लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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Rawal_Ratan_Singh_Ruler_of_Mewarकर्नल टॉड का कहना है…कर्नल टॉड ने बियाना के युद्घ पर प्रकाश डालते हुए लिखा है:- ‘‘बाबर दिल्ली का राज्य प्राप्त करके बड़ी बुद्घिमानी के साथ सैनिक शक्तियों का संगठन करता रहा और उसके पश्चात पंद्रह सौ सैनिकों की एक सेना लेकर संग्राम सिंह से युद्घ करने के लिए वह आगरा और सीकरी से रवाना हुआ। राजस्थान के लगभग सभी राजा और मेवाड़ राज्य के सामंत अपनी सेनाएं लेकर चित्तौड़ में पहुंच गये। सबके साथ राणा संग्रामसिंह बाबर से युद्घ करने के लिए चित्तौड़  से आगे बढ़ा। कार्तिक महीने की पंचमी संवत 1584 सन 1528 ई. को राजपूत सेना ने बयाना पहुंचकर बाबर की सेना का रास्ता रोका और खानवा नामक स्थान के मैदान में संग्रामसिंह की सेना ने बादशाह बाबर की फौज का सामना किया। दोनों ओर से संग्राम अचानक हो गया। राजपूतों की विशाल सेना के द्वारा बाबर की फौज लगभग सारी काट डाली गयी। राजपूतों की शक्तिशाली सेना के सामने बाबर की फौज बुरी तरह से प्रभावित हुई। राजपूतों की विशाल सेना के द्वारा जिस प्रकार बाबर के सैनिक मारे गये और दो बार बाबर संग्रामसिंह के मुकाबले में पराजित हो चुका था उसके कारण बाबर की सेना का साहस पूर्णत: शिथिल पड़ गया।’’
कर्नल टाड हमें आगे बताते हुए स्पष्ट करता है कि राणा संग्राम सिंह को बाबर की पराजित सेना का पीछा करके उसे समाप्त कर देना चाहिए था। उसी के शब्दों में ‘‘बाबर की सैनिक निर्बलता का राणा संग्राम सिंह ने कोई  लाभ नही उठाया, नही तो उसने तातारी सेना का सर्वनाश करके बादशाह बाबर को सरलता से भारत के बाहर निकाल दिया होता।’’

राणा के पश्चात चला उत्तराधिकार का युद्घ

राणा संग्राम सिंह की मृत्यु के पश्चात उसके उत्तराधिकार का युद्घ आरंभ हो गया। कर्नल टॉड का कथन है कि-‘‘राणा संग्राम सिंह के भी अनेक रानियां थीं। राणा के मरने के पश्चात सभी रानियां अपने-अपने लडक़ों को राज्य सिंहासन पर बिठाने का प्रयास करने लगीं। एक रानी ने तो अपने लडक़े को उत्तराधिकारी बनाने के लिए यहां तक किया कि उसने बादशाह बाबर के साथ मेल कर लिया। उसका विश्वास था कि इस मेल के फलस्वरूप मेरे लडक़े को चित्तौड़ के राज्यसिंहासन पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त होगा। अपने इस उद्देश्य की पूत्ति के लिए उसने बाबर को प्रसन्न करने के लिए भरपूर चेष्टा की। इसके लिए उसने रणथंभौर का प्रसिद्घ दुर्ग और विजय में पाये हुए मालवा राज्य के बादशाह का ताज भी बाबर को भेंट में देना निश्चित किया।’’

चित्तौड़ का गौरव होने लगा धूमिल

इस प्रकार मेवाड़ के गौरव के सूर्य राणा संग्राम सिंह के निधन के उपरांत चित्तौड़ राज्य ग्रहण का शिकार होने लगा। जिस गौरव को पीढिय़ों के संघर्ष के उपरांत राणा संग्राम सिंह और उनके पूर्ववत्र्तियों ने प्राप्त किया था, वह अपने ही लोगों के कलह और कटुता के कारण अब कलंकित हो रहा था। राणा की विभिन्न रानियों से उसके कुल सात पुत्र थे। इन सातों में से सबसे बड़े दो पुत्रों का देहांत हो गया था। ऐसी परिस्थितियों में तीसरे स्थान के पुत्र का राजा बनना निश्चित हुआ, जिसका नाम राणा रतन सिंह था।

दामोदर लाल गर्ग ने राणा संग्राम सिंह की मृत्यु तिथि 30 जनवरी 1528 बतायी है, और राणा रतन सिंह के राज्यारोहण की तिथि 5 फरवरी 1528 बतायी है। राणा रतन सिंह 1528 ई. में चित्तौड़ के सिंहासन पर बैठा। राणा रतन सिंह को अपने पिता से उत्तराधिकार में राज्यादि के ऐश्वर्य के अतिरिक्त मातृभूमि के ऋण से उऋण होने के लिए स्वतंत्रता प्रेमी भावना भी यथावत प्राप्त हुई थी, जिसे राणा भली प्रकार जानता था।

मेवाड़ का शासक बनना उस समय बहुत ही गौरव की बात होती थी। कुछ सीमा तक कई विषयों में तो भारत के कितने ही शासक राणा परिवार की ओर बड़ी आशा पूर्ण दृष्टि से देखा करते थे, और उसे अपने समस्त राजपरिवारों का सिरमौर भी स्वीकार करते थे। राणा संग्राम सिंह ने मेवाड़ के गौरव को और भी अधिक बढ़ा दिया था। इसलिए राणा रतनसिंह का उत्तरदायित्व और भी अधिक बढ़ गया था।

राणा रतनसिंह ने समझा अपने दायित्वों को

राणा रतनसिंह ने अपने उत्तर दायित्वों को समझा और उसने यह भी देखा कि देश की स्वाभिमानी हिंदू जनता की उससे क्या अपेक्षाएं हैं? इसलिए उसने सिंहासनारूढ़ होते ही प्रतिज्ञा की कि मैं मेवाड़ राज्य के सम्मान तथा उत्थान के लिए आजीवन प्रयासरत रहूंगा। ये शब्द बड़े ही मार्मिक, संतुलित और परिस्थितियों के दृष्टिगत बहुत ही आवश्यक भी थे।

जब मेवाड़ का सिंहासन राजनीति और कलह, कटुता के कारण उपहास का पात्र बन रहा था-तब मेवाड़ की प्रजा और वहां के सरदार सामंतों को ऐसे ही शब्दों की आवश्यकता थी। राणा के शब्दों में ओज भी था और तेज भी था देश, भक्ति भी थी और कत्र्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण भी था। वह संकल्प का धनी था और धीर-वीर गंभीर प्रकृति का वीर पुरूष था।

राणा भटक गया मार्ग से

राणा रतन सिंह से मेवाड़ को कुछ आशाएं बंधी थीं, और सबको लग रहा था कि वह निश्चय ही अपने पिता की खोयी हुई प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित करेगा। पर राणा भटक गया और उसका क्षत्रियत्व व्यर्थ की उलझनों में उलझकर यूं ही नष्ट हो गया।

राणा जब बहुत छोटा था तब उसने आमेर के राजा पृथ्वी सिंह की लडक़ी से विवाह  कर लिया था। यह विवाह गोपनीय रूप से किया गया था, जिसकी जानकारी उस लडक़ी के और राणा के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति को नही थी। जब वह लडक़ी विवाह योग्य हुई तो उसका विवाह उसके पिता ने बूंदी नरेश सूरजमल के साथ कर दिया था।

राणा करने लगा सूरजमल से घृणा

बस यह लडक़ी और यह विवाह ही राणा की भटकन और उसके जीवन के अंत होने का प्रमुख कारण बना। इस सूरजमल की बहन राणा रतन सिंह को ब्याही थी, इसलिए सूरजमल से राणा रतन सिंह के निकट के गहरे संबंध थे। पर राणा ने अपने इस निकट संबंधी से ही एक पक्षीय ईष्र्या और घृणा पाल ली थी। अत: एक दिन (अहेरिया उत्सव के अवसर पर) राणा रतन सिंह सूरजमल और अपने कुछ अन्य सामंतों को लेकर उत्सव मनाने के लिए शिकार खेलने हेतु जंगल में गया।

राणा ने किया सूरजमल पर प्राणघातक हमला

राणा जानबूझकर सूरजमल को बीहड़ और भयानक निर्जन जंगल में ले गया। एक अवसर ऐसा आया कि जब राणा और सूरजमल के अतिरिक्त अन्य कोई साथ नही रहा। तब राणा ने अपनी घृणा को शत्रुता में परिवर्तित कर शत्रु को समाप्त करने का अच्छा अवसर समझा और उसने सूरजमल पर अपनी तलवार का वार कर दिया। राणा के इस आकस्मिक और अप्रत्याशित हमले के प्रति सूरजमल पूर्णत: असावधान था, क्योंकि उसे इस प्रकार के किसी आक्रमण की दूर दूर तक भी संभावना नही दिख रही थी।

सूरजमल हो गया सावधान

सूरजमल ने जैसे ही अपने प्रति राणा के व्यवहार में भारी परिवर्तन देखा तो उसने राणा की तलवार के वार को किसी प्र्रकार अपने ऊपर से खाली जाने दिया। यद्यपि वह इस वार से बचने में घोड़े से गिर गया, पर वह वीरों की भांति संभला और उठकर राणा से युद्घ करने लगा। उस समय वहां पर इन दोनों के अतिरिक्त कोई नही था। दोनों में युद्घ होने लगा। भारत की आत्मा चीख उठी, उसे ये देखकर अत्यंत ग्लानि हुई कि उसके दो योद्घा एक नारी को लेकर लड़ रहे हैं, और उनमें से एक का जो कि प्रमुख है, उस नारी पर अधिकार जताना तो नितांत अशोभनीय और अतार्किक है। भारत के क्षत्रिय धर्म के पतन का ज्वलंत उदाहरण था इन दोनों का युद्घ।

रतन सिंह का हो गया जीवनांत

कुछ ही क्षणों में साथ जीने मरने के लिए गये संकल्प शत्रुता में परिवर्तित हो गये और दोनों एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो गये। राणा सोचता था कि अकेले में जाकर पृथ्वीराज (सूरजमल) को समाप्त कर दूंगा और राजप्रासाद पहुंचकर उसकी रानी को बलात हथिया लूंगा, पर उसका यह सपना सपना ही रह गया। राणा पर सूरजमल ने अंत में एक प्रबल प्रहार किया और उसका जीवनांत कर दिया।

इस प्रकार राणा रतन सिंह के जीवनांत के इस दृश्य के साथ ही मेवाड़ के अनेकों लोगों की उन भावनाओं पर तुषारापात हो गया, जिन्होंने राणा रतनसिंह के भीतर किसी दूसरे ‘राणा संग्राम सिंह’ को देखना चाहा था। इसमें कोई संदेह भी नही था कि राणा रतन सिंह अपने पिता के समतुल्य था, पर उसकी ऊर्जा का अपव्यय हुआ और निजी जीवन का एक प्रबल दोष ही उसके जीवन पर ‘कलंक’ लगा गया।

हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन के विषय में ‘नेहरूवादी’ सोच के लोगों की यह धारणा या मान्यता नितांत भ्रामक और मिथ्या है कि व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन अलग होता है और सार्वजनिक जीवन अलग होता है। इसके विपरीत सच ये है कि व्यक्ति का व्यक्तिगत चरित्र ही उसके सार्वजनिक जीवन की नींव होता है। व्यक्ति व्यक्तिगत जीवन में जितना सिद्घांतप्रिय, कत्र्तव्यनिष्ठ चारित्रिक गुणों से संपन्न होता है, उसका सार्वजनिक जीवन भी उतना ही उन्नत और महान होता है। राणा रतन सिंह यदि अपने व्यक्तिगत जीवन में कठोर सिद्घांतप्रिय होता तो वह अपने पिता के अधूरे कार्यों को पूर्ण करने में भी सफल होता।

विक्रमाजीत बना अगला राणा

राणा रतन सिंह की मृत्यु के उपरांत चित्तौड़ के राज्य सिंहासन पर राणा सांगा की पत्नी राणी कर्मवती का ज्येष्ठ पुत्र विक्रमाजीत आरूढ़ हुआ। यह व्यक्ति बहुत ही निकृष्ट था और वह अवगुणों की खान था। वह सर्वथा छोटे और निकृष्ट लोगों में बैठकर ही प्रसन्न रहता था, जिससे उसके अपने लोग अप्रसन्न रहते थे और उसके निम्न स्तरीय लोगों के साथ उठने बैठने और हंसने बोलने को अभद्रता का प्रतीक माना करते थे। विक्रमाजीत आलसी और अकर्मण्य भी था।

राणा के इन सब दुर्गुणों के कारण मेवाड़ राज्य में अराजकता फैलने लगी। लोगों में शासन का कोई भय नही रहा और उच्छ्रंखलता सर्वत्र व्याप गयी। पर्वतों पर रहने वाले जंगली लोग राज्य के सिपाहियों तक को लूट पीट लेते थे। जिससे मेवाड़ की शक्ति क्षीण होने लगी। फलस्वरूप गुजरात का मुस्लिम शासक बहादुरशाह मेवाड़ पर गिद्घ दृष्टि लगाने लगा और उसे हड़पकर अपने राज्य में मिलाने के सपने लेने लगा। गुजरात के मुस्लिम शासक की इस योजना में मालवा केे शासक ने भी अपना सहयोग प्रदान किया।

चित्तौड़ पर छा गये संकट के बादल

चित्तौड़ भारत के गौरव और स्वाभिमान का नाम है। उसके नाम से आज भी हर भारतीय को गौरवानुभूति होती है। इसी चित्तौड़ पर अब संकट के बादल छा गये थे। चारों ओर से शत्रु घात लगाये बैठे थे और वहां का शासक पूर्णत: निकम्मेपन का प्रतीक बन गया था। यद्यपि जब विक्रमाजीत को बहादुरशाह के आक्रमण का ज्ञान हुआ तो उसने भी चित्तौड़ में युद्घ  की तैयारियों आरंभ कर दीं, परंतु उन तैयारियों में और अब से पूर्व राणा संग्राम सिंह और उनके पूर्ववर्ती पराक्रमी राणा शासकों के काल की तैयारियों में आकाश पाताल का अंतर था। चित्तौड़ अपने शासक की अयोग्यता और अकर्मण्यता से चिंतित थी।

जिस कारण विक्रमाजीत के सैनिकों तक का विश्वास उससे उठ गया था। राणा विक्रमाजीत ने इसके उपरांत भी बहादुर नामक बादशाह से युद्घ करना आरंभ कर दिया। यह युद्घ बूंदी राज्य के लैचा नामक मैदान में हुआ। राणा को बादशाह बहादुर ने पराजित कर दिया और वह चित्तौड़ का चीर हरण करने के लिए उसकी ओर निष्कंटक बढऩे लगा।

हिंदुओं ने किया प्रतिकार

गुजरात के मुस्लिम बादशाह की चित्तौड़ की ओर यह बढ़त निश्चय ही देशभक्त राजपूतों और हिंदुओं के लिए लज्जाजनक थी। जिसे किसी भी मूल्य पर स्वीकार नही किया जा सकता था।

राणा संग्राम सिंह ऐसे बना था चित्तौड़ का शासक

अब थोड़ा पीछे चलें। राणा कुम्भा का वध उसी के पुत्र ऊदा ने कर दिया था। जिसके कारण ऊदा इधर-उधर भटक रहा था। वह अपनी दृष्टि में ही अपराधी था। कुम्भा की मृत्यु के पांच वर्ष पश्चात उसका लडक़ा रायमल सिंहासनरूढ़ हुआ। यह घटना 1474 ई. की है। उसने ऊदा को दंडित करने का निर्णय लिया। जब ऊदा को इस बात का पता चला तो वह दिल्ली के बादशाह से मिला, और शाही सेना की सहायता से उसने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। उसकी सेना में ग्यारह हजार पैदल और अट्ठावन हजार सवार सैनिक थे। चित्तौड़ के राणा रायमल ने ऊदा की शाही सेना के साथ घासा नामक स्थान पर युद्घ किया और स्वतंत्रता के अपहर्ता ऊदा और शाही सेना को पराजित किया। ऊदा ने राणा की अधीनता स्वीकार कर ली।

बढ़ता गया कलह

राणा रायमल के तीन लडक़े थे सांगा, पृथ्वीराज और जयमल। रायमल का शत्रु सूरजमल इन तीनों को परस्पर लड़ाता रहता था, जिससे कि वह रायमल के पश्चात शासन का उत्तराधिकारी बन सके। फलस्वरूप ये तीनों लड़ झगडक़र इधर-उधर निकल गये। पृथ्वीराज और सांगा में भयंकर संघर्ष हुए। पृथ्वीराज ने भागकर अपने बाहुबल से मीणा लोगों के राज्य पर अधिकार कर लिया, जबकि सांगा का कोई अता-पता नही था, कि वह कहां गया। तब रायमल ने पृथ्वीराज को अपने पास बुला लिया। राणा का एक लडक़ा जयमल पहले ही मार दिया गया था। सूरजमल को पृथ्वीराज का चित्तौड़ में आकर रहना अच्छा नही लग रहा था। उसने नया षडयंत्र रचाा। वह एक सारंगदेव नाम के राजपूत को साथ लेकर मालवा के बादशाह मुजफ्फर के पास गया, और उससे सैनिक सहायता प्राप्त कर चित्त्तौड़ पर आक्रमण करने की अपनी योजना से उसे अवगत कराया। जिसे सुनकर मुजफ्फर संघर्ष के लिए तैयार हो गया।

सूरजमल ने सारंगदेव के साथ मिलकर किया चित्तौड़ पर आक्रमण

सूरजमल ने सारंगदेव के साथ मिलकर चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। यह आक्रमण राज्य के दक्षिण के भागों पर किया गया था। इस युद्घ का सामना करने के लिए मेवाड़ के जनजन में स्वतंत्रता की भावना का संचार दो मेवाड़ के जन जन में स्वतंत्रता की भावना का संचारहो उठा और वे अपनी स्वतंत्रता की रक्षार्थ उठ खड़े हुए। रायमल स्वयं एक बड़ी सेना लेकर सूरजमल की सेना का सामना करने के लिए चल पड़ा। भयानक युद्घ हुआ। यह युद्घ चित्तौड़ राज्य के समीप बहती हुई गंभीरी नाम की नदी के तट पर हुआ।

राणा रायमल को युद्घ में 22 घाव लगे, पर वह वीरता से स्वतंत्रता के अपहर्ताओं के साथ युद्घ करता रहा। जब राणा युद्घ में अकेला पड़ता जा रहा था, तभी संयोग से सही समय पर पीछे से पृथ्वीराज अपनी सेना के साथ आ धमका। उसने अपने पिता को सावधानी से युद्घ से बाहर कर दिया और स्वयं स्वतंत्रता का संघर्ष करने लगा। उसकी मार से शाही सेना के छक्के छूटने लगे और सूरजमल भी घायल हो गया। पहले दिन का युद्घ समाप्त हो गया।

शाही सेना परास्त हुई

अगले दिन पुन: युद्घ आरंभ हुआ सारंगदेव ने इस दिन चित्तौड़ के अनेकों सैनिकों का वध किया। पर कुछ देर में वह स्वयं भी गंभीर रूप से घायल हो गया। पृथ्वीराज की तलवार से सारंगदेव को 35 घाव हुए। परिणामस्वरूप चित्तौड़ को परास्त कर भारत की स्वतंत्रता को अपहृत करने का शाही सेना का सपना टूट गया और वह परास्त होकर भाग गयी।

अब पृथ्वीराज को अपने भाई सांगा के प्रति प्रेम उपजा और वह सारी वस्तुस्थिति से अवगत होकर उसे ढूंढने लगा। पर कमलमीर के निकट जाकर वह अपने बहनोई के षडय़ंत्र का शिकार होकर मृत्यु को प्राप्त हो गया। तब इन विषम परिस्थितियों में राणा संग्रामसिंह मेवाड़ का शासक बना था।

बादशाह बहादुर शाह का आक्रमण और चित्तौड़

सूरजमल को यद्यपि पृथ्वीराज के द्वारा परास्त कर दिया गया था, परंतु उसके हृदय में विद्रोह की ज्वाला इसके उपरांत भी धधकती रही। उसने चित्तौड़ से निराश होकर मेवाड़ राज्य के बाहर देवल नगर बसाया था। अब जब चित्तौड़ पर बादशाह बहादुर ने आक्रमण किया तो खेल के तत्कालीन शासक (जो कि सूरजमल का वंशज था) के हृदय में स्वाभाविक रूप से मेवाड़ के प्रति भक्ति भाव जाग उठा। उसे लगा कि चित्तौड़ पर किया गया आक्रमण उसके पूर्वजों का तथा उसका स्वयं का भी अपमान है। पूरे मेवाड़ में देशभक्ति का वातावरण था, सभी लोग अपने राणा के साथ थे, खेल के राजा के भीतर जागी देशभक्ति ने और भी अच्छा कार्य किया और देशभक्ति का ज्वार और भी तेज हो गया।

बूंदी ने भी दिया साथ

खेल नरेश तो चित्तौड़ की सहायता के लिए चला ही, बूंदी का राजकुमार भी अपनी सेना को साथ लेकर चित्तौड़ की ओर चल दिया।  सोनगरे और ऐसे ही अन्य कई स्थानों के राजा सरदार सामंत आदि चित्तौड़ की सहायतार्थ आ पहुंचे।

कर्नल टॉड कहते हैं कि-‘‘बादशाह बहादुर का हमला अब तक के सभी मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमणों की अपेक्षा अधिक भयानक था। उसकी सेना में एक यूरोपियन गोलंदाज भी था। जिसका नाम लाबी खां था। उसी की सहायता से बादशाह चित्तौड़ का विध्वंस करने लगा।

चित्तौड़ में भयंकर मारकाट मच गयी। राजपूतों ने बड़ी वीरता से युद्घ किया। परंतु लाबी खां की योजना के सामने उनको भारी हानि उठानी पड़ी। लाबी खां ने युद्घ स्थल के निकट एक सुरंग खोदी और उसमें आग लगा दी। जिससे एक विस्फोट हुआ और उस विस्फोट में बड़ी संख्या में हिंदू सेना मारी गयी। चित्तौड़ दुर्ग भी कई स्थानों पर टूट गया। राजपूत सेना में भागम भाग मच गयी। राणा की ओर से दुर्गाराव नामक योद्घा ने अपनी सेना का साहस बढ़ाया और वह जमकर युद्घ करने लगा, इसी समय सिसोदिया वंश की रानी जवाहर बाई ने युद्घ में प्रवेश किया और उसने भी अनेकों शत्रुओं को अपने भाले से मार डाला। अंत में वह स्वंय वीरगति को प्राप्त हो गयी।’’

तत्पश्चात सूरजमल के वंशज बाघ जी ने भीषण युद्घ किया पर तब तक राजपूत सेना का बड़ी संख्या में विनाश हो चुका था। चित्तौड़ बड़ी संकटमय स्थिति में फंस चुकी थी।

तब कुछ लोगों ने अनुमान लगा लिया कि अब युद्घ का परिणाम हमारे विरूद्घ ही जा सकता है। कर्नल टॉड का कहना है कि रानी कर्णवती ने उस समय मुगल बादशाह हुमायूं के लिए पत्र लिखा और उस समय राखी का पर्व निकट होने के कारण उसे अपनी ओर से राखी भेजकर एक बहन के रूप में उससे सहायता की याचना की। उधर चित्तौड़ के सरदारों ने किले में जौहर की व्यवस्था कर डाली। रानी कर्णवती ने पर्याप्त समय तक हुमायूं की प्रतीक्षा की, परंतु उसके आने में विलंब होता देख रानी ने अपनी तेरह हजार सहेलियों के साथ मिलकर जौहर कर लिया।

45 हजार वीर वीरांगनाओं ने किया बलिदान

इस युद्घ में बत्तीस हजार हिंदू सैनिक अपनी स्वतंत्रता के लिए हुतात्मा हुए। रानी की सहेलियों की संख्या इससे अलग थी। जिन्हें मिलाकर 45 हजार वीर वीरांगनाओं ने स्वदेश स्वधर्म और स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान दिया था। गुजरात का बहादुरशाह चित्तौड़ के पतन से प्रसन्न होकर उसमें पंद्रह दिन तक आनंदोत्सव मनाता रहा।

हुमायूं ने विक्रमाजीत को पुन: गद्दी पर बैठाया

जब हुमायूं के आगमन का समाचार बहादुरशाह को मिला तो यह भयभीत हो उठा और चित्तौड़ छोडक़र भाग गया।  हुमायूं ने चित्तौड़ के राज्यसिंहासन पर पुन: विक्रमाजीत को आसीन कर दिया। पर दरबार के अधिकांश सरदार उससे प्रसन्न नही थे। वह अयोग्य था और कई दुव्र्यसनों से ग्रस्त था। इसलिए सरदारों ने पृथ्वीराज के पुत्र बनवीर की खोज की और विक्रमाजीत को हटाकर उसे शासक बना दिया। इसी बनवीर ने एक दिन विक्रमाजीत की हत्या कर दी थी और जब वह विक्रमाजीत की हत्या कर आगे बढ़ा तो चित्तौड़ की लाज बचाने के लिए पन्नाधाय ने अपने प्राणप्रिय पुत्र चंदन का बलिदान दिया था। उसका उल्लेख हम आगे चलकर करेंगे। उदयसिंह रानी कर्णवती का पुत्र था, रानी ने अपने जौहर से पूर्व अपने बालक उदयसिंह की रक्षा का दायित्व पन्ना को ही दिया था। रानी कर्णवती राणा सांगासिंह की ही रानी थी और उदयसिंह राणा का पुत्र था।

हुमायूं रानी की रक्षा के लिए नही आया था?

जहां तक हुमायूं के द्वारा सहायता देने की बात है तो इस पर अब अधिकांश विद्वानों का मत है कि हुमायूं उसकी रक्षा के लिए नही आया था, हुमायूं को राखी भेजने और उस पर हुमायूं द्वारा रानी की रक्षार्थ प्रस्थान करने की कथा अब स्पष्टत: केवल चारण लोगों का प्रलाप ही लगता है। इसे इसलिए प्रमुखता दी गयी है, जिससे कि हिंदू मुस्लिम दोनों समुदायों के मध्य कटुता को शांत कर एक ‘धर्मनिरपेक्षी’ परिवेश बनाया जा सके।

क्रमश:

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