लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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शैलेन्द्र चौहान
अब तक गंगा की सफ़ाई के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपए बहाए जा चुके हैं जिसके लिए कोई एक नहीं बल्कि सभी सरकारें ज़िम्मेदार रहीं हैं। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर एनजीटी के भी कई निर्देश हैं। नरेंद्र मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया है कि गंगा नदी की सफाई सरकार के इसी कार्यकाल में पूरी हो जाएगी। प्रमुख सरकारी वकील ने अदालत से कहा कि केंद्र सरकार 2018 तक यह महात्वाकांक्षी परियोजना पूरी करेगी। पर्यावरणविद एमसी मेहता की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने यह जवाब सुप्रीम कोर्ट में दिया था। अदालत की बेंच ने केंद्र सरकार को आड़े हाथ लेते हुए पूछा था कि उसके शासन काल में गंगा की सफाई का काम पूरा हो जाएगा या नहीं। इस पर सॉलीसिटर जनरल रणजीत कुमार ने न्यायालय के समक्ष सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि गंगा को साफ करने का काम 2018 तक पूरा कर दिया जाएगा। अदालत ने इस बात पर रोष जताया कि पिछले 30 सालों में गंगा की सफाई के लिए कोई काम नहीं हुआ है। सॉलीलिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि सरकार की गंगा नदी के किनारे बसे 30 शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की योजना है, ताकि गंदे पानी को नदी में जाने से रोका जा सके। इस समय 24 प्लांट काम कर रहे हैं जबकि 31 का निर्माण किया किया जा रहा है। 2500 किलोमीटर लंबी गंगा की सफाई के लिए नदी के तट पर बसे 118 नगरपालिकाओं की शिनाख्त की गई है जहां वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सहित पूरी साफ सफाई का लक्ष्य हासिल किया जाएगा। केंद्र सरकार की मंत्री उमा भारती ने नमो सफाई योजना के पहले कदम का खुलासा करते हुए कहा था कि गंगा में बूंद भर भी गंदा पानी नहीं जाने देंगे। इसके लिए गंगा के मार्ग में जगह जगह जलशोधन संयत्र लगाए जाएंगे। इस पर अब तक कितना अमल हुआ पता नहीं। सरकार के इस कदम को दिल्ली में यमुना की कसौटी पर कसा जा सकता है। तीन दशकों का अनुभव बताता है कि दिल्ली में यमुना एक्शन प्लान के तहत 22 किमी दायरे में बहने वाली यमुना पर पांच हजार करोड़ रुपये पानी में बह चुके हैं। मगर यमुना के खाते में सिर्फ गंदगी ही आई है। यह कड़वा यथार्थ है कि जब तक हम सभी लोग इसको लेकर जागरूक नहीं होंगे और सुधरेंगे नहीं तब तक यह सब काम पूरा नहीं हो सकेगा । बनारस हिंदू विश्विद्यालय के एक प्रोफ़ेसर की अगुवाई में बनी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि हर साल लगभग 3,000 लोगों का दाह संस्कार बनारस के घाटों पर ही होता है और सब कुछ नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसी रिपोर्ट के अनुसार लगभग 6,000 जानवरों को भी बनारस और आसपास के इलाक़ों से गंगा में बहाए जाने के अनुमान मिलते हैं। ध्यातव्य है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा नदी में सौ से ज्यादा लाशें मिलने के बाद सामने आया था कि कुछ समुदायों के लोग मृतकों को जलाने के बदले लाशें नदी में बहा देते हैं। केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश की सरकार से गंगा नदी में मिली लाशों पर रिपोर्ट मांगी है। इस हकीकत से किसी को गुरेज नहीं होगा कि भारत में नदियों के नाम पर अब नाले बहते हैं। जीवनदायिनी गंगा भी इस त्रासदी की शिकार है। यह बदरंग तस्वीर कश्मीर में झेलम से शुरु होकर पंजाब में व्यास, दिल्ली और आगरा में यमुना, कानपुर, बनारस और पटना में गंगा से लेकर दक्षिण में गोदावरी, पश्चिम में साबरमती और पूरब में ब्रह्मपुत्र तक बदस्तूर दिखती है। आखिर हिंदू सभ्यता के साथ हमें नदियों और पर्यावरण को भी तो बचाना है। बात बनारस की हो तो हिन्दू संस्कृति की बात तो करनी ही होगी क्योंकि उसका बहुत महत्व है। लेकिन अपनी संस्कृति बचाए रखने में कहीं ऐसा न हो कि हम अपनी ऐसी कोई चीज़ गंवा दे जिसका बाद में कोई समाधान ही नहीं हो। गंगा नदी में प्रदूषण को लेकर साल भर पहले एनजीटी में गौरव बंसल ने एक याचिका दायर की थी जिसमें ये दलील दी थी कि गंगा की सफ़ाई तो ज़रूरी है पर इसके साथ ही इसमें मिलने वाली छोटी नदियों की भी सफ़ाई भी आवश्यक है। राम गंगा, देहला या बहेला जैसी उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश में तमाम ऐसी नदियां हैं जो प्रदूषण के साथ ही गंगा में मिलती हैं। जहाँ ये गंगा में मिलती हैं वहां तो स्थिति ख़राब है ही, साथ ही इन छोटी नदियों का पानी अब नहाने लायक़ भी नहीं रहा है। चार दशक बीत गए, गंगा और यमुना को साफ करने के लिए तमाम सरकारों ने जीतोड़ जतन कर डाले लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी श्यामा हो चुकी गंगा-यमुना गोरी न हो सकीं। जब प्रदूषण पर सरकारी आंकड़ों की बात होती है तो पता चलता है कि केंद्र सरकार के आंकड़े राज्य सरकार के आंकड़ों से नहीं मिलते। यही वजह है कि एनजीटी बार-बार सरकारों से कह रही है कि अपना डाटा ठीक कीजिए और सही मायनों में इस अभियान को जमीनी हकीकत में बदलिये। भारत की नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) ने वाराणसी शहर में गंगा नदी में प्रदूषण को लेकर केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार की कथनी और करनी में अंतर बताते हुए सरकारों से पूछा है कि आख़िर अभी तक इसके लिए क्या किया गया है। असल में 1980-90 के दशक में वैश्वीकरण की अंधी दौड़ शुरु होने के साथ ही सदानीरा नदियों के दुर्दिन भी शुरु हो गए थे। कारखानों का लाखों गैलन गंदा पानी हर दिन नदियों की कोख में समाने लगा। दूसरी ओर बेकाबू और गैर जिम्मेदाराना तरीके से फैले शहरों का सीवर भी उन नदियों के लिए नासूर बन गया जिन्हें गंदा करने के बाद भी सुबह शाम हम आरती उतारकर पूजते नहीं अघाते। कानून कितने भी सख्त क्यों न बना दिए जाएं उन्हें लागू कराने वालों के मन में जब तक खोट रहेगा तब तक कोई भी कानून अपना असर नहीं दिखा सकता।

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