लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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चीन के अमीरों और कम्युनिस्टों के बीच घनिष्ठ संबंध हैं। चीन के अमीरों में ज्यादातर लोग वे लोग हैं जो कभी सेना में वफादार रह चुके हैं अथवा कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं अथवा किसी कम्युनिस्ट के रिश्तेदार अथवा दोस्त हैं। अथवा कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादार हैं। नयी संपदा के उदय ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की भाषा और सैध्दान्तिकी को बदल दिया है। पहले कम्युनिस्टों का कहना था कि उनका लक्ष्य है सर्वहारा के हितों की रक्षा करना। नया नारा है सत्ता में रहो, ” चीन की अतिविकसित उत्पादक शक्तियों” के हितों का संरक्षण करो। ‘अतिविकसित उत्पादक शक्ति’ से यहां तात्पर्य अमीरों और मध्यवर्ग से है। यह पुराने नजरिए का एकदम उलटा है जिसमें मजदूरों, किसानों और सैनिकों के हितों की रक्षा करने की बात कही गयी थी।

आज चीन में सामाजिक असंतुलन और अव्यवस्था के जो रूप नजर आ रहे हैं वैसे पहले कभी नहीं देखे गए। अचानक समाज में लड़कियों की जन्मदर कम हो गयी है। समाज में बेटा पाने की चाहत और एक संतान के नियम के कारण लड़कियों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। आज स्थिति इतनी भयावह है कि चीन में चार करोड़ लोगों की शादी के लिए कोई लड़की उपलब्ध नहीं है। लिंग असंतुलन का इतना व्यापक कहर पहले कभी चीन में नहीं देखा गया। अनेक समाजविज्ञानी मानते हैं कि लड़कियों की अचानक कमी का प्रधान कारण है औरतों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैयया।

चीनी लोग अमूमन परंपरागत बच्चे और आज्ञाकारी बच्चे पसंद करते हैं। लड़की की तुलना में लड़के को तरजीह देते हैं। चूंकि एक ही संतान का नियम है अत: पहली संतान के रूप में लड़का ही चाहते हैं इसके कारण असंतुलन और भी बढ़ा है। समाजविज्ञानियों का अनुमान है कि यदि यही सिलसिला जारी रहा तो सन् 2020 तक आते-आते लड़कों के लिए लड़कियां मिलना मुश्किल हो जाएंगी। चीनी लोगों में लड़के की चाहत का एक अन्य

कारण यह मान्यता भी है कि लड़कियों की तुलना में लड़के श्रेष्ठ होते हैं। इस मान्यता को बदलना बेहद मुश्किल है।

किसी भी देश में नव्य उदारतावादी अर्थव्यवस्था लागू होगी तो आम लोगों का सेक्स और औरत के प्रति नजरिया भी बदलेगा। किसी भी देश में सेक्स और स्त्री के प्रति क्या नजरिया है यह अर्थव्यवस्था की प्रकृति से तय होता है। अर्थव्यवस्था और सेक्स के अन्तस्संबंध को विच्छिन्न भाव से नहीं देखना चाहिए। चीन में आए आर्थिक खुलेपन ने सेक्स के प्रति खुलेपन को, ज्यादा उदार नजरिए को हवा दी है।

माओ के जमाने में सेक्स टेबू था, आज चीन में सेक्स टेबू नहीं है। बल्कि टेबू से बाहर निकलने की कोशिशें ज्यादा हो रही हैं। आम लोगों में टेबुओं के प्रति घृणा सामान्य बात है।

‘चाइना डेली'(12मई 2008) में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि विशेषज्ञों की नजर में चीनी लोग सेक्स के प्रति ज्यादा उदार हैं। पेन सुई मिंग (निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ सैक्सुअलिटी एंड जेण्डर, रींमीन विश्वविद्यालय ,चीन) ने कहा है आज चीन में एकाधिक व्यक्ति से शारीरिक संबंध रखने वालों की चीन में संख्या पच्चीस फीसद है। इसके कारा यह बहस छिड़ गयी है कि क्या चीनी नैतिक तौर पर भ्रष्ट होते हैं ?

पेन का कहना है एकाधिक सेक्स पार्टनर का होना सेक्स क्रांति का प्रतीक है। चीनी नागरिकों में खुला और पारदर्शी कामुक रवैयया पैदा हो रहा है। सन् 2000-2006 के बीच में किए गए सेक्स सर्वे बताते हैं कि आम लोगों में सेक्स और समलैंगिक सेक्स दोनों में ही इजाफा हुआ है। जिस तरह दो अंकों में अर्थव्यवस्था की विकास दर बढ़ी है उसी तरह दो अंकों में सेक्सदर में भी इजाफा हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में एक से अधिक के साथ सेक्स करने की परंपरा में इजाफा हुआ है। सन् 2000 में ऐसे लोगों की संख्या 16.9 प्रतिशत थी, इसमें सन् 2006 तक सात फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। सन् 1980 में जब आर्थिक सुधार लागू किए गए थे तो उस समय ऐसे लोगों की संख्या छह प्रतिशत थी। महज तीस सालों में एक से अधिक स्त्री या पुरूष के साथ शारीरिक संबंध रखने वालों की संख्या का छह प्रत%

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