लेखक परिचय

अर्पण जैन "अविचल"

अर्पण जैन "अविचल"

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cityहर शहर की सरहद के उस पार से
कुछ ठंडी हवाएँ हर बार जरूर आती है
अपने साथ सभ्यताओं का एक पुलिंदा भी
साथ में गाहे-ब-गाहे जरूर ले आती हैं
वही हवाएँ, शहरी हवाओं के साथ
मिलकर एक रंग बना देती है
रंग शहर के पुरातन के साथ भी
अक्सर घुल-मिल जाया करता है
जैसे होली की मस्ती में सब रंग
एक होकर ‘रंगलहरी’ बनाते है,
नई हवाएँ अपना विस्तार करती है
इमारतें अपना रंग रोगन चाहती है
शहर का भाग्य भी यथावत रहता है
बस शब्द अपना हाल बदल लेते है
अंधेरे के साथ जीने वाले शहर को फिर
जीने के लिए नई कोपल मिल जाती है
पतझड़ के बाद जैसे हर बार एक
वृक्ष को नया परिवार मिलता है
नई कोपलें विस्तार की बात करती हैं
वो विस्तार, विचार की हत्या के बाद आता है
तब शहर के मानस में बौखलाहट शुरू होती हैं
क्युंकि अब टूटे हुए कन्दिल रोशनी दिखाने लगते है
शहर अपनी चुप्पी तब भी नहीं तोड़ता
जब उसके शरीर के साथ कोई खेल जाए
और शहर की सड़क भी हर दर्द सहती है
क्युंकि नई हवाओं को तेज चलना पसंद है
उसकी तंग गलिया भी कुछ बोलती नहीं
जबकि उन गलियों की लाश बिछने वाली होती है
और शहर खामोशी से सब कुछ देखता है
क्युकि इस बदलाव का ठहराव नहीं होता
मानों शब्दों की झाँकी निकल रही हो
और शहर उसका भी तमाशा देखता है
हर घाव को शहर खामोशियों से सह जाता है
क्यूंकी शहर भी अब समझौतावादी हो गया है
शहर बस तब जरूर रोता है जब
उसकी पुरातन सभ्यताओं पर हमला होता है
गुनाह शहर का केवल इतना भर है कि
नई हवाओं को उसने रहने की जगह दी
पर हवाओं की नियत कब्जा करने की हो गई
जो हवाएँ शहर की किरायेदार थी हिस्सेदार नहीं
और किरायेदारों को विरासती मकान के साथ
तोड़-फोड़ की इजाजत नहीं होती
हर एक को हक दिया है केवल रहने का
शहर की ख्वाहिशों से खिलवाड़ का नहीं
और यह शहर ठंड से ठीठुरती चट्टान बन गया
और सब कुछ अर्पण करने वाला शहर टूट गया
जैसे पतझड़ में शाख से टूटी हुई कोपल
जिसके प्राण अब चन्द पल के मेहमान है
शहर के ‘स्मार्ट’ बनने की चाहत का तर्क भी
एक अपनो के अंजान धोखे मंे तब्दील हो गया
और शहर बदलते-बदलते बदल-सा गया
ये शहर अब पथरीला मरुस्थल बन गया
नये शहरी बुनकरों ने सब बदल दिया
और शहर की संवेदनाओं का गला घुटने लगा
इसी बंद गले के लिबास में शहर भी मर रहा है…
…और शहर मर भी रहा है

अर्पण जैन ’अविचल’

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