लेखक परिचय

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

'स्‍वतंत्रता संग्राम और संघ' विषय पर डी.लिट्. कर रहे लेखक पत्रकार, फिल्म समीक्षक, समाजसेवी तथा हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक हैं।

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 डा.मनोज चतुर्वेदी

वर्तमान समय में छोटे राज्यों को लेकर मांग उठ रही है। क्या यह मांग उचित है?पूर्वोतर के छोटे राज्यों को देखकर ऐसा लगता है कि चाहे हम संपूर्ण भारत के 50 राज्यों में मुख्यमंत्री,उप-मुख्यमंत्री,राज्यपाल तथा प्रशासनिक अधिकारियों की एक लंबी फौज तो खड़ी कर सकते हैं। पर उनका जनता से कोई सरोकार हो तो ठीक है लेकिन जब प्रशासनिकतंत्र स्वयं अजित्य वर्ग मानकर जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ करे तो छोटे राज्यों के गठन से क्या फायदा?राज्य चाहे छोटा हो या बड़ा पर कुशल नेतृत्व के बिना यह बेकार है। इस पर यह निर्भर करता है कि उस राज्य में सामाजिक समरसता,शैक्षणिक स्तर,सांस्कृतिक विविधता के बीच एकता तथा स्वतंत्रता एवं समानता के स्तर पर कितना विकास हुआ है। अत: यह कहना कि छोटे राज्यों के गठन से समस्त समस्याओं का समाधान हो सकता है और इसी को आधार बनाकर कही मिथिलांचल,कहीं हरित प्रदेश,कहीं बुंदेलखंड,कहीं गोरखालैंड,कही विदर्,कहीं बघेलखंड तथा भोजपुर की मांग हो रही है। राज्यसत्ता के भूखे भेडि़ए अलग-अलग राज्यों का गठन करते रहते हैं लेकिन देखा जाए तो 1956 में जो 14 नए राज्य तथा 6 केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए। उनसे हमें क्या मिला?1960 में महाराष्ट्र एवं गुजरात का विभाजन किया गया। 1966 में पंजाब से हरियाणा को अलग किया गया। संयुक्त रूप से पंजाब हरियाणा को राजधानी बनाने के बाद हिदुओं तथा मुसलमानों का कितना रक्त बहा। यह सर्वविदित है। 1972 में मेघालय,मणिपुर और त्रिपुरा तथा 1987 में मिजोरम का गठन तथा अरूणाचल एवं गोवा को राज्य का दर्जा दिया गया।

2000 में राजग ने बिहार,उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश को बांटकर झारखंड,उतरांचल एवं छत्तीसगढ़ का गठन किया। इन तीनों राज्यों के दृश्य को देखा जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर उर्फ गुरूजी ने भाषा के आधार पर राज्योंके पुनर्गठन का विरोध किया था।

अब यदि ब्राह्मण राज्य,छत्रिय राज्य,भूमिहर राज्य,यादव राज्य,गुर्जर राज्य,हिन्दूराज्य,मुसिलम राज्य,ईसाई राज्य,थारू राज्य,नेपाली राज्य,मधेशी राज्य,नक्सलवादी राज्य,मराठा राज्य तथा अन्य जातिसूचक,धर्म सूचक तथा भाषा सूचक नामधारी राज्यों की मांग सतापिपासु राजनीतिज्ञ करें तो बुराई क्या है?

हमने तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को राज्य का आधार माना है। एक राष्ट्र में कई राज्य हो सकते है। पर सांस्कृतिक विविधता में एकता को स्थापित करना राज्य का लक्ष्य है। इस दृषिट से देखें तो राज्य की इकाई मात्र जन है। जिसके महत्व के बिना अधिकार के बिना,दायित्व के बिना,राज्य की कल्पना बेकार है। हमने तो न वै राज्यं न …… को लोकतंत्र का आधार माना है। “रामराज्य में सबनर करÇह परस्पर प्रीति की भावना का विकास हो। यही भावना यदि बड़े राज्यों या छोटे राज्यों में हो तो ठीक है। अन्यथा रणवीर सेना,सनलाईट सेना,यादव सेना,नार्थ बिहार लिबरेशन आर्मी,आदिवासी जनकल्याण समिति,माले,जनयुद्ध या जनमुकित जैसे संगठनों को रोका नहीं जा सकता। यदि हम नक्सलवादी आंदोलन के प्रतिरोध के लिए सलवा जुडूम आंदोलन खड़ा करते हैं तो यह ठीक है लेकिन 9000 रूपये में कब तक कोई सलवा जुडूम के विचारों से प्रभावित होगा जबकि 10,000 से 15,000 रूपये लेने वाला नक्सलवादी तन,मन और धन से अपने संगठन के लिए कार्य करेगा।

यदि हम विचार करते हैं तो हमें ऐसा लगता है कि ‘छोटा परिवार सुखी परिवार का आधार हो सकता है। लेकिन वह छोटा परिवार किस काम का जिसके समस्त सदस्य शैक्षणिक स्तर,आर्थिक स्तर,समाजिक स्तर तथा बौद्धिक स्तर से शुन्य हो। अत: यह कहा जा सकता है कि छोटे राज्य की कसौटी में जनसंख्या एवं क्षेत्रफल को आधार न मानकर आदर्श चरित्र होना चाहिए। लेकिन आज के राजनीतिक दलों में प्राय: इसी का आधार परिलक्षित होता है। जिसको हम साम,दाम,दंड और भेद द्वारा ही समाप्त कर सकते हैं। यदि छोटे राज्य गोवा में भ्रष्टाचार है तो छोटे राज्य उतरांचल में भी भ्रष्टाचार है। यदि यह भ्रष्टाचार पूर्वोतर के राज्यों में है तो महाराष्ट्र एवं गुजरात में भी देखा जा सकता है। धनबल,बाहुबल,जातिबल तथा सत्ताaबल अब भारतीय राजनीति का चरित्र बन चुका है। यदि यह चरित्र नहीं बना होता तो तेलंगाना आंदोलन एक माह से उपर नहीं बढ़ता। मणिपुर की क्या दशा है?एशिया में पोलो के लिए विख्यात मणिपुर में मणिपुर नृत्य कहां होते हैं। वहां पर डोल यात्रा तथा रासलीला भी बंद हो जाता है क्योंकि आर्थिक नाकेबंदी से वहां की जनता तबाह हो जाती है। वहां कभी एन.एस.सी.एन.आई.एम. तो कभी एन.एस.सी.एन.के. का आंदोलन होता है तो कभी मणिुपर लिबरेशन आर्मी का एक भी गारो हिल्स का तो कभी उल्फा का। राष्ट्रीय राजनीति आहत है। और केंद्र सरकार मंत्रमुग्ध है। यहां अन्ना हजारे का आंदोलन तो मीडिया में स्थान पा जाता है पर इरोम शर्मिला के उपवास पर किसी की दृष्टि ही नहीं जाती। तेलंगाना और मणिपुर में क्या सिथतियां बनी। ट्रक जलाए जा रहे हैं,चीनी,चाय की आवक बंद है। गैस सिलेंडर 2 हजार रूपये तथा पेट्रोल दो सौ रूपये में बिकते हैं। आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी कायम होने से मध्यम बर्ग पर तो कम प्रभाव पड़ता है। जिसमें सबसे ज्यादे आर्थिक रूप से विपन्न वर्ग ही प्रभावित होते हैं। निम्न आर्थिक आय वाले कभी डा.राममनोहर लोहिया ने कहा था कि संजीदा कौमे पांच साल तक इंतजार नहीं करती। आमजन प्रभावित है,आमजन व्यथित है। आमजन आंदोलित है लेकिन इसका नेतृत्व कौन करेगा?राज्य तथा केंद्र सरकारें अपनी झोली भरने में व्यस्त हैं और जनता त्रस्त है चाहे किसी भी दल की सरकार हो सत्ता परिवर्तन तो हो जाता है लेकिन व्यवस्था ज्यों का त्यों। गत 20 वषो

 की सत्तावादी राजनीति का प्रत्यक्ष उदाहरण उत्तर प्रदेश है।

अत: यह जरूरी है कि जनाकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए और राज्य गठन आयोग का गठन हो। यह आयोग संपूर्ण भारतीय समाज से विचार-विमर्श कर रिपोर्ट दे ताकि राज्य व राष्ट्र के बीच भावनात्मक एकता स्थापित हो सके और चारों ओर मंगल भवन अमंगल हारी का गुंज सुनाई पड़े.

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