लेखक परिचय

ललित गर्ग

ललित गर्ग

स्वतंत्र वेब लेखक

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ललित गर्ग
चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर व गोवा का चुनावी कार्यक्रम घोषित करने के बाद चुनावी सरगर्मियां तेज हो गयी है। चुनाव आयोग ने 4 फरवरी से लेकर 8 मार्च तक मतदान का कार्यक्रम विभिन्न चरणों में घोषित किया है। इसके साथ ही इन राज्यों में चुनाव आचार संहिता भी लागू हो गई है। अब मतदाताओं के हाथ में राजनीतिक दलों और नेताओं के भाग्य की कुंजी आ गई है।
पांच राज्यों के चुनाव महत्वपूर्ण है और यही कारण है कि राजनीतिक दल अपने-अपने ढंग से चुनावों की तैयारियों में जुट गये हैं। गठबंधनों की बातें ही नहीं हो रही, गठबंधनों की रणनीतियां तैयार होने लगी। विभिन्न राजनीतिक दल समीकरण बनाने-बिठाने की जोड़तोड़ में जुट गये हैं। कुछ राष्ट्रीय दलों में घमासान मचा हुआ है, तो कुछ राजनीति दलों के लिये ये चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बने हुए हैं। इन स्थितियों के बीच मतदाता को भी जागरूक होना है। आने वाले चुनाव में मतदाता इतने सशक्त रूप में अपनी भूमिका को प्रस्तुत करें कि राजनीतिक दल चुनाव के बाद उसकी अनदेखी करने का दुस्साहस न कर सके। यहां तक कि मतदाता को लुभाने की कोशिशें और उसे भरमाने के प्रयासों से भी राजनैतिक दल उपरत हों, यही वर्तमान की सबसे बड़ी अपेक्षा और एक सशक्त संदेश है।
राजा और प्रजा, शासक और शासित की यह व्यवस्था सदैव रही है और सदैव रहेगी। पद्धतियां बदलती रहती हैं। पहले राजा रानी के पेट से पैदा होता था और अब ‘मत पेटी’ से पैदा होता है। इसीलिये जनतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनाव है। यह राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिबिम्ब है। जनतंत्र में स्वस्थ मूल्यों को बनाये रखने के लिए चुनाव की स्वस्थता और उसमें आम मतदाता की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। राजनीतिक दलों से पहले मतदाता को जागना होगा। सभी राजनीतिक दल तो अपने घोषणा-पत्र प्रकाशित करते हैं- जनता को पांच वर्षों में अमीर बना देंगे, हर हाथ को काम मिलेगा, सभी के लिए मकान होंगे, सड़कें, स्कूल-अस्पताल होंगे, बिजली और पानी होगा। जनता मीठे स्वप्न लेती रहती है। कितने ही पंचवर्षीय चुनाव हो गये और कितनी ही पंचवर्षीय योजनाएं पूरी हो गईं पर यह दुनिया का आठवां आश्चर्य है कि कोई भी लक्ष्य अपनी समग्रता के साथ प्राप्त नहीं हुआ। मतदाता हर बार ठगा गया, भरमाया गया। फिर भी उसकी आंखें क्यों नहीं खुलती?
एक युग था जब सम्राट, राजा-महाराजा अपने राज्य और प्रजा की रक्षा अपनी बाजुओं की ताकत से लड़कर करते थे और इस कत्र्तव्य एवं आदर्श के लिए प्राण तक न्यौछावर कर देते थे। आज नारों और नोटों से लड़ाई लड़ी जा रही है, चुनाव लड़े जा रहे हैं- सत्ता प्राप्ति के लिए। जो जितना लुभावना नारा दे सके, जो जितना धन व्यय कर सके, वही आज मतदाता को भरमा सकता है। मतदाता हर बार ठगा जाता रहा है, भरमाया जाता रहा है, लेकिन कब तक?
इसलिये चुनावों की तैयारी सिर्फ राजनीतिक दलों को नहीं करनी है, मतदाता को भी करनी होगी। पर क्या हम कोई तैयारी करते हैं? अथवा कोई तैयारी कर रहे हैं? राजनीतिक जोड़तोड़ और रेवड़ियां बांटने के खेल राजनीतिक दलों को ही मुबारक हों, लेकिन मतदाता की जागरूकता ही राष्ट्र को और लोकतंत्र को शुद्ध सांसे दे सकती है और इसके लिये व्यूह-रचना तो मतदाता को भी करनी होगी। मेरा वोट किसी को क्यों मिले? जिसे मैंने वोट दिया था, क्या वह मेरी अपेक्षाओं पर खरा उतरा है? वोट देने के मेरे निर्णय को गलत बातों ने तो प्रभावित नहीं किया था? जिसे मैंने वोट नहीं दिया था, क्या उसने अपनी कमियों को दूर करने की कोई कोशिश की है? ये और ऐसे अनेक सवाल हैं, जो मतदाता को लगातार खुद से पूछने होंगे। हमारा दुर्भाग्य यह है कि मतदाता की उदासीनता और उपेक्षा राजनीतिक भ्रष्टाचार एवं अपराधीकरण का सबसे बड़ा कारण है। मतदाता को सोचना होगा कि अपराधी हमारा वोट कैसे पा लेते हैं? राष्ट्र की धन-सम्पदा से खिलवाड़ करने वाले भ्रष्टाचारी हमारे आदर्श कैसे बन जाते है? क्यों हम भ्रष्टाचारियों, अवसरवादियों और अपराधियों को वोट देते हैं और फिर वे हम पर राज करते हैं? हम इन स्थितियों को चुपचाप स्वीकार किए रहते हैं। लेकिन आखिर कब तक? कब तक हम ठगे जाते रहेंगे? कब तक मूक दर्शक बनकर राष्ट्र को लूटता हुआ देखते रहेंगे?
सच बात तो यह है कि मतदाता का काम सिर्फ विवेकपूर्ण ढंग से वोट देना ही नहीं होता, इस बात की लगातार जांच करते रहना भी होता है कि उसके वोट का सही उपयोग हो रहा है या नहीं। सवाल राजनीतिक दलों के स्वार्थों का ही नहीं है, सवाल मतदाता के साथ अक्सर होने वाले विश्वासघात का है। और इस बात का भी है कि मतदाता स्वयं को जनतंत्र के योग्य बनाने के लिए क्या कर रहा है? विकास के नाम पर लम्बे-चैड़े बजट के बावजूद क्यों सूखे के हालात, अशिक्षा, बेरोजगारी, कुपोषण की स्थिातियां देखनी पड़ती हैं? ऐसे सवालों का एक लम्बा सिलसिला मतदाता के दिमाग में उठना चाहिए। सवाल यह भी है कि राजनीतिक स्वार्थ अक्सर समाज और देश के हितों से बड़े क्यों हो जाते हैं? सवाल यह भी है कि देश में नोटबंदी जैसी स्थितियां क्यों आती है? सवाल यह भी है कि भ्रष्टाचार एवं कालेधन पर लम्बे समय से नारेबाजी करने वाले दलों के सामने जब इनके खिलाफ सशक्त वातावरण बन रहा था तो ये दल क्यों इस मुहिम से मुंह चुरा रहे थे? वे क्या देश में गरीब जनता की चिन्ता मिटायेंगे जिन्हें अपनी सत्ता बनाए रचाने की चिन्ताओं से उबरने की भी फुरसत नहीं है। ऐसे राजनीतिक दल का क्या भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र का निर्माण करेंगे जिन पर रोज भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं।
आने वाले चुनावों में मतदाता को दोहरी भूमिका निभानी होगी- घर के मालिक की भी और घर के पहरेदार की भी। मालिक के नाते उसका कर्तव्य होगा कि वह जनता के हितों के ठेकेदार कहलाने वालों को ठोक बजाकर देखे-परखे। और घर के पहरेदार के नाते उसका कर्तव्य बनता है कि वह सिर्फ जागता ही नहीं रहे, सतत सावधान भी रहे। इसी जागरूकता और सावधानी का तकाजा है कि वह सत्ता में बैठने के इच्छुक लोगों की कथनी-करनी को विवेक के तराजू पर तोलेे। चूंकि उसे ही सबसे अधिक खोना और सबसे अधिक पाना है, इसलिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी उसी की है। इस जिम्मेदारी को मतदाता वैयक्तिक स्तर पर भी निभाएं- अपने आप से यह पूछकर कि उसके वोट देने का आधार क्या होगा। पहला निर्णय तो मतदाता को यह करना होगा कि उसे वोट देना ही है। फिर यह तय करना होगा कि वह ‘गलत’ के पक्ष में वोट नहीं देगा।
सच यह है कि हमारा पूरा का पूरा सिस्टम ही अंग्र्रेजों के जमाने की याद दिलाने वाला बना हुआ है। उस जमाने में सरकारी कर्मचारी का काम सिर्फ अपनी सरकार को संतुष्ट रखना होता था। उसे जनता के लिए जवाबदेही की कोई परवाह नहीं होती थी। कमोबेश यही सिलसिला आज भी चला आ रहा है। चुनकर आने वाली सरकारें और राजनेता उसी ढर्रे पर चल रहे हैं। जनतंत्र में सबसे बड़ा अंकुश राजनीति का नहीं, जनमत का होना चाहिए। राजनीतिक दलों को यह अहसास होना जरूरी है कि उनकी पहली और अंतिम जवाबदेही इस देश के नागरिकों के प्रति है। उन्हें यह अहसास जनता ही करा सकती है। चुनाव एक अवसर होता है यह अहसास कराने का, लेकिन एकमात्र अवसर नहीं। हर मंच पर, हर संभव तरीके से अपने प्रतिनिधियों को यह बताना जरूरी है कि हमने उन्हें मर्यादाहीन और स्वार्थी आचरण का अधिकार नहीं दिया है।
एक बात बार-बार सामने आती रही है कि भारत के मतदाता राजनीतिज्ञों से ज्यादा अक्लमंद हैं। जहां नेताओं की अक्ल काम करना बन्द कर देती है वहां इन्हीं अनपढ़ और गरीब कहे जाने वाले मतदाताओं की अक्ल चलनी शुरू हो जाती है और ये देश की राजनीतिक दिशा तय कर देते हैं एवं राजनेताओं का भविष्य बना या बिगाड़ देते हैं। ऐसा एक बार नहीं कई बार हो चुका है। राजनीतिक दलों की यह सोच अब बेमानी बनती जा रही है कि चुनावों से पहले मुफ्त में खैरात बांटकर या रियायतें देने से वोट पक्के हो जाते हैं। अब मतदाता जागरूक हो चुका है। फिर भी राजनीतिक दल राजसी या सामन्ती मानसिकता को छोड़ नहीं पा रहे हैं और वे मतदाताओं को लुभाने एवं ठगने का प्रयास करते हैं जो प्रत्यक्ष रूप से मतदाताओं के अपमान के अलावा और कुछ नहीं है। लोकतन्त्र में मतदाता राजनीतिक दलों का मालिक होता है। सत्ता पर सीधे उसका अधिकार होता है। इन पांच राज्यों का चुनाव एक नजीर बन जाये कि बिना भय, प्रलोभन या झूठे आश्वासनों के भी चुनाव हो सकते हैं। अच्छे आदमी भी नेतृत्व से जुड़ सकते हैं।

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