लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी-

State-Education---Generic-jpgशिक्षा का मुख्य उद्देश्य ही यही है कि वह विद्यार्थी को इस योग्य बनाए कि छात्र और छात्राएं अध्ययन समाप्ति के बाद भारतीय परंपरा में जो चार पुरुषार्थ बताए गए हैं, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष इनकी परस्पर पूर्ति कर सकें। किंतु यदि शिक्षा प्राप्ति के बाद भी बेरोजगारी, समाज में विसंगतियां बनी रहें, किसी राष्ट्र का निर्माण जिस गति से होना चाहिए, वह नहीं हो पाए, तो निश्चित ही शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़े होना लाजिमी है। यदि देश की पूर्व से वर्तमान तक की शिक्षा पद्धति की बात की जाए तो प्राचीन भारत में 13 विश्वविद्यालय शिक्षा में उत्कृष्टता के स्तर पर इतने श्रेष्ठ थे कि जहां पढ़ने दुनियाभर से विद्यार्थी आते थे। नालंदा और तक्षशिला के अलावा उस समय विक्रमशीला, वल्लभी, उदांत पुरी, सोमपुरा, पुष्पगिरी जगददला, नागार्जुनकोंडा, वाराणसी, कांचीपुरम, मणिखेत, शारदा पीठ शिक्षा के मंदिर थे।

यही कारण है जो भारत में वैदिक काल से ही शिक्षा को बहुत महत्व दिया गया। उस काल में गुरुकुल और आश्रमों के रूप में शिक्षा केंद्र खोले गए थे। गुरुकुल और आश्रमों से शुरू हुआ शिक्षा का सफर उन्नति करते हुए आगे विश्वविद्यालयों में तब्दील होता गया। 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच भारत पूरे विश्व में शिक्षा का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध केंद्र रहा है। गणित, ज्योतिष, भूगोल, चिकित्सा विज्ञान के साथ ही अन्य विषयों की शिक्षा देने में भारतीय विश्वविद्यालयों का पूरी दुनिया में कहीं कोई मुकाबला करने वाला देश मौजूद नहीं था। किंतु जब समय परिवर्तन के साथ कालांतर में हमने अपनी शिक्षा पद्धति को छोड़कर विदेशी शैक्षणिक गतिविधि को आत्मसात किया, तब से लगातार देश में शिक्षा का स्तर घटा ही है। ऐसा एक उदाहरण सामने नहीं आता, जिससे यह जाना जा सके कि वैश्विक जगत में भारत के विश्वविद्यालयों ने कुछ करिश्मा कर दिखलाया हो। वर्तमान में स्थिति यह है कि दुनिया के टॉप 200 अति प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की सूची में कोई भी भारतीय विश्वविद्यालय स्थान नहीं हासिल कर पाता है। टाई स हायर एजुकेशन की नवीनतम विश्व प्रतिष्ठित रैकिंग साफ बता रही है कि साल 2015 में हार्वर्ड प्रथम स्थान पर, जबकि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। इस अध्ययन में यह भी सामने आया है कि ब्राजील, रूस और चीन जैसे देशों के एक-एक विश्वविद्यालय इस सूची में हैं, लेकिन हम कहीं नहीं।

ऐसा नहीं है कि भारत में विद्वानों द्वारा इस बात पर गंभीर चिंतन, मनन, चर्चा और संगोष्ठियों का आयोजन नहीं किया जा रहा है, लगातार इस बात पर जोर दिया जाता रहा है कि हम अपने को शिक्षा में कैसे श्रेष्ठ बना सकते हैं, लेकिन फिर वही बात सामने आती है कि जब तक मूल सुधार नहीं किए जायेंगे, इसे लेकर लाख संवाद किए जाएं वह व्यर्थ ही साबित होते रहेंगे। प्रश्न यह है कि जब पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक ही नहीं होंगे, तो फिर शिक्षा का स्तर कैसे सुधारा जा सकता है? देश में आज कोई ऐसा विश्वविद्यालय नहीं है, जो यह कहने की स्थिति में हो कि उसके यहां अध्यापन के लिए पर्याप्त स्टाफ है। भारत में उच्च शिक्षा की कितनी दुर्गति है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में देश में शोध और उच्च शिक्षा की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। अपनी चिंता में समिति ने यहां तक पूछा है कि आखिर उच्च शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों के रिक्त पदों को क्यों नहीं भरा जा रहा है?

आज आईआईटी, आईआईएम और एनआईटी जैसे प्रमुख शिक्षण संस्थान ही 35 से 39 फीसद शिक्षकों की कमी से नहीं जूझ रहे, बल्कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 38 फीसद शिक्षकों के पद रिक्त पड़े हुए हैं। राज्य विश्वविद्यालयों की तो हालत और भी खराब है। देश में शिक्षा के स्तर को लेकर यदि ज्ञान आयोग की अनुसंशाओं पर ध्यान दिया जाए तो हमारी स्थिति और भी भयावह नजर आती है। इसका अंदाना लगाना भी मुश्किल हो जाता है कि दुनिया के शैक्षणिक जगत में हम कहां ठहरते हैं। भारत में इस वक्त 677 विश्वविद्यालयों के अंतर्गत 37204 कॉलेज तथा अन्य 11443 उच्च शिक्षण संस्थान संचालित किए जा रहे हैं, जिनमें निजी यूनिवर्सिटी की संख् या 201 तथा केंद्रीय विश्वविद्यालय 45 हैं। एक ऑपन नेशनल विश्वविद्यालय है, 13 राज्य मुक्त विश्वविद्यालय, 73 आईएनआई, 290 राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय, 5 स्टेट लेजिसलेचर एक्ट से संचालित विश्वविद्यालय, 38 सीधी डीम्ड सरकारी यूनिवर्सिटी तथा 11 सरकार के संबंध रखने वाले डीम्ड विश्वविद्यालय एवं अन्य तीन विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं।

यदि मानव संसाधन विकास मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों पर गौर करें तो देश में अंडमान निकोबार द्वीपसमूह, दादर नगर हवेली, दमन दीप और लक्ष्यद्वीप ऐसे हैं, जहां पर अभी एक भी विश्वविद्यालय नहीं खोला गया है। भारत में सबसे ज्यादा 59 की संख्या में विश्वविद्यालय उत्तरप्रदेश में हैं, तमिलनाडु में 56 और आंध्रप्रदेश में 47 की संख्या इनकी है। यहां गोवा ही ऐसा राज्य है, जिसमें सबसे कम 2 विश्वविद्यालय हैं। इन सभी विश्वविद्यालयों में छात्रों की संख् या का अनुमान लगाया जाए तो यूजीसी के अनुसार यहां लगभग 2.9 करोड़, सही अनुपात में कुल २,९६,२९,०२२ से भी अधिक विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं, जिसमें छात्रों की संख्या 1.6 करोड़, जबकि 1.3 करोड़ छात्राएं हैं। यह है नियमित अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों की संख् या। इसके अलावा मुक्त विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत छात्रों की संख्या भी कुछ कम नहीं, यह कुल विद्यार्थियों का 11.9 प्रतिशत के करीब है।

इसके इतर यदि वर्तमान में यूजीसी के मानकों की बात करें तो स्नातकोत्तर स्तर पर छात्रों के लिए 12 छात्रों पर एक शिक्षक तथा स्नातक छात्रों के लिए 15 छात्रों पर एक शिक्षक का मापदंड निर्धारित किया गया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि देश में 23 छात्रों पर एक शिक्षक का अनुपात है। आने वाले पंद्रह सालों में उच्च शिक्षा से जुड़े आंकड़े जो संकेत देते हैं, उससे लगता है कि उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात बढ़कर 30 फीसद तक हो जाएगा, जिसके बाद देश को 800 विश्वविद्यालयों और 70 हजार महाविद्यालयों की आवश्यकता होगी।

भारत शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर अभी बहुत पीछे है। इसी कारण राष्ट्रीय उच्च शिक्षा मूल्यांकन परिषद ने अपनी सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया है कि देश में 68 फीसद विश्वविद्यालयों और 90 फीसद कॉलेजों में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता या तो मध्यम दर्जे की है या दोषपूर्ण है। इन संस्थानों के 75 फीसद डिग्रीधारी छात्र बेरोजगार हैं। यहां हमें यह ध्यान रखना होगा कि दुनिया के विकसित देश अपनी उच्च शिक्षा पर कुल बजट का नौ से दस फीसद तक खर्च कर रहे हैं, वहीं भारत में राष्ट्रीय आय का महज एक फीसद से भी कम उच्च शिक्षा पर खर्च किया जा रहा है। कोठारी कमीशन ने शिक्षा पर छह प्रतिशत तथा ज्ञान आयोग ने देश की आय का 1.5 फीसद खर्च करने के लिए केंद्र को सुझाव दिया था, लेकिन इसके बाद भी हम आज तक उच्च शिक्षा पर एक फीसद भी नहीं खर्च कर सके हैं। यह है देश में उच्च शिक्षा का वहिंगम दृश्य, इसके वाबजूद भी यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम को देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लागू करने जा रही है।

वस्तुत: जमीनी हकीकत का अध्ययन किए बिना इसे लागू करने का जो निर्णय लिया गया है, उसे पूरी तरह से गलत ही माना जाएगा। जब तक सही इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षक यूनिवर्सिटी और महाविद्यालयों में नहीं पदस्थ किए जाते हैं, तब तक इस सिस्टम को लागू करने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा इस सत्र से सभी विश्वविद्यालयों में च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम (सीबीसीएस) लागू करने और केंद्र सरकार के कॉमन सेंट्रल यूनिवर्सिटी विधेयक का जो आज विरोध हो रहा है, वह व्यर्थ नहीं है। भले ही फिर यूजीसी का मानना हो कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों की परफारमेंस सुधरेगी। साथ ही विदेशों में च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम पहले से ही लागू है। छात्रों को देश और विदेश में एक इंस्टीट्यूट से दूसरे इंस्टीट्यूट में माइग्रेशन और ट्रांसफर सिस्टम में कोई दिक्कत नहीं आएगी। वस्तुत: हम यह नहीं कह रहे कि इसे लागू करने के पीछे यूजीसी की मंशा में कोई खोट है। यहां इतना कहनाभर है कि पहले इस सिस्टम को लागू करने के लिए आवश्यक इन्फ्रास्ट्रक्चर चाहिए, वह तो विश्वविद्यालयों को जुटा लेने दीजिए या इसके लिए पूर्व से समय सीमा निर्धारित करिए, बाद में जो विश्वविद्यालय इसे अपनाने के लिए तैयार हो चुके हों, वहां पहले सीबीसीएस को लागू किया जाए, क्योंकि इसके लागू हो जाने के बाद विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी बहुत अधिक बढ़ना तय है।

सीजीपीए सिस्टम के तहत नए पाठ्यक्रम लागू होने से पेपरों की सं ख्या में वृद्धि होगी। विवि को नए इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पड़ेगी। सीबीसीएस के तहत कोर, इलेक्टिव और फाउंडेशन में नए कोर्स शुरू होंगे। इनमें लैब वर्क, फील्ड वर्क, प्रोजेक्ट वर्क, वोकेशनल ट्रेनिंग, वायवा, सेमिनार, प्रेसेंटेशन, असाइनमेंट, सेल्फ स्टडी का समायोजन होगा। कोर कोर्स प्रत्येक सेमेस्टर में जरूरी विषय के तौर पर पढ़ाए जाएंगे, जो कि छात्रों की डिसिप्लिन ऑफ स्टडी की जरूरत को पूरा करेंगे। इलेक्टिव कोर्स में छात्रों में डिसिप्लिन ऑफ स्टडी की सहायतार्थ आने वाले विषय होंगे। तीसरा फाउंडेशन कोर्स दो प्रकार के होंगे। कंपल्सरी फाउंडेशन और इलेक्टिव फाउंडेशन। कंपल्सरी फाउंडेशन में कंटेन्ट और ज्ञानवर्धक शैक्षणिक सामग्री होगी। इसी प्रकार से इलेक्टिव फाउंडेशन कोर्स में वेल्यू बेस्ड और मैन मेकिंग एजुकेशन शामिल होगी।

इतना ही नहीं, क्रेडिट बेस्ड सेमेस्टर सिस्टम में प्रत्येक कोर्स के क्रेडिट नंबर दिए जाएंगे। एक घंटे का एक लेक्चर, दो घंटे का प्रेक्टिकल वर्क, एक क्रेडिट अंक के समानांतर होगा। प्रत्येक सेमेस्टर के अंत में स्टूडेंट्स को ग्रेड कार्ड सर्टिफिकेट दिया जाएगा। इस सर्टिफिकेट में कोर्स की डिटेल, कोड, टाइटल, नंबर, क्रेडिट और एसजीपीए का ग्रेड होगा, जबकि वर्ष के दोनों सेमेस्टर के अंत में सीजीपीए दिया जाएगा। इस पूरी कवायद में कितना श्रम लगेगा, कम से कम इसका अंदाजा तो पहले यूजीसी को लगा लेना चाहिए था।

देशभर के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नए सत्र 2015-16 से लागू होने जा रहे च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम को लेकर शिक्षक और छात्र संगठनों ने अपनी ओर से खिलाफत शुरू कर दी है। वास्तव में जब तक सभी यूनिवर्सिटी में शैक्षणिक स्तर पर जरूरी सुधार नहीं हो जाते, तब तक यह नया सिस्टम लागू नहीं किया जाना चाहिए। यदि इसके बावजूद ऐसा किया गया तो यह शिक्षा, शिक्षक और विद्यार्थी किसी के भी हित में नहीं होगा, यह मान लिया जाना चाहिए। वहीं, जेएनयू, आईआईटी आदि शिक्षण संस्थानों जहां पर शिक्षण की पूरी सुविधाएं होने के साथ शिक्षकों के सभी पद भरे हुए हैं, वहां इस सिस्टम को लागू रहने में कोई हर्ज नहीं। ऐसे यदि देशभर में अन्य विश्वविद्यालय हैं, सरकार वहां भी च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम आरंभ करे, तो कोई आपत्ति नहीं, लेकिन इसे प्रयोग के तौर पर सभी विश्वविद्यालयों में एक साथ लागू करना फिलहाल तो कहीं से भी उचित नहीं होगा।

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