लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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cleaninessशैलेंद्र चौहान
केंद्र सरकार ने देश भर में स्वच्छता अभियान के लिए संसाधन जुटाने के लिए सेवा कर के दायरे में आने वाली सभी सेवाओं पर अधिभार यानी सेस लगाया है। यह सेस 0.5 प्रतिशत है। नीति आयोग में मुख्यमंत्रियों के समूह ने स्वच्छता अभियान के लिए पेट्रोल, डीजल पर 2 फीसदी सेस लगाने की सिफारिश की थी। वहीं कोल, अल्युमीनियम, आयरन ओर उत्पादन पर भी सेस की सिफारिश की । विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख लोगों की मानव मल जनित बीमारियों से मृत्यु हो जाती है तथा इनमें 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की संख्या अधिक होती है। विकासशील देशों में यह स्थिति अधिक दयनीय है। डायरिया से होने वाली कुल मृत्यु का एक चौथाई भाग अकेले भारत में है। पोलियो जैसी बीमारी का विकसित देशों में नामोनिशान तक नहीं है। जबकि विश्व के आधे पोलियो ग्रस्त लोग भारत में ही हैं। यह तथ्य भी चौंकाने वाला है कि विश्व में लगभग 200 करोड़ जनसंख्या शौच सुविधाओं के बिना जीवनयापन करती है तथा उसकी एक बड़ी तादाद यानी 63 करोड़ लोग भारत के हैं। बिना शौच सुविधाओं के रहना अर्थात अपने आस-पास के वातावरण को दूषित करना या ऐसे वातावरण में रहना जहाँ हवा में लगातार कीटाणु हों व गन्दगी में उन कीटाणुओं को पनपने के अवसर देना, लोगों का उनके सम्पर्क में आना तथा न चाहते हुए भी संक्रामक बीमारियों के घेरे में रहना इसका परिणाम है। खुले हुए गंदे नाले, नदियों के जल में प्रदूषण, नगरों के बीच ठोस कचरे पहाड़ और कारखानों से उत्सर्जित जल,वायु और अपशिष्ट की मात्रा इसमें शामिल कर ली जाए  की तस्वीर एक बेहद अस्वच्छ देश की बनती है। शोध बताते हैं कि बहुत हद तक कुपोषण भी अस्वच्छता का परिणाम है। ऐसा इसलिए कि संक्रमित जल तथा अस्वच्छता से उत्पन्न आँत के कीड़ों के विषाणु भोजन के पोषक तत्वों को शरीर में अवशोषित नहीं होने देते, जिससे रोग अवरोधकता कम हो जाती है। परिणामस्वरूप बच्चों का भौतिक विकास नहीं हो पाता। भारत में विश्व की 19 प्रतिशत बाल जनसंख्या है तथा कुपोषण से पीड़ित कुल बालकों का एक चौथाई भाग भी भारत में ही है। देश में गंदगी के कारण अनेक बीमारियां फैलती हैं। जनस्वास्थ्य के बजट पर 6700 करोड रूपए सालाना यानी 60 रूपए प्रतिव्यक्ति खर्च आता है।”
महात्मा गांधी ने अपने आसपास के लोगों को स्वच्छता बनाए रखने संबंधी शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र को एक उत्कृष्ट संदेश दिया था। उन्होंने “स्वच्छ भारत” का सपना देखा था जिसके लिए वह चाहते थे कि भारत के सभी नागरिक एक साथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाने के लिए कार्य करें। महात्‍मा गांधी के स्‍वच्‍छ भारत के स्‍वप्‍न को पूरा करने के लिए, प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने 2 अक्‍टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया और इसके सफल कार्यान्वयन हेतु भारत के सभी नागरिकों से इस अभियान से जुड़ने की अपील की। सरकार द्वारा एक शपथपत्र तैयार किया गया और प्रधानमंत्री ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ यह शपथ ली कि “मैं शपथ लेता हूँ कि मैं स्वच्छता के प्रति सजग रहूंगा और इसके लिए समय दूंगा। हर वर्ष 100 घंटे यानी हर सप्ताह दो घंटे श्रमदान करके स्वच्छता के लिए काम करूंगा। मैं न गंदगी करूंगा, न किसी और को करने दूंगा। सबसे पहले मैं स्वयं से, मेरे परिवार से, मेरे मुहल्ले से, मेरे गांव से और मेरे कार्यस्थल से इसकी शुरुआत करूंगा। मैं यह मानता हूं कि दुनिया के जो भी देश स्वच्छ दिखते हैं, उसका कारण यह है कि वहाँ के नागरिक गंदगी नहीं करते और न ही होने देते हैं। इस दृढ़ विश्वास के साथ मैं गांवों और शहरों में स्वच्छ भारत मिशन का प्रचार करूंगा। मैं आज जो शपथ ले रहा हूं, वह अन्य 100 व्यक्तियों को लेने के लिए प्रेरित करूंगा। वे भी मेरी तरह स्वच्छता के लिए 100 घंटे दें, इसके लिए प्रयास करूंगा ।” “मुझे विश्वास है कि स्वच्छता के लिए बढ़ाया गया मेरा क़दम मेरे देश को स्वच्छ बनाने में मदद करेगा.” इस अभियान का उद्देश्य अगले पांच वर्ष में स्वच्छ भारत का लक्ष्य प्राप्त करना है ताकि बापू की 150वीं जयंती को इस लक्ष्य की प्राप्ति के रूप में मनाया जा सके। स्वच्छ भारत अभियान सफाई करने की दिशा में प्रतिवर्ष 100 घंटे के श्रमदान के लिए लोगों को उत्प्रेरित करता है। प्रधानमंत्री द्वारा मृदला सिन्‍हा, सचिन तेंदुलकर, बाबा रामदेव, शशि थरूर, अनिल अम्‍बानी, कमल हसन, सलमान खान, प्रियंका चोपड़ा और तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा की टीम जैसी नौ नामचीन हस्तियों को आमंत्रित किया गया कि वह भी स्‍वच्‍छ भारत अभियान में अपना सहयोग प्रदान करें, इसकी तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर साझा करें और अन्‍य नौ लोगों को भी अपने साथ जोड़ें, ताकि यह एक श्रृंखला बन जाएं। महात्‍मा गांधी ने एक बार कहा था, “स्‍वच्‍छता आजादी से महत्‍वपूर्ण है” इस बात से इसके सापेक्ष महत्‍व को समझा जा सकता है। अस्‍वच्‍छ परिवेश कई रोगों के फैलाव के लिए आधार बनाता है जो स्‍वच्‍छता के रूप में लोगों के कल्‍याण के साथ गहरा संबंध रखती है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (डब्‍ल्‍यूएचओ) द्वारा कहा गया है कि प्रदूषित पानी 80 प्रतिशत रोगों का मूल कारण है, जो अपर्याप्‍त स्‍वच्‍छता और सीवेज निपटान विधियों का परिणाम है। पानी की आपूर्ति और स्‍वच्‍छता भारत के संविधान के तहत और 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों, के तहत राज्‍य का दायित्‍व है, राज्‍यों द्वारा यह दायित्‍व और अधिकार पंचायती राज संस्‍थानों (पीआरआई) और शहरी स्‍थानीय निकायों (यूएलबी) को दिए गए हैं। आज भी बड़ी संख्‍या में लोग खुले स्‍थान पर मल त्‍याग करते हुए जलाशयों और पानी के अन्‍य खुले प्राकृतिक संसाधनों को संदूषित करते हैं। इससे प्रदर्शित होता है कि लोगों को स्‍वच्‍छता के महत्‍व पर जानकारी देने और शहरी तथा ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में स्‍वच्‍छता पूर्ण विधियों के उपयोग की शिक्षा देने की आवश्‍यकता है। अपर्याप्‍त स्‍वच्‍छता सुविधाओं और जागरूकता की कमी के कारण अनेक स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं होती हैं जैसे पेट में कीड़े, जो आम तौर पर मानवीय गोल कृमि और मानवीय हुक वर्म। इस रोग की दर आम तौर पर अर्धशहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कम आय वर्ग में बहुत अधिक होती है। स्वच्छता मानव विकास की मूलभूत पहचान है। यह उसकी सामर्थ्य का प्रतीक है तथा उसकी प्रगति का पैमाना भी है। स्वच्छता एक मूलभूत मौलिक अधिकार व दायित्व दोनों है। 21वीं शताब्दी में जहाँ तकनीकी विकास व खुशहाली के नये आयाम खोजे जा रहे हैं, वहीं विश्व के किसी भाग में या समाज के किसी हिस्से में अस्वच्छ जल व अस्वच्छता जनित कारणों से बड़े पैमाने पर मृत्यु होना एक विडम्बना ही है। ‘स्वच्छता’ क्या है? यह एक वृहत शब्द है जिसमें व्यक्तिगत सफाई, मनुष्य व पशुओं के मल का समुचित निपटान, कूड़ा-करकट का उचित प्रबन्धन, जल निकासी का उचित प्रबन्ध व आरोग्य युक्त जीवन में सहायक साफ-सुथरा निर्मल वातावरण आदि सम्मिलित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, “स्वच्छता का अभिप्राय मनुष्य के स्वस्थ निर्वहन को प्रभावित करने वाले भौतिक पर्यावरण के उचित प्रबन्धन से है।” अतः मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि स्वच्छता में मानव व्यवहार तथा वातावरण को साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए भौतिक सुविधाएँ, जैसे शौचालयों की व्यवस्था, बहते पानी की समुचित निकासी सम्बन्धी व्यवस्था आदि शामिल हैं। सरकार के सेस लगाने से हर वह सेवा जो सर्विस टैक्स के दायरे में आती है महंगी हो जाएगी। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व सरकार ने बजट के दौरान कहा था कि स्वच्छता सेस केवल उन्‍ही पर लगेगा जिनकी आय अधिक है,लेकिन इस तरह के ऐलान ने सबको चकित कर दिया है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सेस लगाकर जनता की जेब खाली करने मात्र से स्वच्छता अभियान सफल हो सकेगा। भारत में स्वच्छता एक बेहद पेचीदा एवं कठिन कार्य है। और जब तक इसके लिए सरकार मजबूत संकल्प के साथ स्वच्छता के लिए व्यवहारिक सांगठनिक एवं तकनीकी ढांचा तैयार नहीं करती यह प्रयास महज एक सद्विचार ही बना रहेगा। इसके लिए आधारभूत ढांचा सरकार को ही तैयार करना होगा। इसमें कॉर्पोरेट की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होगी। कूड़ा उठाने की प्रक्रिया, उसकी डंपिंग तथा रीसाइक्लिंग तथा हर दो सौ कदम  पर कूड़ेदान लगाने तथा उन्हें नियमित साफ़ करने का काम नगरनिगम ही कर सकेंगे, जनता नहीं। जबकि हम देख रहे हैं कि देश में नगरपालिकाओं और नगरनिगमों की कार्यप्रणाली पूरी तरह अव्यवहारिक और अवैज्ञानिक है। क्या उन्हें सुधारे बिना जनता पर अधिभार लगाने भर से यह अभियान अपेक्षित गति पकड़ सकेगा ?

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