्थान ले चुकी हैं। आज मानव समाज अगाध लोभ के सागर में डूब चुका है। स्वयं के मनोशारीरिक विकास के लिए अपेक्षित संसाधनों का उपयोग न करके अनुचित प्रदूषित भाव विकारों तथा क्रियाओं से नाता जोड़ता जा रहा हैं। अर्थात जान बूझ कर जहर पी खा रहा है। ‘धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’, ‘तंबाकू से कैंसर हो सकता है’, ‘शराब विष से भी भयंकर है’ जैसी खतरनाक चेतावनी भीे भावी कर्णधारों के डगमगाते कदम नहीं रोक पा रही है। वर्तमान समय में नशाखोरी एक बड़ी समस्या के रूप में उभरी है। जो सर्वाधिक चिंता का विषय है। युवाओं के साथ-साथ नाजुक आयु वाले किशोरों में तेजी से पनपती नशाखोरी उनके वर्तमान के साथ भविष्य को भी चैपट कर रही है। यह वही किशोर हैं जिन्हें भविष्य की धरोहर माना गया है। जो समुचित संरक्षण और आवश्यक मार्गदर्शन के अभाव में पूरी तरह भटक गए हैं। नशे से प्राप्त क्षणिक आनंद के लिए अपनी ही जड़ में जिस तरह ये विष घोल रहे हैं वह आने वाले दिनों के लिए बड़े खतरे का संकेत है। और सरकारें हैं कि वह राजस्व मोह में पड़ी हुई है।

तंबाकू और तंबाकूयुक्त नशीली वस्तुओं के साथ मादक पदार्थों का प्रयोग इन दिनों काफी बढ़ा है। बाजारों में उतनी सब्जी और फल की दुकाने नहीं है जितनी कि नशा की वस्तुओं की हैं। आज वर्तमान पीढ़ी को तमाम शारीरिक समस्याओं का जिस तरह सामना करना पड़ रहा है। उसके पीछे कहीं न कहीं नशे की यही वस्तुएँ प्रमुख कारण हैं। नशे की प्रवृत्ति समाज की भावी पीढ़ी को दीमक की तरह खोखला कर रही है। जिसके पीछे कमोवेश हमीं जिम्मेदार हैं। आखिर हमें कोई कितना बचाएगा, जब हम स्वेच्छा से विषपान कर रहे हैं। प्रौढ़ों की बात यदि छोड़ भी दें तो नशाखोरी का यह शिकंजा किशोरों पर सर्वाधिक हावी है। सभी जातियों, धर्मों के अधिकांश किशोरों की जिंदगी की प्रस्तावना जब नशाखोरी की स्याही से लिखी जा रही है तब उसका उपसंहार कैसा होगा, सोच कर बहुत दुख होता है।

जिंदगी के शुरुआती दौर में जब उनके भविष्य की आधारशिला रखे जाने के साथ-साथ चारित्रिक, कर्मठता,नैतिकता एवम् अन्य मानवीय गुणों के समावेश का वक्त है तब तंबाकू, सिगरेट, बीड़ी, गुटखा, गांजा, भांग से लेकर शराब तक के सेवन की बनती आदत ने किशोरों के समुचित विकास की संभावनाओं को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है। क्योंकि थोड़े ही दिन बाद यही नशा उन्हें अफीम, चरस और स्मैक तक पहुंचा देती है। फिर अपराध की तरफ जाने से उन्हें कोई रोक ही नहीं सकता। आज अनिश्चितता के गर्त में जा रहे इन्हीं किशोरों के हाथों कल जब समाज व राष्ट्र की बागडोर जाएगी तो क्या होगा ? निसंदेह इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि तब राष्ट्र को अंधे मोड़ से निकलने वाली अंधी गलियों में भटकना पड़ेगा। क्योंकि जब आधार ही विकृति का शिकार होगा तब जिंदगी अव्यवस्थित होगी ही। फिर राष्ट्र कैसे व्यवस्थित होगा ?

आज छोटी-बड़ी सभी बाजारों में किराने व पान इत्यादि की दुकानों पर तमाम किश्म के गुटखे, बीड़ी, सिगरेट तो बिक हीं रहे हैं टॉफी के रूप में भांग की गोलियां भी अजीबो-गरीब नाम से खुलेआम बेची जा रही हैं। जिसे खरीदते और खाते किशोरों को कभी भी देखा जा सकता है। और तो और चरस व स्मैक भी बड़ी बाजारों और कस्बों में खाकी के संरक्षण में अवैध रूप से बेचा जा रहा है। चूंकि युवावस्था की दहलीज पर कदम रखने से पूर्व की आयु में नकल करने की प्रवृत्ति अधिक होती है इसलिए बड़ों को नशा करते देख किशोर बतौर टेस्ट पहले लुके-छिपे इसका प्रयोग शुरू करते हैं। आगे चलकर यही नशा उनकी आवश्यकता बन जाती है। फिर शुरू हो जाती है तन और धन की बर्बादी। मौजूदा दौर में गांव के साधारण किशोर से लेकर शहरों में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं तक अधिकांश इस तरह की लत के शिकार हो चुके हैं। शुरुआत में शौक बस की गयी नशा आगे चलकर जब मजबूरी बन जाती है तब बर्बादी सामने खड़ी मिलती है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि  नशे की पराकाष्ठा पर पहुंचने के बाद व्यक्ति की मानसिकता में विकृति आ जाती है। फिर उत्पन्न धनाभाव की स्थिति  नशा सामग्री की पूर्ति के लिए इन्हीं किशोरों को तमाम तरह के गलत रास्ते अख्तियार करने को विवश कर देती है।

मेरे गांव के राजू को ही ले लें। जो महज 15 वर्ष की उम्र में दर्जन भर गुटखा, भांग वाली दो टॉफी, एक बंडल बीड़ी का सेवन प्रतिदिन करता है। गाहे बगाहे शराब का पौवा भी गटक जाता है। बुजुर्ग मंडली के साथ बैठकर गांजे की कश भी लगाता है। इसके अतिरिक्त मेरी जानकारी में एक ऐसा खाता कमाता परिवार भी है जो नशाखोरी के चलते आज भोजन के लिए जूझ रहा है। यह तो उदाहरण मात्र है अपितु इसके शिकार बहुतायत है। यह नशाखोरी सिर्फ ग्रामीण इलाकों तक ही सीमित नहीं है। शहरों में पढ़े लिखे लोगों के बच्चे भी इसके शिकार है। एक अनुमान के अनुसार आधे से अधिक विद्यार्थी भी इस बुरी लत के शिकार हैं। परीक्षा के दौरान उनके जेब की तलाशी में निकलने वाली सामग्री इसका उदाहरण है।

यह नशा सिर्फ गुटखे तक ही सीमित हो ऐसा भी नहीं है। छककर शराब भी पीते हैं और चरस,अफीम व स्मैक का भी प्रयोग करते हैं। मनोवैज्ञानिको का मानना है कि ऐसे किशोर नशा सामग्री के लिए धन की व्यवस्था हेतु न सिर्फ अपराध से की ओर बढ़ते हैं बल्कि तमाम अन्य प्रकार के नैतिक पतन के शिकार भी हो जाते हैं। आगे चलकर मानसिक रोग व कुंठा ग्रस्त होने के बाद आत्महत्या को भी विवश होना पड़ता है। यही नशाखोरी श्रम और शोषण का जरिया भी बनती है। चिकित्सकों का मानना है कि नशाखोरी से मानसिक अस्वस्थता के साथ शरीर के अवयवों की क्रियाशीलता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। और भरी जवानी में बुढा सा दिखने वाला व्यक्ति असमय मौत का शिकार भी हो जाता है। क्योंकि नशाखोरी से किडनी,लीवर निष्क्रिय तो होता ही है मसूड़े व दांत के साथ-साथ निद्रा रोग व मुंह के कैंसर की भी संभावना बढ़ जाती है। लकवा के साथ नपुंसकता के पीछे नशाखोरी कम जिम्मेदार नहीं है।

तम्बाकू उत्पाद के कुप्रभाव को रोकने के लिए सार्वजनिक स्थानांे पर धूम्रपान को अपराध घोषित किया गया है। जिसके उलंघन पर 200 रूपये के जुर्माने का प्राविधान है। दुकानों पर निर्धारित आकार में हानियों को प्रदर्शित करने वाला बोर्ड़ भी लगा होना चाहिए। कम आयु वर्ग को अथवा उसके द्वारा तम्बाकू उत्पाद बेचने को अपराध घोषित किया गया है। नियम तो यहां तक है कि तम्बाकू उत्पाद बिक्री स्थान पर नाबालिग दिखाई भी न पडे़। और शिक्षण संस्थानो के 100 गज के दायरे में ऐसे उत्पादो की बिक्री अपराध है। तम्बाकू उत्पादों के प्रयोग को रोकने के लिए जो नियम कानून बनाये गये हैं उनका वास्तव में पालन नही हो पा रहा है। जिसका परिणाम विकृति के रूप सामने आ रहा है।

किशोरावस्था में नशे की लत के लिए मनोवैज्ञानिक कई कारकों को दोषी ठहराते हैं। जिसमें लापरवाह अभिभावकों द्वारा बच्चों के सामने खुलेआम नशे का सेवन करनाए बच्चों से नशा सामग्री की खरीद फरोख्त कराना प्रमुख है। जो बच्चों के जीवन में जहर घोल रहा है। स्कूलों के अध्यापक भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। वह भी बच्चों से ही ऐसी सामग्री मंगाते हैं और खा पीकर कक्षा में पढ़ाते हैं। हालाकि नशा सामग्री से सरकार को पर्याप्त राजस्व की प्राप्ति होती है। फिर भी किशोर जीवन को इससे बचाने के लिए  स्वैच्छिक संगठनों के साथ सरकार को भी आगे आना होगा। तभी जर्जर होती भविष्य की धरोहर को बचाया जा सकेगा।

 

 

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