लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में गत दिनों हुए कोबाल्ट हादसे ने अनेक शंकाओं कुशंकाओं को जन्म दे दिया है। सरकार भले ही इसे बहुत गंभीरता से न ले रही हो पर इसे गंभीरता से लेना आवश्यक है। इसके हर पहलू पर बारीक और तीखी नजर रखने की आवश्यकता है। कुछ समाचार पत्र इसे आतंकियों का ट्रायल की संज्ञा देने से नहीं चूक रहे हैं। देश की मौजूदा आंतरिक हालत को देखकर इस आशंका को निर्मूल नहीं माना जा सकता है। वैसे दिनचर्या में अनेक खतरनाक हादसे होते रहते हैं, पर इसका भान तभी हो पाता है जब यह भयानक और विकृत रूप में हमारे सामने आता है।

दरअसल हिन्दुस्तान का सिस्टम बडा ही अजीब है। यहां कानून पर कानून बनते हैं, पर पालन सुनिश्चित नहीं होता। देश में बिना हेलमिट लगाए दो पहिया तो बिना सीट बेल्ट लगाए चार पहिया वाहन में बैठना या चलाना प्रतिबंधित है। देश के चुनिंदा शहरों को छोड दिया जाए तो कमोबेश हर जगह इस कानून का उल्लंघन साफ तौर पर मिल जाएगा। इसी तरह सार्वजनिक स्थानों में धूम्रपान प्रतिबंधित होने के बावजूद भी सरेआम बीडी सिगरेट के छल्ले उडते नजर आते हैं। इतना ही नहीं 18 साल से कम उम्र के बच्चों को बीडी सिगरेट शराब आदि का विक्रय न करने की ताकीद की गई है, पर घोषित अघोषित मयखानों में छोटू, मुन्ना, पप्पू, कल्लन आदि नाम के बच्चे बाकायदा साकी के रोल में नजर आते हैं।

दिल्ली के मायापुरी इलाके में भी यही हुआ। रेडियोधर्मिता से लोगों को दूर रखने के लिए रेडियोधर्मी पदार्थों के निष्पादन के लिए अलग व्यवस्था और कडे नियम है, पर वे सब हाथी के मंहगे बिकने वाले दांतों की तरह ही हैं। अभी स्पष्ट नहीं हो सका है कि आखिर उसमें क्या था जिससे पीडितों का शरीर काला पडने लगा। बताते हैं कि उसमें कोबाल्ट 60 था, जिसका उपयोग केंसर के इलाज के लिए किया जाता है। सवाल यह उठता है कि आखिर यह कोबाल्ट उस कबाड की दुकान तक पहुंचा कैसे।

दिल्ली वैसे भी बहुत ही संवेदनशील शहर है, यहां पुलिस हर पल चौकस रहती है, बावजूद इसके इस तरह के हादसे क्या चौकसी पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अकबर बीरबल की एक कहानी का जिकर यहां लाजिमी होगा। एक मर्तबा अकबर ने दरबारियों से कहा कि उन्होंने शाही बाग की सुरक्षा चाक चौबंद कर दी है, वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। वहां से कोई अगर चोरी कर कुछ ले जाए तो बादशाह सलामत उसे ईनाम से नवाजेंगे। सारे दरबारी एक के बाद जोर अजमाइश करते रहे। जो भी चीज बाहर जाती उसको द्वारपाल अपनी पंजी में दर्ज कर देता। बीरबल के कहने पर एक साधारण आदमी बाग का कचरा बीनकर उसे बाहर ले जाता रहा। पंजी में कचरे का इंद्राज होता रहा। सप्ताह बीतने पर बादशाह सलामत से बीरबल ने कहा कि उसने बाग से काफी कुछ चुरा लिया है। बादशाह चौंक गए। रजिस्टर तलब हुआ। बीरबल को बताया कि वहां से कुछ भी चोरी नहीं हुआ सब कुछ तो इसमें दर्ज है। बीरबल बोले बादशाह सलामत जान की सलामती हो तो अर्ज करूं। बादशाह ने इजाजत दी। बीरबल बोले हुजुर सात दिन में दो मर्तबा कचरा बाहर आया पर कचरे की ट्राली वापस नहीं गई। द्वारपाल ने कचरे की एंट्री की पर कचरा किसमें जा रहा था, यह नहीं लिखा सो चौदह कचरे की ट्रालिंया मैने चुरवा दीं। बादशाह बहुत प्रसन्न हुए और बीरबल को ढेर सारा ईनाम दिया। यही देश में हो रहा है कि सब उल्टा पुल्टा हो रहा है और कोई देख भी नहीं पा रहा है।

दिल्ली में जिस कोबाल्ट 60 के होने की बात की जा रही है, उसकी एक इकाई में 400 क्यूरी (रेडीएशन मापने की इकाई) होती है। इससे गामा किरणें निकलती हैं, और इसके लक्षण पांच से पंद्रह मिनिट के अंदर ही समझ में आने लगते हैं। अगर आरडी 200 से 500 हो तो एक सप्ताह में पीडित की मौत और 500 से 700 हो तो कुछ ही दिनों में मौत को गले लगा सकता है। अगर यह क्षमता 1000 तक पहुंच जाए तो दो दिन में ही काल कलवित कर सकता है इंसान को। वैसे रेडियोएक्टिविटी के प्रमुख स्त्रोत हैं, कोबाल्ट, रेडियम, यूरेनियम, प्लूटोनियम, आर्सेनिक और पारा अर्थात मरकरी। इनमें से प्लूटोनियम, यूरेनियम, आर्सेनिक और रेडियम का उपयोग परमाण्ाु हथियार में होता है, अत: ये खुले बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। मरकरी भी प्रतिबंधित हो चुका है पर कोबाल्ट का सभी देशों में धडल्ले से उपयोग हो रहा है। कोबाल्ट का प्रयोग रेडियोथेरिपी के जरिए कैंसर के इलाज में, फुड उद्योग में प्रोसेसिंग के दौरान कीटाणु मारने में और उद्योगों में पाईप की इंटेंसिटी मापने के लिए किया जाता है।

कोबाल्ट 60 शरीर के संपर्क में आने से स्वास्थ्य पर इसका घातक असर होता है। वैसे कोबाल्ट 60 के मानव के शरीर के संपर्क में आने का सबसे बडा खतरा मेडिकल के टेस्ट और इसके इलाज के वक्त ही होता है। मेडिकल या औद्योगिक रेडिएशन के स्त्रोतों के गलत इस्तेमाल या रिसायकलिंग के दौरान जरा सी लापरवाही भी बहुत खतरनाक ही हो सकती है। यह धूल के कण, पानी या खाद्य समाग्रियों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकता है। कोबाल्ट 60 की सबसे बडी खासियत यह है कि यह तत्काल ही असर दिखाना आरंभ कर देता है।

यह खून और कोशिकाओं में अपनी पहुंच बनाकर लीवर, किडनी और हड्डियों को अपनी जद में ले लेता है। इसका प्रभाव होने पर मरीज को उल्टी आना, दस्त होना, कभी कभी दस्त में खून का जाना, लगातार खून बहना, बालों का तेजी से गुच्छे के रूप में झडना, नाखूनों और त्वाचा भी काली पडने लगती है। कोबाल्ट 60 मानव शरीर के सिर की धमनियों में खराबी पैदा कर सकता है। मरीज को दौरा भी पड सकता है। हृदय की छोटी धमनियों में विसंगति पैदा कर अचानक दिल का दौरा पडवा सकता है। इसका सबसे पहले और तेज प्रभाव पेट में आंत पर ही पडता है। इससे बोन मेरो और लाल और श्वेत रक्त कोशिकाओं में तेजी से कमी आती है। इससे प्रजनन अंग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो सकते हैं, इससे स्थाई नपुंसकता तक आने की संभावना रहती है। कोबाल्ट 60 से जुडी प्रमुख घटनाओं में 1992 में चीन में इसके रेडिएशन से तीन लोग, 1996 में कोस्टिरिका में सात, 2000 में थईलेण्ड में 3 असौ इसी साल पनामा में पांच लोग मारे जा चुके हैं।

यहां मजे की बात यह है कि इसी माह पांच अप्रेल को ही दिल्ली की सत्ता पर तीसरी बार काबिज हुईं श्रीमति शीला दीक्षित ने दिल्ली सचिवालय में एक प्रोग्राम में शिरकत करते हुए 16 ई कचरा संकलन बाक्स और 42 पेपर रिसाईक्लिंग मशीनों का वितरण किया था। इसी दौरान उन्होंने दिल्ली वासियों को ताकीद करते हुए कहा था कि अपना ई कचरा कबाडी को न बेचें, अगर यह पाया गया तो पांच साल की कैद और एक लाख रूपए के जुर्माने का प्रावधान किया जा रहा है। शीला दीक्षित ने कहा ही था और चार दिनों बाद उनकी आशंका सच्चाई में तब्दील हो गई।

वैसे इस मामले में भी गंभीरता से विचार आवश्यक है कि कहीं यह कोबाल्ट 60 किसी षणयंत्र के तहत मायापुरी की कबाड की दुकान में पहुंचाया गया हो। मीडिया की इस आशंका को सिरे से खारिज करना उचित नहीं होगा कि आतंक फैलाने के लिए यह दहशतगर्दों का ट्रायल तो नहीं। अगर एसा है तो आने वाले समय में आतंक का पर्याय बन चुके आतंकवादियों से निपटना देश की आंतरिक सुरक्षा संभाले जवानों के लिए बहुत बडी चुनौती ही साबित होने वाली है।

-लिमटी खरे

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