लेखक परिचय

लक्ष्मी जायसवाल

लक्ष्मी जायसवाल

दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा एम.ए. हिंदी करने के बाद महामेधा तथा आज समाज जैसे समाचार पत्रों में कुछ समय कार्य किया। वर्तमान में डायमंड मैगज़ीन्स की पत्रिका साधना पथ में सहायक संपादक के रूप में कार्यरत। सामाजिक मुद्दों विशेषकर स्त्री लेखन में विशेष रुचि।

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अल्हड़पन, भोलापन और मासूमियत 
पहचान हैं यह सभी बचपन की, पर 
आज तो बचपन भी एडवांस हो गया है। 
लोरी दिलाती थी बचपन का एहसास 
सुलाती थी मीठे सपनों में और बनाती 
थी हमारी दुनिया को खास, पर आज 
लोरी की जगह ख़त्म हो गयी है जैसे 
वो किसी सुनहरी यादों में खो गयी है। 
अब तो माँ को मॉम कहने वालों की 
दुनिया में गेम्स शामिल हो गयी हैं। 
नहीं भाती आज बच्चों को शरारत
नहीं शौक अब गुड़ियों या खिलौनों 
से खेलकर दिल दिल बहलाने का 
क्योंकि यह सब हो गए आउटडेटिड 
लेटेस्ट गेम है अब बच्चों की दुनिया 
नहीं भागते अब वो तितलियों के पीछे 
न रहा शौक कागज की नाव तैराने का  
लक्ष्य है अब उनका किसी भी तरह से 
गेम्स में हाईएस्ट स्कोर बनाने का। 
न होली की हुड़दंग भाती है और न 
रूठों को मनाने की चाहत बाकी है 
मतलब नहीं अब बचपन को अपने 
भोलेपन, नटखट स्वभाव से क्योंकि 
इस बचपन ने तो अपनी नयी, अलग 
स्मार्टनेस से भरी दुनिया बसा ली है। 
कभी कभी मन दुखी होता है और 
सोचता है कैसा खो गया ये बचपन 
इस प्यारे एहसास के बिना तो जैसे 
लगती है बच्चों की दुनिया बड़ी बेरंग 
इस दुनिया को फिर से दोबारा सजाने
खुशबू से अपनी इन्हें खुशनुमा बनाने 
क्या लौटकर आएंगे बच्चों के जीवन में
बचपन के प्यारे और अल्हड़ पल सुहाने  
क्या समझ पाएंगे आज के बच्चे कि क्या 
होते हैं असल में बचपन के सही मायने। 

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